वरिष्ठों के साये में काँग्रेस में उभर रही है युवा टीम

 

राजेन्द्र जोशी

 

सृष्टि का कालचक्र चलता रहता है जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य की स्थितियां समय और परिस्थितियों के मुताबिक बदलती जाती हैं। एक निश्चित अवधि तक पेड़ भी फल देते हैं। बाद में रोपणियों में तैयार हुए पौधे वृक्षों का स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं और वे फल देने लगते हैं। एक दिन उन वृक्षों की स्थिति भी भूतकाल में बदल जाती है। पेड़ों की नई कतारें संजने लगती हैं। इसी के साथ-साथ फल खाने वाली पीढ़ी में भी बदलाव आता जाता है

कुदरत के इस अनुशासित चक्र का मनुष्यों पर भी प्रभाव पड़ता है। एक पीढ़ी पश्चिम की राह पर होती है, तो दूसरी पीढ़ी पूरब दिशा में लालिमा बिखेरते हुए उदित हो रहे सूरज की तरह अपनी चमक लेकर प्रस्तुत होती है। पीढ़ियों के इस खो-खो खेल का परिवार और समाज एक मैदान है जिसमें आने वाली पीढ़ी के जिम्मे अपना वर्तमान संजोये रखने के साथ ही, भविष्य की पीढ़ी के फलने-फूलने के लिए जमीन भी तैयार करना होता है।

अखिल भारतीय काँग्रेस समिति के हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न हुए अधिवेशन में यह एक स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया कि पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए पार्टी में उदित हुई नई पीढ़ी को देश में पनप रही नई पीढ़ी को खुशहाली से जोड़ने के लिए एक नये सोच और नये जोश के साथ आगे आना होगा। बुजूर्ग पीढ़ी के कद्दावर नेताओं ने अपनी पार्टी के प्रति लोगों में विश्वसनीयता बढ़ाने, विशेषकर नये मतदाताओं की अपेक्षा के अनुरूप खरे उतरने के लिए नव उदित लोगों के सशक्त कांधों पर नेतृत्व का भार सौंपने की आवश्यकता को बड़ी गंभीरता के साथ महसूस किया। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी और श्री अर्जुन सिंह जैसे दीर्घकालीन राजनैतिक अनुभव वाले पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं ने जिस तरह से पार्टी में उभर रहे नये नेतृत्व को जिम्मेदारियां सौंपने की बात उठाई है, उससे यह सांफ हो गया है कि कॉग्रेस ने देश के बदलते तेवर को समझ लिया है और उसी के अनुरूप वह युवा नेतृत्व के जरिए काँग्रेस पार्टी के आधार को और अधिक मंजबूत करना चाहती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्री लाल बहादुर शास्त्री के बाद काँग्रेस की जड़ को सींचने में नई पीढ़ी ही सदैव आगे आई है। केन्द्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का नेतृत्व हो या राज्यों में नेतृत्व की बागड़ोर सम्हालने का मामला हो, उसमें भी युवा नेताओं के योगदान के कई उदाहरण मिलते हैं। प्रदेशों में भी 50 वर्ष की आयु से कम आयु के काँग्रेस नेताओं ने सत्ता और संगठन का नेतृत्व सम्हालकर काँग्रेस का जनाधार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में काँग्रेस में वह बुजूर्ग पीढ़ी मौजूद है, जिसने अपने युवाकाल में काँग्रेस के अनुशासन, उसके सिद्धान्तों उसकी नीतियों और उसकी मर्यादाओं का पालन करते हुए देश के विकास में भागीदारी बढ़ाई और सामाजिक सद्भाव के माहौल को बरकरार रखा।

वर्तमान में काँग्रेस की चौथी पीढ़ी एक नये जोश और नये तेवर के साथ जनता के बीच में आ चुकी हे जो काँग्रेस के राष्ट्रीय दृष्टिकोण तथा क्षेत्रीय और स्थानीय जनभावनाओं के अनुरूप प्रतिनिधित्व करने का माद्दा रखती है। हालांकि इस पीढ़ी के समक्ष पार्टी के भीतर के ही कुछ परम्परागत शुभ-अशुभों को झेलने की चुनौतियाँ हैं। इसके साथ ही विपक्षी राजनैतिक दलों द्वारा काँग्रेस के भावी नेतृत्व के प्रति नफरत फैलाकर लोगों को दिग्भ्रमित करने के हथकंडों और साजिशों से भी नई पीढ़ी के उभरते नेताओं को दो-दो हाथ करना पड़ेगा। ऐसे माइनस पाइंट्स के बीच युवा नेतृत्व को प्लस पाइंट प्राप्त करने के लिए कई तरह की लंगड़ी-मित्र के गणितों को भी हल करना पड़ेगा।

