परिवार के अस्तित्व पर मंडराता संकट

डॉ. गीता गुप्त

विगत दस-पन्द्रह वर्षों में समाज में तेंजी से परिवर्तन हुए हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, एकल परिवार की परम्परा विकसित हो रही है। महानगरों में ही नहीं, छोटे शहरों-कसबों और गाँवों में भी परिवार बिखर रहे हैं। एक समय था, जब घर छोटे-छोटे हुआ करते थे, लेकिन उनमें पाँच-पाँच पीढ़ियाँ समा जाती थीं। अब भौतिक समृद्धि ने 'घर' के स्थान पर विशाल अट्टालिकाएँ खड़ी कर दीं, किन्तु परिवार 'हम दो-हमारे दो' या 'हम दो-हमारे एक' में ही सिमटकर रह गये।

भूमण्डलीकरण के इस दौर में देशों के बीच तो दूरियाँ कम हुईं परन्तु आत्मीय सम्बन्धों के बीच बड़ी-बड़ी खाइयाँ निर्मित हो गयीं। सम्बन्ध महज़ सम्बोधनों तक सीमित होकर रह गये। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं देती। आंखिर इन परिस्थितियों के लिए कौन दोषी है ?

प्रतिस्पद्र्धा के वर्तमान युग में शिक्षा और जीविकोपार्जन के लिए बच्चे घर से दूर जा रहे हैं। यह स्वाभाविक है, किन्तु वे अपने संवेदनशून्य, संस्कारहीन और आत्मकेन्द्रित स्वभाव का परिचय दे रहे हैं, यह गम्भीर चिंता का विषय है। संयुक्त परिवार में जहाँ एकता, सौहार्द, सहकारिता, सहिष्णुता, संवेदनशीलता आदि मानवीय गुण सहज ही बच्चों में विकसित हो जाते थे, वहीं राग-द्वेष, मनो-मालिन्य, भेदभाव आदि के लिए कोई स्थान नहीं होता था, क्योंकि घर के बुजुर्ग़ कलह-क्लेश को दूर कर तत्काल मेल मिलाप करा देते थे। लेकिन आज बच्चे-युवा, सभी एकाकीपन की पीड़ा झेलने के लिए अभिशप्त हैं। एकल परिवार में एक या दो ही बच्चे होते हैं, जिन्हें कुछ भी मिल-बाँटकर जीने-खाने की आदत नहीं रहती। ऐसे में उनका दायरा सीमित होता चला जाता है।

अब पैतृक व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहीं अपनाये जाते। बच्चे अपनी रूचि से शिक्षा ग्रहण कर व्यवसाय चुनना पसन्द करते हैं इसलिए वे घर से दूर अपना एक स्वतन्त्र संसार बसा लेते हैं, जिसमें रक्त-सम्बन्धों, इष्ट-मित्रों या आत्मीय जन तक का प्रवेश निषिद्ध है। उनके लिए धन-दौलत ही उनका इष्ट है। वे अधिकाधिक भौतिक ऐश्वर्य के स्वामी बनना चाहते हैं। उनके जीवन में भावनाओं का कोई स्थान नहीं है।

परिवार टूटने का सबसे अधिक खामियांजा बच्चों को भुगतना पड़ा है। वे मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा और मिठास से वंचित हो गये। संयुक्त परिवार में सहज ही उनमें मानवीय गुणों का विकास हो जाता था, और माता-पिता को अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता था। लेकिन अब उनमें व्यक्तित्व-विकास हेतु आवश्यक मानवीय गुणों के लिए प्रशिक्षण-केन्द्रों की मदद ली जा रही है। दादा-दादी, नाना-नानी, मामा-मामी, चाचा-चाची आदि रिश्तें बच्चों के लिए अपरिचित हो गये हैं, क्योंकि अवकाश के दिनों में अब उन्हें विभिन्न कलाओं का प्रशिक्षण दिलवाना माता-पिता की दृष्टि में अधिक महत्वपूर्ण है, ताकि बच्चे कम उम्र में कोई कीर्तिमान रच सकें।

