3 दिसम्बर को गैस त्रासदी की बरसी पर विशेष
  न्याय का इंतजार है गैस पीड़ितों को

निलय श्रीवास्तव

 

विश्व की भीषणतम भोपाल गैस त्रासदी को कम से कम इस सदी के अंत तक तो भुलाया नहीं जा सकेगा। 23 साल बाद आज भी उस काली रात को याद कर शहरवासी सिहर उठते हैं। मानो मौत का वह भयानक मंजर कहीं दोबारा न आ जाये। गैस कांड के बाद एक पूरी पीढ़ी उसके दुष्प्रभावों को झेलते-झेलते युवा हो गई है। वे बूढ़ी आंखें, जिनके जवान बेटे चले गये वे आज जिन्दा लाश बनकर रह गई हैं। पिछली सदी की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के रूप में इतिहास के पन्नों पर अंकित गैस त्रासदी को 23 साल बीत गए हैं, लेकिन पीड़ितों के पुर्नवास तथा उपचार की समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुयी हैं। गैस पीड़ित दर-दर भटक रहे हैं। उन्हें रहने के लिए न तो मकान मिला और न ही पेंशन  किसी अन्य तरह की सुविधा।

मिक गैस के दीर्घकालीन प्रभाव के कारण अभी तक 27 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं, एक लाख से अधिक व्यक्ति विकलांग हैं, एक लाख अन्य गंभीर रोगों से पीड़ित हैं। उनकी काम करने की क्षमता घटी है। जहरीले रसायनों के कारण यूनियन कार्बाइड के आसपास की मिट्टी व भूजल भी प्रदूषित हो चुके हैं। दस बस्तियों के लगभग बीस हजार से अधिक रहवासी हैण्डपंप के माध्यम से जहरीला पानी पीने को विवश हैं। जो बीमार हैं उनकी बीमारी बढ़ती ही जा रही है, दूसरी ओर गैस पीड़ितों के उपचारार्थ करोंद में खोला गया चिकित्सालय भी गैस पीड़ितों के उपचार की तरह कम ही ध्यान दे रहा है। इस चिकित्सालय में पेट, हृदय एवं त्वचा रोगों के विशेषज्ञ पदस्थ हैं। गैस पीड़ितों के अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठनों की शिकायत है कि भोपाल मेमोरियल अस्पताल का निर्माण भारत में यूनियन कार्बाइड की संपत्ति को बेचने से मिले धन 200 करोड़ रूपए से किया गया है, किंतु रूपया देकर इलाज कराने वाले बाहरी मरीजों पर विशेष ध्यान दिया जाता है और गैस पीड़ितों की उपेक्षा की जाती है।

गैस पीड़ितों, विशेषत: ऐसी विधवाओं के लिए जिनका पूरा परिवार इस भीषण त्रासदी में मारा गया है, आर्थिक पुनर्वास के लिए बैरसिया रोड स्थित हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में दो हजार चार सौ छियासी मकान निर्मित किये गये थे। दड़बेनुमा इन मकानों का निर्माण करते समय सीवेज एवं पीने के पानी की पाइप लाइनों में निकासी की उचित व्यवस्था नहीं की गयी, जिससे कहीं-कहीं सीवेज और पाइप लाइन मिल गयी हैं। विधवाएँ गंदा पानी पीने को विवश हैं। एक तो वे पहले से ही अस्वस्थ हैं, इस प्रदूषण का भी उनके स्वास्थ्य पर अत्याधिक  दुष्प्रभाव पड़ रहा है। इस कॉलोनी में निवासरत 65 वर्षीय रईसा बी के अनुसार नगर निगम उनसे पानी वितरण के लिए 150 रूपऐ प्रतिमाह ले रहा है। रोंजगार उपलब्ध नहीं है, ऊपर से पानी के लिए 150 रूपए कहाँ से लायें। वे चाहती हैं कि उन्हें नि:शुल्क पेयजल उपलब्ध हो। यही कहना है 50 वर्षीय कुसुमलता का। गैस कांड में पति संतोष की मौत के बाद बेसहारा हो गयी कुसुम को कुछ दिन तो शासकीय मदद मिली, पर अब कोई खैर-खबर भी नहीं लेता। गैस पीड़ित विधवाओं को 750 रूपए प्रतिमाह मासिक पेंशन मिलती थी, लेकिन अब वह भी बंद कर दी गयी है। रईसा बी और कुसुमलता ही नहीं विधवा कॉलोनी की अनेक गैस पीड़ित महिलाओं ने इस तरह अपनी समस्याएं सुनायीं। किसी के यहाँ दिन में एक बार चूल्हा जलता है तो कोई असामाजिक तत्वों और दबंग लोगों से परेशान है। विधवा कॉलोनी की तीस महिलाओं के मकानों पर क्षेत्र के असामाजिक तत्वों एवं दबंग लोगों ने जबरन कब्जा कर रखा है। पुलिस में गुहार लगाने से भी न्याय नहीं मिला। अनेक विधवाएँ जिनके परिवार में सभी की मृत्यु हो चुकी है, यहाँ रहने से घबराती हैं।

गैस पीड़ित निराश्रित मोर्चा के अध्यक्ष बालकृष्ण नामदेव का सुझाव है कि जिन विधवाओं को पेंशन वितरित की जा रही है, वह मात्र 150 रूपये है, जो निराश्रित पेंशनभोगी योजना के तहत दी जा रही है। लेकिन यह योजना विशेषत: गैस पीड़ितों के लिए नहीं, बल्कि राज्यभर में चल रही है। समय बीतता जा रहा है। एक सरकार बनती है, चली जाती है, लेकिन पीड़ितों की मुश्किलें कम नहीं हुयीं। आज आवश्यकता इस बात की अधिक है कि गैस पीड़ितों की मुश्किलें कम नहीं हुयीं। आज आवश्यकता इस बात की अधिक है कि गैस पीड़ितों के आर्थिक पुनर्वास और चिकित्सा सुविधाओं को जुटाने के हर संभव प्रयास किए जाएं। अब तक अरबों रुपए गैस पीड़ितों के पुनर्वास पर खर्च करने के बाद भी स्थिति यह है कि जल, थल और वायु प्रदूषण चरम सीमा पर है। उक्त दिशा में जो कार्यक्रम मध्यप्रदेश सरकार ने चलाए थे वे पूर्णत: असफल साबित हो चुके हैं। वर्तमान में स्थिति बड़ी दयनीय तथा चिंताजनक है। गैस पीड़ित तो उपचार से वंचित रह जाते हैं, जबकि संपन्न लोग आसानी से चिकित्सा सुविधाएँ प्राप्त कर लेते हैं। पीड़ितों के लिए बनायी गयीं आवास कॉलोनियाँ जर्मन यातना शिविरों से कम नहीं। विश्व की इस भीषण त्रासदी के सही पीड़ितों की पहचान कर उन्हें यथोचित चिकित्सा व पुनर्वास देने की आवश्यकता है। शायद सरकार को यह बात कभी समझ में नहीं आएगी और गैस पीड़ित उपेक्षित रह जायेंगे।

 

 

निलय श्रीवास्तव