स्कूल हैं बेहाल, झाबुआ हो या भोपाल

अमिताभ पाण्डेय

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     झाबुआ जिले के पेटलावद विकासखण्ड अन्तर्गत ग्राम सारंगी, जामली, बड़ा सलूनिया, सहित कुछ अन्य दूरस्थ गांवों के स्कूलों में पहली कक्षा से पाँचवी कक्षा तक के बच्चों को पढ़ाने का काम बस एक या दो शिक्षक ही कर रहे हैं। सभी बच्चों को एक साथ बिठाकर अलग अलग कक्षा की पढ़ाई कैसे करवाई जाती है यह देखना आश्चर्यजनक है।

भोपाल के हर्षवर्धन नगर स्थित स्कूल में पहली कक्षा से पाँचवी कक्षा तक 80 से ज्यादा बच्चों को एक ही कमरे में बिठाकर शिक्षक पढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार भोपाल के समीप सूखी सेवनियाँ गांव के स्कूल में लगभग 150 बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी एकमात्र शिक्षक द्वारा निभाई जा रही है।

स्कूलों में पर्याप्त शिक्षकों का अभाव बताने वाली यह तस्वीर केवल झाबुआ या भोपाल जिले में ही नहीं है। मध्यप्रदेश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों, नगरीय क्षेत्रों के स्कूल लम्बे समय से शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। पेटलावद विकासखण्ड के शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते है ब्लाक में लगभग 200 शिक्षकों की कमी है। भोपाल में तो मंत्री, मुख्यमंत्री का बसेरा है। शासन के जिम्मेदार अफसरों का स्थायी डेरा है इसके बावजूद भी यहाँ के स्कूलों में शिक्षकों की कमी बरकरार है। यहाँ 80 से ज्यादा बच्चों को पढ़ाने के लिए केवल एक ही शिक्षक को तैनात किया गया है। स्कूल में पहली से पांचवी तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए कुल जितने शिक्षकों के पद है वे या तो रिक्त पड़े है अथवा उन पदों पर पदस्थ शिक्षक गैर शैक्षणिक कार्य में संलग्न कर दिये गये है। पढ़ाई के अलावा दूसरी शासकीय सेवाओं में संलग्न रहने से शिक्षकों को क्या लाभ होता है यह तो वे ही जाने, लेकिन विद्यार्थियों का नुकसान होता है। शिक्षा विभाग के आला अफसर बखूबी यह जानते है कि एक शिक्षक पहली से पांचवी कक्षा तक के सभी बच्चों को नहीं पढ़ा सकता, इसके बावंजूद अलग-अलग कक्षाओं के लिए अलग-अलग शिक्षकों की नियुक्ति लम्बे समय तक नहीं की जाती। शिक्षा विभाग में अटैचमेंट भी एक बड़ी बीमारी है जिसका नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। एक ओर शिक्षा विभाग पहले ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है और जो शिक्षक है उनकों भी यदि किसी अन्य विभाग में अटैच कर दिया गया है तो इसके बाद स्कूलों का हाल क्या होगा। शिक्षा की गुणवत्ता का क्या होगा इसको आसानी से समझा जा सकता है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और बेहतर गुणवत्ता न होने के कारण ही लोग अपने बच्चों को निंजी स्कूलों में भारी रकम खर्च कर पढ़वाना पसंद करते है। एक कमरे में पहली कक्षा से पांचवी कक्षा तक के सारे बच्चों को बैठाकर एकमात्र शिक्षक क्या और कैसे पढ़ाता होगा, इसे देखना और समझना जरूरी है। शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए सम्बन्धित स्कूलों के प्रधानअध्यापकों से लेकर ग्राम पंचायत के सरपंच तक सभी ने जो अर्जी दी वह फाईलों में कहीं उलझकर रह गई लगती है। इस कारण जिन स्कूलों में शिक्षकों की कमी है वहाँ आज तक पर्याप्त संख्या में शिक्षकों को पदस्थ नहीं किया जा सका है। सरकार के जो प्रभावशाली लोग है उनमें से अधिकांश को सरकारी स्कूलों से ज्यादा सरोकार इसलिए नहीं है कि उनके बच्चे महंगे-महंगे निंजी स्कूलों में पढ़ते है। शायद इसीलिए आम धारणा यह बनती जा रही है कि शिक्षक और संसाधनों की कमी से जूझ रहे सरकारी स्कूल केवल उन लोगों के लिए ही है जो अपने बच्चों को निंजी स्कूलों में महंगी पढ़ाई नहीं करवा सकते हैं। स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए जनप्रतिनिधि मांग उठाते हैं, लेकिन समय रहते अधिकारी उन पर ध्यान नहीं देते। अधिकारियों की इसी उदासीनता के कारण झाबुआ जिले के कालीघाटी गांव के लोगों ने शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए एक दिन स्कूल में तालाबंदी कर पेड़ पर स्कूल लगाया था। इस ध्यानाकर्षण के बाद वहाँ शिक्षक पर्याप्त संख्या में पहुँचा दिये गये, लेकिन आसपास के गांव में स्कूलों को आज भी पर्याप्त शिक्षकों का इंतजार है।

यह प्रसन्नता का विषय है कि स्कूल शिक्षा मंत्री लक्ष्मण सिंह गौड़ ने शिक्षकों के रिक्त पदों को शीघ्र भरे जाने, अटैचमेंट की नुकसानदेह परम्परा समाप्त किये जाने की घोषणा कर दी है। इसका स्वागत किया जाना चाहिये, परन्तु यह भी देखा जाये कि शिक्षा मंत्री की घोषणा पर कितना अमल होता है। प्राय: देखा गया है कि शिक्षकों का अटैचमेंट समाप्त किये जाने की घोषणाएं प्रभावी परिणाम नहीं दे पाई है। होता यह है कि शिक्षक अपना अटैचमेंट समाप्त हो जाने के महीने पन्द्रह दिन बाद फिर से जोड़ तोड़ कर वापस अपना अटैचमेंट करवाने में सफल हो जाते हैं। यकीन मानिये ऐसे अनेक शिक्षक है जो पढ़ाना नहीं चाहते उनकी रूचि दीगर विभाग में अटैच हो जाने में ज्यादा रहती है। ऐसे शिक्षक अपने राजनीतिक प्रशासनिक सम्पर्कों का उपयोग करके अपने अटैचमेंट को जारी रखने में सफल भी हो जाते हैं। इसी प्रकार अनेक शिक्षक अपने घर के पास के स्कूल में ही रहना चाहते हैं। बहरहाल यदि प्रदेश के स्कूलों में पर्याप्त संख्या में शिक्षकों को पदस्थ कर दिया जाये तो सरकारी स्कूलों की लोकप्रियता बढ़ सकती है तथा गुणवत्तायुक्त शिक्षा का सपना साकार हो सकता है।

 

अमिताभ पाण्डेय