मुख्यमंत्री का इस्तीफा कानूनी दृष्टि से आवश्यक नहीं, नैतिक दृष्टि से है

एल.एस.हरदेनिया

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    स समय मध्यप्रदेश में एक अजीबोगरीब स्थिति उत्पन्न हो गई है। एक ओर लोकायुक्त, मुख्य सूचना आयुक्त तथा विधानसभा अध्यक्ष एक दूसरे से टकरा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री के विरूद्ध अदालत के आदेश पर एक आपराधिक प्रकरण दंर्ज कर लिया गया है। इस तरह प्रदेश के चार संविधान व कानून सम्मत अधिकारी एक अजीब स्थिति के चक्रव्यूह में फंस गये हैं। इनमें सबसे गंभीर मामले का संबंध मुख्यमंत्री से है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी पत्नी साधना सिंह तथा कुछ अधिकारियों पर अत्यधिक सख्त धारायें लगाकर उनके विरुद्ध लोकायुक्त पुलिस ने एक आपराधिक प्रकरण दंर्ज कर लिया है। राजनीतिक मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध प्रकरण भले ही दंर्ज हुए हों परन्तु भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के कृत्य को लेकर शायद ही इसके पूर्व प्रदेश के किसी भी मुख्यमंत्री के विरुद्ध पुलिस में प्रकरण दाखिल किया गया है।

यह प्रकरण इटारसी निवासी एक काँग्रेसी नेता के द्वारा अदालत में चलाए गए एक मामले से प्रारंभ हुआ है। इस मामले का संबंध मुख्य मंत्री की पत्नी श्रीमती साधना सिंह द्वारा खरीदे गये डंपरों से है। आरोपित है कि ये डंपर रीवा के जे.पी. सीमेंट को किराये पर दिए गए थे। इसी दौरान प्रदेश सरकार की ओर से इसी उद्योग को कुछ खदानें आवंटित की गई। इस आवंटन में भी नियमों की अनदेखी की गई। इन डंपरों की मालिक श्रीमती साधना सिंह थीं। श्रीमती सिंह का पता भी गलत लिखाया गया। भोपाल या उनके गृह नगर के स्थान पर रीवा का पता दिया गया। जब यह मामला उजागर हुआ तो दस्तावेंजों में हेराफेरी हो गई और डम्पर उसी उद्योग को बेच दिए गए। इस संपूर्ण कार्यवाही में अनेक कमियां रहीं और उनको लेकर मुख्य प्रतिपक्ष द्वारा शोर मचाना प्रारंभ कर दिया गया। इस मुद्दे को लेकर प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती जमुना देवी सर्वोच्च न्यायालय गई। सर्वोच्च न्यायालय ने जमुना देवी को सलाह दी कि पहिले वे उच्च न्यायालय जाएं। इसी दरम्यान मामला भोपाल की अदालत में आया और संबंधित न्यायालय ने लोकायुक्त से प्रकरण दाखिल करने को कहा। सबसे चौकाने वाली बात यह है कि जिस दिन अदालत ने आदेश दिया उसी दिन लोकायुक्त पुलिस ने मामले में एफ.आई.आर. दाखिल कर दी। जिस दु्र्रतगति से यह सब कुछ हुआ उसे स्वयं मुख्यमंत्री ने शंकास्पद बताया और कहा कि वे इस चुनौती का सामना करने को तैयार हैं। प्रतिपक्ष की तरफ से यह मांग की जा रही है कि श्री चौहान मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दें। मुख्यमंत्री व भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि त्यागपत्र देने की कतई आवश्यकता नहीं है। मामला इसी विवाद में उलझा हुआ है। इसी बीच मुख्यमंत्री ने हाई कोर्ट जाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री का प्रयास होगा कि भोपाल के कोर्ट के निर्णय को पलटवा दिया जाए।

जहाँ तक मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफे का मुद्दा है, उसके दो पक्ष हैं। पहिला पक्ष है कानूनी और दूसरा पक्ष है नैतिक। कानूनी दृष्टि से सिंर्फ एफ.आई.आर. दर्ज होने से किसी को भी त्यागपत्र देने की आवश्यकता नहीं है। यदि इस प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला तो उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों को उनके पदों से हटाने का सबसे सरल तरीका होगा उनके विरुद्ध पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवा देना और फिर उसके बाद उनके त्यागपत्र की मांग करना। यदि इस तरह का सिलसिला प्रारंभ हो गया तो राजनीति व प्रशासन के क्षेत्र में कांफी अस्थिरता आ जायेगी। वर्तमान में अनेक मंत्री, सांसद व विधायक ऐसे हैं जिनके विरूद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं,  कई तो ऐसे हैं जिनके विरुद्ध अदालत में मुकदमें चल रहे हैं। इसके बावंजूद वे पद पर बैठे हुए हैं। पिछले दिनों अनेक बार यह पता लगाया गया है कि कितने सांसद या विधायक ऐसे हैं जिनका आपराधिक रिकार्ड है। पता लगाने पर ऐसे जनप्रतिनिधियों की संख्या कांफी पाई गई है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के जनप्रतिनिधि सभी राजनैतिक पार्टियो के हैं। हाँ, कम्यूनिस्ट पार्टियों में आपराधिक रिकॉर्ड वालों की संख्या सबसे कम है। परन्तु यह एक तथ्य है कि लगभग सभी पार्टियों में ऐसे लोग हैं यह इस बात की ओर इंगित करता है कि इन पार्टियों को ऐसे मामलों में एक दूसरे का इस्तीफा मांगने का नैतिक अधिकार नहीं है।