घर में बुंजूर्गों की उपस्थिति जहाँ युवाओं के आचरण को मर्यादित रखती थी वहीं अब उनकी स्वच्छन्द जीवन-शैली में अनेक बुराईयों ने स्थान पा लिया है। धूम्रपान, मदिरा-सेवन, अनैतिक सम्बन्ध जैसी बुराइयों से जहाँ बड़ों की उपस्थिति बचाती थी, वहीं परिवार की प्रतिष्ठा का दायित्व बोध भी युवाओं को पथ-भ्रष्ट होने से रोकता था।

संयुक्त परिवार का एक लाभ यह भी था कि शारीरिक-मानसिक या आर्थिक रूप से दुर्बल सदस्य का जीवन भी अच्छी तरह कट जाता था और किसी को भार अनुभव नहीं होता था, परन्तु आज समृद्धि के बावंजूद परिजन उपेक्षा का शिकार होते हैं। पहले संयुक्त परिवार टूटे, फिर व्यक्ति के स्वार्थ ने उसे स्नेह के बन्धनों को तोड़कर आत्मकेन्द्रित होकर जीना सिखाया, फिर इसी स्वार्थ और भौतिक आकर्षणों ने उसे नितान्त अकेला कर दिया। यही कारण है कि एकल परिवार भी सुखमय जीवन का आधार नहीं है।

यदि कहा जाय कि परिवार नामक संस्था में युवाओं की आस्था कम हो रही है तो अतिशयोक्ति न होगी। उनके जीवन में बुंजुर्ग हाशिये पर जा चुके हैं। माता-पिता का हस्तक्षेप उन्हें स्वीकार नहीं और भौतिकता की चकाचौंध में वे इस कदर अंधे हो गये हैं कि मर्यादित जीवन जीना उन्हें पसन्द नहीं, फिर परिणाम क्या होगा ? तिरस्कृत,उपेक्षित बुंजुर्ग वृद्धाश्रम में आश्रम लेने के लिए विवश हैं। भारत जैसे विशाल देश में वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। माता-पिता अपनी ही सन्तान की उपेक्षा के शिकार हैं, क्योंकि उन्होंने बच्चों को जीवन-मूल्यों की शिक्षा नहीं दी। अपने सांस्कृतिक मूल्य, परम्पराएँ, आचार-विचार, मर्यादा, आदर्श आदि भुलाकर वे स्वयं भी आधुनिकता की अन्धी दौड़ में शामिल हो गये, ऐसे में उन्हें दुष्परिणाम तो भुगतना ही होगा।

तमाम स्थितियों के लिए सिंर्फ युवा पीढ़ी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आज अभिभावकों को अपने बच्चों से मित्रवत् व्यवहार करते हुए उन्हें पारिवारिक मूल्यों से अवगत कराने की आवश्यकता है। स्वयं सदाचार का आदर्श प्रस्तुत करना होगा, ताकि वे आपका अनुसरण करें। धैर्य एवं शान्तिपूर्वक उन्हें आधुनिक मिथ्याडम्बरों और पश्चिम की लहर के दुष्परिणामों का हवाला देते हुए अपनी जड़ों से जोड़े रखने का अथक प्रयास करना होगा। तभी परिवार की अवधारणा बच पाएगी और बुंजुर्ग सुरक्षित व सम्मानित जीवन जी सकेंगे।

ऐसे में, जबकि आधुनिक युवा परिवार नामक संस्था में दिलचस्पी नहीं रखते, सन्तानोत्पत्ति के लिए विवाह करके घर नहीं बसाना चाहते, बल्कि स्त्री मित्र के साथ जब तक निभे-तभी तक रहना चाहते हैं, स्पष्ट है कि उन्हें सही मार्गदर्शन की नितान्त आवश्यकता है। जीवन में धन-सम्पदा और भौतिक समृद्धि सर्वाधिक महत्वपूर्ण नहीं है। जीवन का सच्चा सुख अपने सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण, पारम्परिक मर्यादाओं के अनुशीलन और सदाचार में ही निहित है। भारतीय संस्कृति की यह एक ऐसी विशेषता है, जिससे प्रत्येक युवा को परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि वह सही जीवन-मूल्य को समझ सके और अपने लक्ष्य को पहचान सके। यदि बचपन से बीज रूप में संस्कृति के मूल्यों ने उसके ह्दय में स्थान पा लिया तो 'परिवार' के अस्तित्व पर मंडराते संकट के बादल अवश्य छंट जाएँगे।

डॉ.गीता गुप्त