प्रसंग : मानव विकास प्रतिवेदन 2007 हाशिए पर सरकारी स्कूल

और बहिष्कृत बच्चे

दयाशंकर मिश्र

मारे देश में शिक्षा प्राचीन काल से ही हैसियत के आधार पर ही सुलभ रही है। राजे-रजवाडों के लिए शाही गुरुकुल होते थे तो जन सामान्य के लिए इन दिनों जैसे सरकारी किस्म के स्कूल। हिंदुओं को आचारसंहिता, धार्मपरायणता के नियम बताने वाली मनुस्मृति ने दलितों, वंचित समाज को तो स्कूलों से बाहर ही रखा था। गुरु द्रोण का धार्मसंकट समझ से परे है। क्योंकि कोई भी न्यायशास्त्र यह नहीं सिखाता कि किसी ऐसे बच्चे का अंगूठा आप ले लें, जिसने आपके स्कूल में दाखिला लिए बिना ही टॉप कर लिया हो। यह किस्सा महाभारत से होता हुआ लोकतांत्रिक भारत तक आ पहुंचा है। कमोबेश यही काम इन दिनों भारत सरकार, मप्र सरकार भी कर रही है। जनता की चुनी सरकारों ने सरकारी स्कूल के बच्चों से संसाधान छीन कर, शिक्षकों की संख्या में कमी करके उनका अंगूठा काट लिया और राजसी बच्चों के लिए धानी गुरुकुल भव्य निजी स्कूलध्द ग़ढ दिए हैं। इस कटे अंगूठे को मानव विकास प्रतिवदेन रिपोर्ट 2007 के ताजा आंकडे बखूबी दिखा रहे हैं।

      प्रतिवेदन रिपोर्ट 2007 में दिखाए गए आंकडे सरकार की नियत और इरादों को उजागर करने के लिए पर्याप्त हैं। रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में 5 से 11 आयु वर्ग के 1,81,112 बच्चे स्कूल से बाहर है। जिसमें से 51355 बच्चे वे हैं, जिनको स्कूलों में प्रवेश तो मिल गया, लेकिन विभिन्न कारणों से उन्होंने अपनी पढाई बीच में ही छोड़ दी। इसी तरह से 11 से 14 आयुवर्ग में 1,15,857 बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं, इसमें से 57317 बच्चों को अपनी पढाई बीच में ही छोड़नी पडी। तो दूसरी 5 से 14 आयुवर्ग में स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या 2,96,979 है, जिसमें से 119784 बच्चों को अपनी शिक्षा बीच में ही अधूरी छोड़नी पडी है। इस तरह हमारे सामने जो तस्वीर उभरती है, उसके मुताबिक 5,93,958 बच्चे ऐसे हैं, जो पूरी तरह से स्कूली शिक्षा से बेदखल हैं। जहां तक सुविधाओं का सवाल है तो मप्र में 2.3 प्रतिशत प्राइमरी स्कूल और 48 प्रतिशत मीडिल स्कूलों के पास भवन नहीं हैं। साथ ही पीने के पानी और शौच की सुविधााओं के मामले में स्थिति दयनीय है। 

            मानव विकास प्रतिवेदन राज्य में मौजूद जन सुविधाओं और सरकारी प्रयासों का आईना होता है। जो वस्तुत: यह बताता है कि सरकार भले ही काग़जों पर कुछ भी ऐलान करती रहे, लेकिन वास्तव में उसके जन की स्थिति कैसी है। प्रदेश के झाबुआ जिले में कुछ समय पहले ही एक पेड़ पर स्कूल लगने की बात समाने लाई है। जो बदरंग तस्वीर की झलकभर है, क्योंकि रीवा, सीधी, मंडला, धार, बैतूल जैसे जिलों में तो मुख्यत: पेड़ों के नीचे ही स्कूलों की परंपरा रही है। क्योंकि टूटी-फूटी, सीलनभरी इमारतों से भली तो प्रकृति की छांव लगती है। जर्जर स्कूल बारिश में और भी खतरनाक हो जाते हैं। मास्टर जी का ढेर सारा वक्त जनगणना के साथ समय-समय पर सरकारी डयूटी बजाने में भी बीतता रहा है। इसके बाद भी एक सच ऐसा है, जो ग्रामीण बच्चों, शिक्षकों के पुरुषार्थ को दिखाने वाला है और वह है, प्रावीण्य सूचियों में सरकारी बच्चों का दबदबा।

