ग्रामीण युवाओं को सही मार्गदर्शन ज़रूरी

लोकेन्द्र सिंह कोट

एक जमाना था जब कभी शिक्षा का अर्थ महज डिग्री लेने तक ही सीमित नहीं था वरन् व्यवहारगत, संस्कारगत उन्नति भी शिक्षा के अंतर्गत आती थी। इनके परिणामस्वरूप न केवल विद्यार्थी स्वयं का सर्वांगीण विकास होता था बल्कि इन्हीं विद्यार्थियों के प्रभाव से एक परिवार, समाज और संपूर्ण राष्ट्र को दमदार आधार व भविष्य दोनों मिलते थे। यही बात बहुत जोर लगाकर नेतृत्व करती महिलाएँ भी कहती है। वे कहती हैं कि पढ़ना का सीधा-सीधा मतलब गुणना होता है। कमला देवी तपा ग्राम पंचायत जिला सतना की उप सरपंच हैं और स्वयं कक्षा छ: तक ही पढ़ी हैं लेकिन कहती हैं कि आजकल की पढ़ाई भी कैसी पढ़ाई है, आठवी पढ़ जाने पर गाँव के लड़के काम को हाथ तक नहीं लगाते हैं...पढ़ाई का मतलब वे सोचते हैं शहर और वहाँ की चकाचौंधा....। इसलिए वे तत्पर रहते हैं अपना गाँव छोड़ने को.... यहाँ की हर चीज से उन्हे पिछड़ापन लगता है...।

हमारे अपने भारत देश में ही ईसा से एक सौ वर्ष स्थापित नालंदा का विश्वविद्यालय इसी तरह की शिक्षा का पोषक रहा है। इसके इतिहास में देखने पर पता चलता है कि वास्तव में शिक्षा किस तरह दी जानी चाहिए और शिक्षा के वास्वतिक पहलू कौन-कौन से है। लगभग दस हजार छात्रों की संख्या वाले इस विश्वविद्यालय में न तो कभी कोई उपद्रव हुआ न ही कोई अन्य विकृति। अनुशासन पर आधारित नालंदा विश्वविद्यालय 800 वर्षों तक अनवरत अपनी सेवाएँ प्रदान करता रहा और जहाँ ज्ञान का मूल अर्थ था- साह्यचर्य, आदर, चिंतन, सहिष्णुता, सद्भाव, सहानुभूति और सेवा। एक शिक्षक के मूल उद्देश्य थे, न्याय, आदर, सद्गुणों की प्रशंसा सत्य की स्वच्छंद खोज मानव सेवा आदि की शिक्षा पाठयक्रमों के साथ देना।

एक जमाना यह है कि अब स्कूल का मतलब गली-कूचों में खुले सैकड़ों स्कूलों से है और विश्वविद्यालय का अर्थ एक बड़ा राजनीतिक अखाड़ा, डिग्री बाँटने का केन्द्र है। शिक्षा का अर्थ है मात्र धंधों, नौकरियों को पाने का साधान, एक परीक्षा और पांच प्रश्नों का कटु मजाक, ब्याह रचाने हेतु योग्यता आदि। महुरछ कदैला पंचायत जिला सतना की पंच सरला सिंह बघेल जो राष्ट्र्पति से भी मिल चुकी हैं कहती हैं ऐसी शिक्षा से ज्यादा से ज्यादा पढ़े-लिखे कुंठित लोगों की फौज खड़ी कर सकते हैं.... लड़कियों को भी ज्यादा पढ़ा लो तो उनके लिए लड़का मिलना मुश्किल हो जाता है....। हमारी शिक्षा नीति का अर्थ है (प्रसिद्व व्यंग्य उपन्यास राग दरबारी में लिखा है, 'हमारी शिक्षा नीति ऐसी कुतिया है, जिसे हर कोई लतियाता चलता है) सेमिनार, सिम्पोजियम, वर्कशॉप, शोधा, संवाद आदि जैसे भारी भरकम शब्दों से लदी-पदी औपचारिकताओं को ढोने वाली एक कागजी घोड़ी। सरला सिंह आगे कहती हैं कि शिक्षा के विस्तार के बाद स्थितियों में तुरंत सुधार आना चाहिये थे, लेकिन गाँवों की स्थिति तो विपरीत हैं.... सारी शहरी बुराईयाँ गाँव में पहुँच रही हैं और अच्छाई के नाम पर रत्ती भर भी नहीं दिखाई देता है। यही युवा यहाँ आकर भ्रष्टाचार, अनाचार का खेल और भी सुलझे तरीके से खेलने लगते हैं।