इसके बावंजूद सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का स्थान है। जन प्रतिनिधियों से उपेक्षा है कि वे नैतिकता के उच्च मानदंडों पर चलें। यदि वे ऐसा करेंगे तभी वे समाज में नैतिकता कायम करने की आवश्यकता प्रतिपादित कर पाएंगे। आंजाद भारत के प्रारंभिक वर्षों में-विशेषकर जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में-समाज व राजनीति में नैतिकता कायम थी। नेहरू जी के कार्यकाल में अनेक केन्द्रीय मंत्रियों एवं मुख्यमंत्रियों को भ्रष्ट आचरण के आरोपों के कारण पद त्यागना  पड़ा था। यहाँ कुछ ऐसे लोगों का उल्लेख प्रासंगिक होगा। इनमें दो केन्द्रीय मंत्री शामिल हैं। ये दो केन्द्रीय मंत्री थे श्री केशव देव मालवीय और श्री टी.टी. के. कृष्णमाचारी। श्री मालवीय ने उड़ीसा के एक व्यापारी से पांच हजार रुपये कांग्रेस के लिए लिए थे। उन्होंने उस रकम का उपयोग पार्टी के लिए ही किया था। परन्तु उन पर आरोप था कि उन्होंने उस रकम को बिना काँग्रेस के कोष में जमा किए खर्च कर लिया। इस मामूली से आरोप के कारण उन्हें केन्द्रीय मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र देना पड़ा। इसी तरह एक और घोटाले में केन्द्रीय मंत्री टी.टी. के. कृष्णमाचारी को त्यागपत्र देना पड़ा था। पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरोें के विरुद्ध गंभीर आरोप लगने के थोड़े ही अंतराल में जांच आयोग बिठाया गया। जांच आयोग के अध्यक्ष थे न्यायमूर्ति एस. के. दास। जांच में उन्होंने कुछ आरोपों को सही पाया। आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सरदार कैरों को त्यागपत्र देना पड़ा। न्यायमूर्ति दास ने कुछ आरोपों को सही पाते हुए पंजाब के विकास का श्रेय सरदार कैरों को दिया था। यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि मालवीय, टी.टी. के. कृष्णमाचारी तथा सरदार कैरों नेहरु जी के लाड़ले नेता थे। इसके बावंजूद नेहरू जी ने उन्हें दंडित करना उचित समझा। उसी दरम्यान लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया था। ये सभी उदाहरण सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक मानदंडों के प्रतीक थे। जब भ्रष्टाचार और प्रशासनिक चूक के लिए उच्च पदस्थ नेताओं को दंडित किया जाएगा तब ही भ्रष्टाचार में लिप्त अन्य लोगों को दंडित किया जा सकेगा। यदि वर्तमान दृश्यावली देखी जाए तो हम पायेंगे कि बिहार के चारा घोटाले के आरोपों से घिरे लालू प्रसाद यादव कैसे रेल मंत्रालय में भ्रष्टाचार के विरूद्ध जंग छेड़ सकेंगे।

        मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्राय: कहा करते हैं कि वे भ्रष्टाचारियों को कदापि नहीं बख्शेंगे। वे भ्रष्टाचार नहीं सहेंगे। उनकी ये घोषणाएँ जनहित में हैं। पर यदि वे स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं तो कैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध जेहाद छेड़ सकेंगे ? वे मुख्यमंत्री के पद से इस्तींफा दें या न दें परन्तु यह आवश्यक है कि वे स्वत: के विरुद्ध आरोपों की जांच किसी निष्पक्ष एजेन्सी से करवा लें और अपने इस दावे को सही सिद्ध कर दें कि वे पाक-साफ हैं। वैसे भी मुख्यमंत्री को पाक-साफ होना चाहिए। इसलिए यह प्रदेश के हित में है कि वे स्वयं को निर्दोष साबित कर दें। आरोप लगाने वालों से भी मैं जानना चाहूंगा कि उनकी दिलचस्पी मुख्यमंत्री को बदनाम करने में है या वे दिल-दिमाग से भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहते हैं। यह जानना इसलिए जरूरी है कि जहाँ तक भ्रष्टाचार का संबंध है काँग्रेस का दामन भी पूरी तरह से पाक-सांफ नहीं है।

 एल.एस.हरदेनिया