वोट मांगने का हक और भाजपा

वीरेन्द्र जैन

जब भी चुनाव आते हैं सारी पार्टियाँ और नेता वोट मांगने के लिए निकल पड़ते हैं। ऐसा करना उनका संवैधानिक अधिकार है जिसका उपयोग करने में वे कोई चूक नहीं करते। मुझे याद है कि एक बार राष्ट्रकवि मैथलीशरण् गुप्त ने 1962 के चुनाव के दौरान कहा था कि वोट मांगने का अधिकार सबको है पर वोट पाने का अधिाकार सिर्फ काँग्रेस को है। इस दौर में भारतीय जनता पार्टी देश में दूसरे नम्बर की सबसे बड़ी चुनावी पार्टी है जो चुनावी खर्च में पहले नम्बर पर रहती है। पर क्या नैतिक रूप से भाजपा को वोट मांगने का अधिकार है? संवैधानिक रूप से यह अधिकार होने के बाद भी नैतिक रूप में भाजपा यह अधिकार खोती जा रही है।

मतदाता जिन सांसदों को जनता की बात रखने के लिए संसद में भेजते हैं वे ही सांसद चुने जाने के बाद संसद ना चलने देने की कोशिश करने लगे हैं। जब संसद में भाजपा के केवल दो सदस्य थे तब 1985 के कार्यकाल में संसद की औसतन 109 बैठकें हुयी थीं जो पिछले पच्चीस वर्षों मे सर्वाधिक बैठक का रिकार्ड है। 1989 के कार्यकाल में यह संख्या घट कर 83 रह गयी, 1994 के कार्यकाल में कुल 77 तक पहुँच गयी 1997 में घट कर 65 तक आ गयी और भाजपा के सत्ता में पहुंचने पर घट कर 51 रह गयी।  कांग्रेस द्वारा सत्ता ग्रहण करने के बाद 2004 में 53 बैठकें हो सकीं, 2005 में 85 व 2006 में 77 बैठकें हो सकीं। 2007 में अक्टूबर तक कुल 49 बैठकें हो पायी थीं। आज दुनिया सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने सदन की सबसे कम बैठकें करने के लिए जाना जाने लगा है।

सदन में कामकाज न चलने देने के लिए भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे है या कहना चाहिये कि अपने छोटे छोटे पिछलग्गुओं के साथ प्रमुख है। किसी भी राजनीतिक दल को जनता के प्रतिनिधि के रूप में अपनी बात रखने के लिए संसद ही उचित स्थान होता है, पर क्या कारण है कि वे इस मंच पर अपने विचार रख कर अपने आप को स्पष्ट नहीं होने देना चाहते? अपनी असहमतियाँ और विरोधा व्यक्त करने के लिए तो किसी भी राजनीतिक दल के पास अनेक उपाय होते हैं, वे बयान दे सकते हैं, रैली निकाल सकते हैं, धारना दे सकते हैं, लेख लिख सकते हैं परचे बाँट सकते हैं, आम सभाएं कर सकते हैं, हड़ताल और बन्द का आयोजन कर सकते हैं पर संसद के मंच पर तो वे जनता के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित होते हैं और उस स्थान पर अपनी बात न कह कर व दूसरों को बात न करने देकर वे जनता के प्रतिनिधि होने का अपना अधिकार खोते हैं। किसी भी चुने हुये प्रतिनिधि को प्राप्त समय में अपनी बात कहने का अधिकार तो प्राप्त है पर दूसरों के अधिकार पर डाका डालने का कोई अधिकार नहीं होता है। ऐसा करना, और बार बार करना जनता के साथ किये गये अपराधा के बराबर है। आंकड़े बताते हैं कि काँग्रेस की सरकार बनने के बाद भाजपा ने संसद का लगभग 26 प्रतिशत समय सदन न चलने देने में बरबाद कर दिया। जबकि संसद सत्र का एक मिनिट का खर्च लगभग 26000 रूपये आता है। जनता की कमाई से वसूले गये टैक्सों को इस तरह बरबाद करना ही क्या भाजपा की राष्ट्रभक्ति है?

सच तो यह है कि  कोई भी फासिस्ट ताकत यदि चुनाव के अवैधा हथकंडों के बाद भी जब सत्ता में नहीं आ पाती तो वह लोकतांत्रिक संस्थानों को ही बरबाद करने में जुट जाती है। जब वह सत्ता में रहती है तब अपने लठैतों के साथ साथ सरकार की सुरक्षा ऐजेन्सियों का दुरूपयोग करके मनमानी करती है पर सत्ता में न होने पर वह अपनी संसदीय ताकत का स्तेमाल लोकतांत्रिक तरीकों के खिलाफ करने लगती है। लोकतंत्र में विश्वास करने वाली ताकतों के पास लठैतों और गलेबाजों की ऐसी कोई ताकत नहीं होती है व वे सुरक्षा ऐजेन्सियों का विवेकपूर्ण वैधानिक स्तेमाल करते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि ये गलेबाज नक्कारखाना गुंजायमान करके विवेक के स्वर को दबा देते हैं।

लोकतांत्रिक संस्थाओं के सही स्तेमाल के लिए विचारधारात्मक राजनैतिक दलों की आवश्यकता होती है जो अपने ज्ञान, तर्क, अनुभव, अधययन, और सपनों के आधार पर बहुमत की आवाज बन कर प्रकट होते हैं, पर जिस लोकतंत्र में किसी भी क्षेत्र की लोकप्रियता को वोटों में भुनाकर बहुमत बनाने की कूटनीति चलती हो वहाँ बहस की सम्भावनाएं सीमित ही होती हैं। भाजपा के सांसद फिल्म अभिनेता धार्मेंन्द्र ने पिछले दिनों कहा था कि भाजपा ने मुझे इमोशनली ब्लैकमेल किया है, वहीं जिस राजस्थान के कम राजनैतिक चेतना वाले क्षेत्र पर उन्हें थोप दिया गया था वहाँ के स्थानीय निवासी अपने सांसद के फरार होने के पोस्टर चिपका रहे हैं। दूसरों के लिखे डायलाग बोलने के अभ्यस्त ये लोग संसद में अगर बोलने खड़े हो गये तो उनकी और भाजपा दोनों की ही पोल खुल सकती है इसलिए सदन को न चलने देना ही इनके लिए सर्वोत्तम होता है।

प्रश्न है कि ये लोग जब सदन की कार्यवाही में भाग ही नहीं लेना चाहते तो सदन की सदस्यता के लिए इतने प्रयत्नशील क्यों रहते हैं? इस प्रश्न का उत्तर, सांसदनिधि बेचने, सवाल पूछने, कबूतरबाजी कराने, और लाभ के पद पाने के आरोपों में पकड़े गये इनके सांसद हैं। स्मरणीय है कि ऐसे कार्यों में जो सांसद लिप्त पाये गये हैं उनमें से अधिकांश वे सांसद हैं जो सदन की कार्यवाही में ना के बराबर भाग लेते हैं। इसका निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि सदन की कार्यवाही में भाग न लेने का सीधा सम्बंधा विशेष अधिकारों के दुरूपयोग से है।

 

वीरेन्द्र जैन