कार्बन व्यापार से कमाई के आसार

डॉ. सुनील शर्मा

समय पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से प्रदूषण को रोकना दुनिया के मुख्य एजेण्डे में शामिल है तथा पर्यावरण सुधार की इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात हैं कार्बन डाय आक्साइड के उत्सर्जन को कम करना। वायुमण्डल में बढ़ती कार्बनडायऑक्साईड की वजह से इस समय सारा विश्व ग्लोबल वार्मिग यानि विश्व तापन में वृध्दी की समस्या का सामना कर रहा है । पिछले 50 वर्षो के दौरान इस उत्सर्जित कार्बन डाय आक्साइड की वजह से  वैश्विक तापमान में दो डिग्री की औसतन वृध्दि आंकी गई है और इस सदी के अंत तक इसमें लगभग चार डिग्री सेन्टीग्रेट की वृध्दि संभावित है। वैश्विक तापमान में वृध्दि का बुरा असर संपूर्ण जैविक तंत्र, आहार व्यवस्था, जलापूर्ति तथा पर्यावरण पर पड़ेगा। जैसे की वैज्ञानिकों को सम्भावना है कि इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में लगभग चार डिग्री से. की वृध्दि होगी, वास्तव में  अगर वैश्विक तापमान में चार डिग्री सेन्टीग्रेट की वृध्दि हो जाती है तो जैविक तंत्र की चालीस फीसदी प्रजातियां सदैव के लिए नष्ट हो जाएंगी । विश्व की तीन अरब जनसंख्या जल समस्या का सामना करेगी तथा लगभग दो अरब आबादी आहार की समस्या से जूझेगी । आज सारे पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात से सहमत है कि कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाकर इस समस्या को कुछ हद तक आगे बढ़ने से रोका जा सकता है, परंतु इसे लेकर विकसित देश उदासीन बने हुए है तथा विकासशील देशों में भी इसका उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है । इस संदर्भ में दुनिया के विकसित देशों ने एक नया तरीका खोजा है- कार्बन व्यापार के रूप में । इसमें कोयले के मौलिक रूप कार्बन व्यापार के जरिए ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ने से रोकने का एक नया तरीका अपनाया जा रहा है। कार्बन व्यापार के जरिए विकसित देश ग्रीन हाउस गैंसो का उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी से बचने की गुंजाइश भी बना रहे है। जहां तक कार्बन व्यापार की बात है तो इसका अर्थ उस प्रोंद्यौगिकी के व्यापार से है जिसके तहत कार्बन उत्सर्जन में निश्चित समयान्तराल में कमी लायी जा सके । इस व्यापार में सम्मिलित देश, समूह या कंपनियां उस प्रौद्योगिकी का दूसरे को हस्तांरण करेंगी, जिसके तहत कार्बन उत्सर्जन को एक निश्चित समय-सीमा में नियंत्रित किया जा सके। कार्बन व्यापार में सम्मिलित देश या कंपनियाँ प्रदूषण मानक सर्टिफिकेट खरीद या बेच सकती है तथा इनसे संबंधिात उत्पादों को व्यापारी बाजार में आसानी से खरीद या बेच सकते हैं क्योंकि इन उत्पादों को कार्बन उत्सर्जन में कमी करने का सहयोगी मान लिया जाएगा।

कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए क्लीन डेवलपमेंट के तहत क्योटो प्रोटोकाल के एनेक्स-2 के देश अन्य देशों में पर्यावरण से संबंधित वैसी परियोजनाएं शुरू कर सकते हैं जो उत्सर्जन को कम करने में सहायक है। इसके तहत विकसित देश जिन्हें ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना है वो विकास शील देशों को इससे संबंधिात परियोजनाओं के लिए धान उपलब्धा कराएगें। इन परियोजनाओं में वृक्षारोपण्, ऊर्जा के परम्परागत स्त्रोतो का विकास तथा बायोमास संबंधी कार्यक्रम शामिल किए जा सकते है । चूंकि वृक्ष ग्रीन हाउस गैसों के अच्छे शोषक है अत: अधिकाधिक वृक्ष लगाकर ग्रीन हाउस गैसों को सोखा जा सकता है। लेकिन इसके लिए खाली जमीन की आवश्यकता होती है, चूंकि विकसित देशों के पास इस हेतु खाली जमीन तो है ही नही है अत: उन्हे तलाश है ऐसे विकासशील देशों की जो इन कार्यो को लिए जमीन उपलब्धा करावे तथा विकसित देश इसके बदले उन्हें आर्थिक मदद देंगे। निश्चित रूप से इस कार्य में हमारा देश सहयोग कर अच्छी कमाई कर सकता है, चूकि हमारे देश में ऐसा काफी विस्तृत भू-भाग है जिसे पर्यावरण के निधर्ाारित मापदण्डो के तहत वनीकरण के जरिए हरा-भरा बनाया जाना जरूरी है। इस कार्बन वयापार के जरिये एक ओर तो स्वच्छ जंगल का विकास किया जा सकता है जिससे  वन्य प्राणियों को संरक्षण प्राप्त होग, विगडता पर्यावरण सुधारेगा, भूक्षरण की समस्या सुलझेगी तथा ईंधान तथा इमारती लकड़ी प्राप्त होगी। एक अनुमान के तहत हमारे देश में खाली पड़ी लगभग 15 लाख हेक्टयर भूमि में पेड़ लगाकर इस धांधो से अच्छी कमाई की जा सकती है, जिसका उपयोग मानव विकास से संबंधित कार्यो में किया जा सकता है। हमारे देश में लगभग 20 करोड़ गोपशु धान भी है जिसका उपयोग भी इस कार्यक्रम के तहत किया जा सकता है। सर्वविदित है कि  आज बायोगैस का उपयोग ईधान तथा प्रकाश के लिए बढ़ रहा है तथा इसका उत्पादन पर्यावरण हितेषी है, वहीं ताप बिजली घर तथा कोयले का ईंधान ग्रीन हाउस गैंसों के उत्सर्जन में वृध्दि करते है। गौशालाओं का विकास कर गोबर आधारित विद्युत गृह से ईधान और प्रकाश की व्यापक उत्पादकता की जा सकती है इस प्रकार इस कार्यक्रम को भी क्लीन डेवलपमेंट का एक अंग के रूप में स्वीकार कर इससे कमाई की जा सकती है तथा गोवंश की सुरक्षा का कार्य आसानी से किया जा सकता है। कार्बन व्यापार के इस कार्य में स्वयं सेवी संगठनो को भी शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा ऊर्जा उत्पादन की अन्य तकनीकों जैसे पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा को बढ़ावा देकर भी कमाई की जा सकती है ।

पिछले वर्ष प. बंगाल में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन करने वाले ईंधान के बदले चावल की भूसी से तैयार ऊर्जा के इस्तेमाल हेतु ग्रीन पावर कंसोट्रीयम समूह को एक स्वीडिश कंपनी से 15 करोड़ राशि प्राप्त करने का समझौता हुआ है। इसी प्रकार आधारप्रदेश में भी कई एन.जी.ओ. विश्व बैंक से इस प्रकार की परियोजनाओं के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त कर रहे है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार विश्व कार्बन व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी तक संभावित है। जिसमे प्रतिवर्ष 100 मिलियन डालर की प्राप्ति होगी। कार्बन व्यापार से कमाई की काफी संभावनाए है तथा हमारे देश को अपने दीर्घकालिक विकास की आवश्यकताओं को निश्चित कर इसमें शामिल होना चाहिए ।

डॉ. सुनील शर्मा