बीते पांच-छह वर्षों में अनेक अवसरों पर ग्रामीण बच्चों ने शहरी बच्चों से बेहतर परिणाम दिए हैं। इसका अर्थ है कि सरकारी स्कूलों में आज भी ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं है, जो संपूर्ण समर्पण के साथ बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में जुटे हुए हैं, लेकिन उनको सरकार की ओर से कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। मप्र सरकार ने कान्ट्रेक्ट शिक्षा के नाम पर पूरी शिक्षा व्यवस्था को नेस्तानाबूद कर दिया है। गुरुजीशिक्षाकर्मी जैसे पद अत्यंत अव्यवहारिक तरीकों से सृजित किए गए हैं। इनको कभी छह माह का तो कभी साल भर का वेतन एक साथ दिया जाता है। जाहिर है शिक्षकों के मन में पढाने के साथ ही दूसरे रोजगार, कमाई के प्रति चिंता रहना स्वाभाविक है, जो उनके काम पर असर करती है।

इसे इस तरह से भी समझा जाना चाहिए कि सरकार ने शिक्षण प्रक्रिया से मेधावी युवाओं को बाहर कर दिया है। वे जो गांव में रहकर काम करना चाहते हैं, उनके लिए रास्ते मुश्किल कर दिए गए है। ऐसे में सरकार को अब और भविष्य में वही लोग स्कूलों में सेवा देने के लिए मिलेंगे, जिनके पास रोजगार के दूसरे साधान सुलभ नहीं हैं। यानि उपलब्धा मानव संसाधान में से अपेक्षाकृत शिक्षित गुणी शिक्षकों की जानबूझकर हतोत्साहित किया जा रहा है। इसका परिणाम है कि बच्चों को देश के राज्य, जनसंख्या और प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के नाम के सिवाए ज्यादा जानकारी नहीं होती। रटे-रटवाए सवाल उनको कहां ले जाएंगे। जिंदगी की पाठशाला में वे उस बहुरंग से वंचित हो जाएंगे, जो नन्हे मन को संपूर्ण नागरिक बनाती है।

जैसे ही शिक्षाकर्मियों की भर्तियां निकलती है, स्थानीय नेताओं की चांदी हो जाती है। बडी संख्या में ऐसे शिक्षाकर्मी हैं, जो बच्चों को यह नहीं बता सकते कि न्यूटन, आइंस्टीन, महात्मा गांधी, स्ठीफन हाकिंग, विनोवा भावे कौन हैं। यहां तक कि वे अपने विषयों के नाम अंग्रेजी में नहीं लिख सकते हैं। स्पष्ट है कि अगली शिक्षकों की जमात कैसी होगी। विदेशी मदद से, उनके इशारे पर चलाए जा रहे शिक्षा अभियान बच्चों को औसतन साक्षर ही बना सके हैं, शिक्षा देना उनके बूते की बात नहीं है। तमाम बहुराष्ट्रीय दानदाता चाहते भी यही हैं, ताकि उनके रास्तों पर विरोधा, विचार की चिगारी न रहे। राज्य में कितने अधिकारियों, मंत्रियों, विधायकों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ रहे हैं। शायद एक के भी नहीं। इन सबके बच्चे उनकी ही कृपा से शहरों में पसरे विशाल शिक्षा परिसरों में दीक्षित हो रहे हैं।

