म.प्र. में लांजी विधानसभा उपचुनाव दीवार पर लिखी इबारत

वीरेन्द्र जैन

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पूर्ण बहुमत प्राप्त भाजपा शासित मघ्यप्रदेश में सत्तारूढ पार्टी तीसरा उपचुनाव भी हार गयी है। उसने यह सीट अपने पारंपरिक प्रतिद्वंदी काँग्रेस से नहीं हारी अपितु एक ऐसे युवक से हारी है जो स्वतंत्र रूप से जनहित के मुद्दे उठाने के लिए जाना जाता है और उसी संघर्ष के कारण चुनाव के दौरान जेल में था। उसने यह चुनाव जेल में रहते हुये जीता है व उन्नीस प्रत्याशियों के बीच सत्तारूढ दल के प्रत्याशी को तीन हजार से अधिक मतों से हरा कर जीता है। इससे पूर्व यह सीट सत्तारूढ दल के पास थी व उसके विधायक के निधान हो जाने के कारण ही खाली हुयी थी। अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने दिवंगत विधायक की पत्नी को ही टिकिट दिया था ताकि सहानुभूति को वोटों में भुनाया जा सके और ऐसा हुआ भी। पर सरकार के कामों के खिलाफ जन भावनाएं इतनी तीव्र थीं कि सहानुभूति के वोट भी भाजपा उम्मीदवार को विजयश्री नहीं दिला सकी। इस चुनाव में पूरी राज्य सरकार अपने सम्पूर्ण प्रशासनिक दुरूपयोग के साथ सयि रही और स्वयं मुख्यमंत्री ने इस छोटे से क्षेत्र में 52 आम सभाओं को सम्बोधित किया। किसी अभियान के लिए जितनी ताकत झौंकी जाती है उसमें मिली पराजय भी उतनी ही गम्भीर और विचारणीय होती है। भाजपा की लगातार यह तीसरी पराजय भी चिंतन का कारण बनना चाहिये। स्मरणीय है कि इससे पूर्व भाजपा ने प्रदेश भर में विकास यात्राएं निकाली थीं किंतु पोस्टरों से जब तक अनुभवों का साम्य नहीं बैठता तब तक सारी कवायद निरर्थक ही साबित होती है।

चुनाव परिणामों पर भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया भी स्वयं अपनी ही सरकार पर कटु टिप्पणी की तरह थी। उनका कहना था कि यह जीत नक्सलियों की जीत है। क्या भाजपा नेताओं और सरकार को इस बात पर गम्भीरता से विचार नहीं करना चाहिये कि आखिर विकास यात्राओं के सरकारी प्रचार के बावजूद भी नक्सली साधानहीन होते हुये भी अपने समर्थित उम्मीदवार को जिता ले जाते हैं!

इस चुनाव में विजयी उम्मीदवार किशोर समरीते ने समाजवादी पार्टी के चुनावचिन्ह पर चुनाव लडा था पर यह जीत समाजवादी पार्टी की जीत नहीं है। अमरसिंह के इशारों पर चलने वाले मुलायम सिंह का अब समाजवादी विचारधारा से कोई वास्ता नहीं रहा वे तो केवल अपनी दुकान चलाने के लिए जगह जगह पर समर्थ लोगों को पार्टी की फ्रैन्चाइजी देते रहते हैं व अपना ब्रान्ड चलाये रखने के लिए भरपूर दौलत भी खर्च करते हैं पर ऐसे उधार के लोग उनके पास बहुत दिनों तक नहीं टिकते और जल्दी ही दूसरी दुकान पर अपनी बोली लगवाने लगते हैं इस चुनाव परिणाम के कुछ ही दिन बाद सपा के एक विधायक का भाजपा मुख्यमंत्री के मंच पर उपस्थित पाया जाना साफ संकेत देता है। संघर्ष से नेता बना यह युवक अपने में भिन्न है व इस दौर के समाजवादी नेतृत्व से उसका साम्य देर तक नहीं बैठेगा।

इस चुनाव के दौरान सारे विश्लेषक भाजपा की पराजय की भविष्यवाणी कर रहे थे और मान रहे थे कि इस असंतोष का लाभ काँग्रेस ही उठा सकती है पर काँग्रेस अपनी सांगठनिक कमजोरियों के कारण यह लाभ नहीं उठा सकी। आगामी चुनाव के लिए काँग्रेस के लिए भी ये चुनाव परिणाम बडी चेतावनी की तरह हैं। अगर उसने सांगठनिक सुधार के कार्यक्रम नहीं चलाये तो  सत्ता में  आने का उसका सपना कहीं मृगमरीचिका साबित न हो!  यह क्षेत्र कमलनाथ के प्रभावक्षेत्र का हिस्सा है वे इस क्षेत्र में काँग्रेस उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाने की जिममेवारी से अपने को अलग नहीं कर सकते।

इस उपचुनाव में दो पूर्व सांसद समानतादल के राष्ट्रीय अधयक्ष सुखलाल कुशवाहा व कंकर मुंजारे ने भी न केवल अपनी जमानत ही गंवायी अपितु निर्दलियों से भी कम वोट पाकर अपना सम्मान भी गंवाया और अपनी समझ पर भी सवाल ख़डे करवाये। यदि सुनिश्चित पराजय वाले चुनाव किसी वैचारिक प्रचार के लिए नहीं लडे जा रहे हों तो वो उम्मीदवार की दूरदृष्टि पर ही प्रश्न ख़डा करते हैं और जनभावनाओं से उनकी दूरी का भी परिचय देते हैं। इस उप चुनाव में एक और पूर्वसांसद प्रह्लाद पटेल की लोकप्रियता पर भी सवाल ख़डा किया है जो उनका क्षेत्र रहा है पर वे अपने उम्मीदवार को जमानत जब्त पराजय से नहीं रोक सके जबकि उस क्षेत्र में 32000  लोधी वोट थे।

इस उपचुनाव में जातिवाद ने अपना काम नहीं किया जबकि सभी प्रमुख दलों ने अपने उम्मीदवार लोधी जाति में से ही चुने थे पर किसी को भी इकतरफा जाति के वोट नहीं मिले। जब रोजी रोटी की लडाई लडी जाती है तो ना तो राममंदिर का शगूफा लोंगों को बहका पाता है और ना ही रामसेतु का । इस आदिवासी बहुल क्षेत्र में मतदाता द्वारा राष्ट्रीय ही नहीं राज्य स्तर के दलों को भी नकार कर एक संघर्ष करने वाले युवा नेता को तरजीह देना दीवार पर लिखी इबारत है जिसे सबको पढ लेना चाहिये। एक कहावत है कि 'बुढिया के मरने का गम नहीं है पर गम तो यह है कि मौत ने घर देख लिया है'। देखना है कि इस घटना से कौन कितना सबक लेता है!

वीरेन्द्र जैन