अब इन दो जमानों की तुलना के पश्चात क्या हम कह सकते हैं कि हम सही मार्ग पर हैं व भविष्य में भी चलेंगे? उत्तर है नहीं! और तो और इस दिशा में चिंतन भी संस्थागत से हटकर व्यक्तिगत स्तर पर जा पहुंचा है तथा जब आत्म-चेतना जागृति की सामूहिक भावना समाप्त होती है, तो शिक्षा हो या सामाजिक, राजनीतिक, राष्ट्रीय कर्म सभी तरफ मूल्यों की कमी तो आना स्वाभाविक ही है। इससे औरों का तो कुछ अधिाक नहीं परन्तु युवाओं पर (जिन पर भविष्य के देश का भार भी है)  दुविधा के रूप में प्रभाव पड़ता है। वे ऐसे माहौल में आखिर किस पर अपनी आस्था जमाएं और किसके पद चिन्हों पर चले? किन मूल्यों को माने? कस्तूरी बाई, पंच, अमरझौड़ा पंचायत जिला सिवनी की सुने तो वे कहती हैं कि गाँव के बड़े ही गलत व्यवहार करेंगे तो आने वाली पीढ़ी पर उसका कैसा असर पडेग़ा... यह हम सोच ही सकते हैं... लड़के शहर से आकर अक्सर यही कहते हैं कि रोजगार तो है नहीं बस ऐसे ही उल्टे धंधों में ज्यादा पैसा मिलता है...तो वे भी....।  

जब भी कोई युवा अपने ही सामने आदर्शों, सिद्वातों, नैतिकताओं की धाज्जियाँ उड़ते व धूर्तता अनैतिकता, बेईमानी, नीचता को अपने सामने सफल और सार्थक होते देखेगा तो वह कौन सी राह चुनेगा? (यह शायद बताने की आवश्यकता नहीं है।) फिर यह समझ नहीं आता है हरदम युवाओं से यह उम्मीद क्यों रखी जाती है कि वे ही शाश्वत आदर्शों पर चलें, निभाएं? सामंतों वाला यह प्रशासन कम से कम इन परिस्थितियों में तो नहीं चल सकता है। शिक्षा परिसरों से स्वर्ण पदक लेकर या टॉप-टेन में स्थान पाने वाले विद्यार्थियों के लिए ही रोजगार पाना मुश्किल होता है तो शेष (जो काफी बड़ी संख्या में है) का क्या होगा? क्या कभी इनके लिए कोई वैकल्पिक अवसर जुटाए गए हैं? कक्षाओं में नाम मात्र की उपस्थिति, सड़ी-गली परीक्षा पद्वति, प्राधयापकों का शिक्षणेत्तर गतिविधिायों में अधिक धयान, युवाओं का राजनीतिक इस्तेमाल आदि-आदि, क्या हैं ये सब? जहाँ विषयों में दक्ष करने के अलावा एक अच्छे नागरिक बनने की शिक्षा दी जानी चाहिए वहीं शिक्षा परिसरों को महज पर्यटन स्थल बना दिया जाना क्या झलकता है? ऐसे में युवाओं को कल का राष्ट्र निर्माता कहा जाना एक जुमला ही तो लगता है या फिर एक शर्मनाक वाक्य !!

चंपाबाई, उपसरपंच बवई पंचायत, जिला रीवा का मत है कि मैं तो अनपढ़ हूँ परंतु शिक्षा के मूल्य को अब सत्ता में आने पर पहचाना है.... फिर मैं पढ़े- लिखे नौजवानों को देखती हूं तो स्थिति समझने में विफल रहती हँ कि क्या जरूरी है....। इसीतरह घुसउल ग्राम पंचायत की विद्या मिश्रा भी कहती हैं कि वे बाहर की दुनिया में पंचायतों में आने के बाद आई हैं और उनके अनुसार आज भी गण देने वाली शिक्षा का अभाव है... लड़के-लड़कियाँ शहरी कपड़े पहन लें इससे ही वे गुणी नहीं हो जाते हैं... उन्हे अपनी जड़ों का भी ख्याल उतना ही रखना होगा।  