अधिवेशन में यह बात रेखांकित की गई कि काँग्रेस एक मात्र ऐसा राजनैतिक दल है जो समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है। काँग्रेस ही है जो भारत की भावनाओं को समझती है। वर्तमान में जितने भी राजनैतिक दल हैं उनका जन्म विपक्ष की सशक्त भूमिका के निर्वहन के लिए हुआ था। लेकिन देश की प्रजातांत्रिक प्रणाली ने ऐसे अवसर प्रदान किए कि जो विपक्ष की भूमिका में थे वे पक्ष में आ गये और पक्ष विपक्ष में चला गया। देश का संवैधानिक ढांचा जनभावनाओं के अनुरूप तैयार किया गया, जिसमें प्रत्येक नागरिक को सत्ता तक पहुँचने का अधिकार प्राप्त है। अपने छ: दशक के प्रजातांत्रिक ढांचे के दौरान देश में जिस तरह के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक अनुभव सामने आये हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए नेतृत्व के लिए तैयार हो रही नई पीढ़ी को राजनैतिक शुचिता को बरकरार बनाये रखने की चुनौतियों का सामना करना होगा। काँग्रेस पार्टी ने अपनी पार्टी के आदर्शों सिद्धांतों और मर्यादाओं को महत्व देते हुए अधिवेशन में यह मन बनाया है कि बुजूगर्ों की छत्र-छाया में नौजवान पीढ़ी को आगे बढ़ाया जाय। सभी वरिष्ठ और बुजूर्ग़ काँग्रेसी नेताओं का एक ही स्वर था कि राहुल गांधी को अपनी नौजवान टोली के साथ काँग्रेस पार्टी के जनाधार को बढ़ाने का जिम्मा सौंपा जाय। क्योंकि एक मोटे अनुमान के तौर पर देश में 60 से 65 प्रतिशत की आबादी युवा वर्ग की है। प्रतिवर्ष नई सोच और नई विचारधारा लिए हुए बड़ी संख्या में नौजवान लोग मतदाता सूची में प्रथम बार अपना नाम लिखवाते हैं। ये नौजवान राजनीति के परम्परागत तौर तरीकों से ऊबकर राजनीति में कुछ नया देखने और नया करने के लिए उतावले दिखाई देते हैं। नई पीढ़ी को आगे करने के साथ ही बुजूर्ग नेता सचेत भी करते जा रहे हैं। अधिवेशन में श्री अर्जुन सिंह की यह टिप्पणी इस दिशा में विशेष मायने रखती है। उन्होंने कहा था कि पार्टी नांजुक दौर से गुंजर रही है, काँग्रेस को सोच समझकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा- मैं जीवन के अंत में पहुँच रहा हूँ, मुझे कौन क्या समझता है, परवाह नहीं। मैं भारी मन से ये बाते कर रहा हूँ।'' उन्होंने राहुल को काँग्रेस का भविष्य बताया और कहा कि मुझे राहुल में संभावनाएँ दिखती है। अधिवेशन में नौजवान पीढ़ी पर भविष्य की उम्मीदों का दारोमदार सौंपने के मामले में प्राय: सभी एकमत थे। इस समय राहुल गांधी के साथ एक बड़ी युवा टोली है जो अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखती हें और जिनके परिवार में काँग्रेस की पारंपरिक मर्यादाओं का पालन होता रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त, संदीप दीक्षित जैसे युवा तो संसद में अपने-अपने क्षेत्रों का बड़े दमखम के साथ प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनके अलावा इन्हीं के हमजोली हजारों कार्यकर्ता हैं जो देशभर में फैले हैं और वे इस तरह की युवाओं की टोली के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काँग्रेस पार्टी की ताकत बनकर उसका जनाधार को बढ़ाने में सक्षम और समर्थ सिद्ध हो सकते हैं।

काँग्रेस के इस सत्रहवें अधिवेशन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जायगी जिसके तहत युवा पीढ़ी को पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए मैदान में आने का मौका मिल सकेगा।

 

नीरज नैयर