      अब जबकि हमारे सामने पांच लाख से अधिक बच्चों की ऐसी संख्या है, जो स्कूल से बाहर हैं तो इस बारे में निजी स्कूलों की भूमिका पर भी बहस होनी चाहिए। प्रदेश की तमाम बडे शहरों में बडे-बडे औद्योगिक घरानों, मीडिया के प्रभुत्वशाली वर्ग में स्कूलकॉलेज खोलने की होड़ लगी हुई है। नाममात्र की लीज पर इफरात जमीन हासिल करने वाले इन संस्थानों में कितनी जगह गरीब बच्चों के लिए है ? दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की टपटपाती छतें, नंगी दीवारों, पेड़ के नीचे बिछी पाठशालाएं हैं। जहां सैकडों बच्चों पर एक शिक्षक है। जिसे न केवल बच्चों को गणित के सवाल हल करवाने हैं, बल्कि उनके लिए खिचडी भी पकानी है। इसके बाद भी सरकारी स्कूल के बच्चों का प्रावीण्य सूची में जगह बनाना जाहिर करता है कि इन बच्चों और उनके शिक्षकों के भीतर विपरीत स्थितियों से लोहा लेने की कुव्वत है। पिछले दिनों एक मप्र सरकार के आईएएस अफसर ने बताया कि उनके बारहवीं पास बेटे ने कभी कुएं,गांव नहीं देखे हैं। और उसे नहीं मालूम कि किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं। यह हमारी कांवेन्ट शिक्षा की नजीर है कि लाखों  बच्चों को उनकी ज़डों के बारे में कुछ नहीं मालूम। जब ऐसे बच्चे निर्णायक पदों पर नियुक्ति होते हैं, तो वे विशुध्द रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सेवक होते हैं। क्योंकि उनके पास न तो संस्कारों की शक्ति होती है और न ही अपनी देश की मिट्टी से उनका वास्ता होता है।

          इस तरह सरकार की नीतियों से हम दो तरह के बच्चे देख रहे हैं, पहले वे जिनको अंग्रेजी नहीं आती। पिछले दिनों ग्रेटर नोयडा में इसीलिए एक बच्चे ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि वह अंग्रेजी में बेहद कमजोर था। दूसरे वे जिनको अंग्रेजी तो आती है, लेकिन जिनके पास अपनी मिट्टी की महक नहीं है। उनके इंडिया शाइनिंग में भूख, रोटी के सवाल नहीं है। इसलिए ऐसे लोग या तो पूरी उम्र विश्वबैंक, विश्व व्यापार संगठन की सेवा में लगा देते हैं या फिर विदेशों के महंगे क्लर्क बन जाते हैं। ऐसे लोग जो यह कहते हैं कि उदारीकरण के दौर में स्वदेशी विचारों का कोई मतलब नहीं है, उनको क्यूबा, वेनेजुएला में पिछले कुछ समय में विदेशी कंपनियों से लडने के लिए अपनाए गए मौलिक तौर-तरीकों पर गौर करना चाहिए। इन देशों ने अपनी शिक्षा, परंपरागत संसाधानों को औजार बनाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दांत खट्टे किए हैं। दूसरी ओर हमारे नीति-निर्धारक को किसानों की सब्सिडी, रोजगार गारंटी, सरकार की सस्ती शिक्षा फूटी आंख नहीं सुहाती। अहलूवालिया, सैम पित्रोदा जैसे अंग्रेजीदां लोगों को इसकी रकम फिजूलखर्ची लगती है। वे कहते हैं कि सरकार के पास अपने बूते पर सर्वजन के लिए शिक्षा का फंड नहीं। स्कूल के लिए जमीन, भवन नहीं है। लेकिन सेज के लिए सैकडों एकड जमीन, नियम कायदों में आजीवन छूट, करों में रियायत, भारी पैदावार वाली जमीन दी जा रही हैं। स्पष्ट है कि हमारे नीति -निर्धारकों की चिंता में कहीं भी शिक्षा नहीं है। उसके लिए आवश्यक प्रयास नहीं हैं। एक-दो कमरे के स्कूलों में सैकडों बच्चे सीलनभरी दीवारों के बीच लगभग चिल्लाते हुए कभी सकपकाए मास्टर जी, को तो कभी दीवार पर रेगती छिपकलियों, टूटती छत से छांकते प्रकाश को मुट्ठी में बंद करते, टपकती बूंदों से खुद को बचाते हुए मिलते हैं। जो सरकार के तमाम दावों की पोल खोलने के लिए पर्याप्त हैं।

 दयाशंकर मिश्र