परसाई जी द्वारा एक लेख में वर्णित एक घटना का संदर्भ यहां प्रासंगिक होगा कि-एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुन्दर साड़ी से सजी एक सुन्दर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने आकर एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया, आसपास के लोगों ने पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया ''हरामजादी बहुत खूबसूरत है''। अब वह युवक जिसका चेहरा बुझा-सा था व जिससे चिंगारी निकली थी वह एक गाँव से जुड़ा हुआ उच्च शिक्षित गोल्ड मेडलिस्ट, बेरोजगार था। गाँव में घर की हालत खराब थी। घर में अपमान, बाहर अपमान और न ही नौकरी। बस चारों ओर से घुटन, गुस्सा। ऐसी हालत में वह पूर्णत: नकारात्मक हो चुका था। उसे हर सुन्दर चीज से नफरत हो गई थी।

हमारे देश का दुर्भाग्य यह है कि युवकों की कोई भी समस्या को अधिक गंभीरता से नहीं लिया जाता। इसका परिणाम यह होता है कि उचित मार्गदर्शन के अभाव में अधिाकांश युवा वय: सधि को पार करने के पश्चात भटक जाते हैं या भ्रमित हो जाते हैं चाहें वे कितने भी प्रतिभाशाली, तीक्ष्ण दिमाग क्यों न हों। ऐसा इसलिए भी होता है, क्योंकि या तो हमारी बुनियादी शिक्षा देने का ढंग ही गलत है जो नींव को ही कमजोर बना देता है या फिर वे शिक्षा से ही वंचित रह जाते हैं। कुछ नहीं तो बेरोजगारी भत्ता जैसी बैठे-ठाले खाने की प्रकृति को जन्म देने वाली प्रथाओं को बनाना युवाओं व देश के भविष्य के साथ सरासर अन्याय है। माना कि गरीबी उन्मूलन आवश्यक है परन्तु क्या जरूरी है कि वह अकर्मण्यता की कीमत पर ही हो।

ताजा स्थिति बताती है कि हर वर्ष सैकड़ों ग्रामीण युवा शहरों में जाकर बसते हैं। यह प्रव्रजन वर्षों से चल रहा है। अब ये प्रश्न उठता है कि ग्रामीण विकास की बात हम जोर देकर करते रहते हैं और दूसरी ओर वहाँ के युवाओं को इस तरह ढ़ालते हैं कि वे वापस न लौटें। समझ में नहीं आता कि इस ओर गंभीरता से धयान क्यों नहीं दिया गया? माना कि युवाओं पर धयान देने पर काफी धान खर्च हो सकता है परन्तु देश के ठोस भविष्य से बढ़कर भी कुछ हो सकता है भला? कुछ मिलाकर जानकारियों और जमीन से जुड़ा यह युवा वर्ग का प्रव्रजन हमारे समाज के मुख पर करारा तमाचा है क्योंकि यह वही समाज, देश है जिसके सभी उपक्रम युवाओं के अंदर क्रांति के बीज रोपने के बजाय उसे सुविधा भोगी और 'पैसा ही भगवान' के मंत्र दे रहे हैं।

जहाँ हमने अपनी औलादों को महज स्वप्निल दुनिया की फौलादी मशीने ही माना है तो फिर उनसे संवेदनशीलता की उम्मीद करना बेमानी होगा। हाँ यदि हमारे पास दृष्टि है, साधान है, विचार है, योजना है, तो हम युवाओं के बारे में काफी कुछ कार्य कर सकते हैं। ग्राम पंचायत तितरा की सरपंच शकुंतला बिल्कुल सही कहती हैं कि गाँव के लोग गाँव में ही काम आए तो इससे अच्छा कोई भी विकल्प नहीं है। हम उनकी ऊर्जा का धानात्मक उपयोग कर सकते है। औचित्यपूर्ण शिक्षा और रोजगार के अनुकूल अवसर के साथ ही वे सभी बातें जो सही जीवन जीने की आवश्यकताएं हैं, को यदि साथ लिया गया तो निश्चित ही देश के भविष्य के विषय में निश्चिन्त हो सकते हैं। एक बात और है कि युवा से जुड़े प्रत्येक संवेदनशील पहलुओं को राजनीति से परे होना चाहिए तथा उनमें अच्छे व बुरे की पहचान का एक नेक नुस्खा दे दिया जाए तो फिर बदलाव की उम्मीद हम कर सकते हैं।

 

लोकेन्द्र सिंह कोट