्य जातियों के बच्चों के साथ खेलने-कूदने के कारण उनका दृष्टिकोण शुरू से उदारवादी था। इसलिए साम्प्रदायिक तनाव या दंगे से वे बहुत दुखी होते थे और उन्हें रोकने के लिए भरसक प्रयत्न करते थे।

जैसा उस समय प्रचलन था, राजेन्द्र बाबू का विवाह भी बाल्यावस्था (12 वर्ष की उम्र) में राजवंशी देवी से कर दिया गया था। किन्तु इससे उनकी पढ़ाई-लिखाई में कोई बाधा नहीं पड़ी। वे सदैव अपनी कक्षा में प्रथम आते रहे और इसलिए छात्रवृत्ति पाते रहे। सन् 1902 में उन्होंने कलकत्ता में प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लिया। कुर्ता-पाजामा तथा टोपी पहनने के कारण शुरू में वहां उनका मंजाक उड़ाया गया। किन्तु अपनी प्रतिभा और विद्वत्ता के दम पर उन्होंने शीघ्र ही कॉलेज में अपनी धाक जमा ली। इसी बीच वे डॉन थे। फिर भी अपने कार्य में वे किसी प्रकार की बाधा नहीं आने देते थे। मध्यप्रदेश से उन्हें विशेष लगाव था। अनुकूल जलवायु होने के कारण ग्रीष्मकाल में वे कुछ समय पचमढ़ी में प्रवास करते थे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 12 वर्ष तक इस देश के राष्ट्रपति रहे। राष्ट्र के प्रति की गई सेवाओं के लिए उन्हें वर्ष 1962 में देश के सर्वोच्च सम्मान ''भारत रत्न'' से अलंकृत किया गया। 28 फरवरी 1963 को उन्होंने महाप्रयाणस कर दिया। सादा जीवन उच्च विचार, मानवता की सेवा, स्वाधीनता संग्राम तथा देश के निर्माण में अप्रतिम योगदान के लिए राजेन्द्र बाबू सदैव याद किये जाते रहेंगे।

 

बालमुकुन्द भारती