भाजपा की हार आत्ममुग्धता के कारण
कुमार

लान्जी में चुनाव की तैयारियां हो रही थी और भाजपा के सारे बडे नेता ग्लोबल समिट में लगे हुए थे, इसे क्या माना जाना चाहिए? जीत के प्रति अतिआत्मविश्वास या हार की सुनिश्चितता! लांजी विधानसभा चुनाव परिणाम पर भारतीय जनता पार्टी की चुप्पी आश्चर्यजनक है। सामान्यत: चुनाव में पराजय के बाद राजनीतिक दल पराजय के लिए दसियों कारण गिनाते हैं लेकिन भाजपा इस दिशा में एकदम खामोश है। भाजपा नेताओं को शायद पहले से पता था कि अब उलटी गिनती शुरू हो गई है। इस विधानसभा उपचुनाव परिणाम को लेकर भाजपा के माथे पर न तो चिंता है और चिंतन करने का कोई ठोस कारण। वह तो आत्ममुग्धा है कि मधयप्रदेश के पचास साल की उम्र में पहली दफा पूरे चार साल राज करने को मिले हैं और खरामा खरामा एक साल और भी गुजर जाएंगे। दुबारा सत्ता में नहीं आ पाने का विश्वास भी शायद राज्य में भाजपा को बन चला है इसलिए वह खुद के लिए सपने बुन रही है और इसी सपनीली दुनिया में राज्य की जनता को भी रखना चाहती है। लांजी में हार से मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान को जरूर धक्का लगा होगा क्योंकि दो साल के कार्यकाल में वर्षगांठ के ठीक पहले तोहफा के रूप में हार मिली है। 

राज्य में भाजपा सरकार के कार्यकाल का एक वर्ष और शेष है। एक वर्ष बाद राज्य में विधानसभा का चुनाव होगा और लगभग इसी समय लोकसभा का भी। यह तब संभव है जब भाजपा के भीतर महाभारत न मचे और मुख्यमंत्री श्री शिवराज के खिलाफ बिगुल न फूंका जाए। भाजपा के पिछली कार्यशैली और फैसलों पर नजर डाली जाए तो परिवर्तन उनकी स्थायीत्व पहचान है और इस नाते जब शिवराज के दो साल पूरे होने को हैं तब उनके परिवर्तन की बात न चले, यह भाजपा के चरित्र से अलग होगा। संभव है कि शिवराज के सामने ख़डा गुट उनकी असफलता गिन रहा हो और लांजी के पहले शिवपुरी के पराजय को वह मुद्दा बनाकर बदलाव की बात करे। कहने वाले तो कहते हैं कि शिवराज के नेतृत्व में ही अगला चुनाव लडा जाएगा लेकिन यह तब संभव है जब भाजपाई खुद भीतर से लडना बंद करें। शिवराज के बदले जाने के पीछे तक यह भी दिया जाएगा कि दो विधानसभा चुनाव में पराजय की छाया इंदौर जिले के सांवेर विधानसभा उपचुनाव और खरगोन में होने वाले लोकसभा उपचुनाव पर भी पडे।

यह सोच भाजपा के लिए खयालीपुलाव से कम नहीं हैं क्योंकि शिवपुरी और लांजी विधानसभा उपचुनाव परिणाम ने जता दिया कि भाजपा को अपना घर ठीक कर लेना चाहिए। इन परिणामों की पुनरावृत्ति सांवेर में हो और खरगोन भी इसका अनुसरण करे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बीते चार वर्षों में भाजपा सरकार की योजनाएं कागज पर रही हैं। जहां जहां सफलता मिली, उसे अपने हिस्से में गिना दिया और जहां सफलता में बाधा आयी तो केन्द्र सरकार के मत्थे मढ दिया। जिम्मेदारी से बचती मधयप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार को यह जान लेना चाहिए कि राज्य सरकार के अपने बूते पर बनाये गए थोड़े से कल्याणकारी योजनाएं हैं जबकि अधिकांश योजनाओं में केन्द्र सरकार की भागीदारी और आर्थिक सहयोग है। वह रोजगार उपलब्धा कराने के लिए रोजगार गारंटी योजना हो या चलने के लिए मलाईदार सडकों के लिए प्रधानमंत्री सडक योजना, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अलग अलग किस्म की केन्द्रीय योजनाएं और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए स्कूल चलो अभियान में भी केन्द्र सरकार की मदद है। यह ठीक है कि केन्द्र में कांग्रेस गठबंधान सरकार है तो उसे कोसना भाजपा का राजनीतिक दायित्व है लेकिन राज्य में अपराधा का जो ग्राफ दिनों दिन बढता चला जा रहा है, उसमें केन्द्र कैसे जिम्मेदार होगा, इस बात को राज्य की भाजपा सरकार जनता को समझाए? समझा सकेगी तो आने वाले चुनाव परिणाम उसकी झोली में होगा और नहीं तो हार के लिए भाजपा तैयार है ही।

लांजी चुनाव परिणाम को लेकर कांग्रेस को चिंतन की जरूरत होगी। प्रदेश कांग्रेसाधयक्ष सुभाष यादव इस बात को लेकर निश्चित हो गए थे कि उनकी कुर्सी बच गई है और नेता प्रतिपक्ष जमुनादेवी आरोपों से शिवराज सरकार को जख्मी कर खुश हो रही थीं लेकिन लांजी चुनाव परिणाम से उन्हें चिंता करना चाहिए कि क्या मधयप्रदेश में कांग्रेस इन चार सालों में इतनी कमजोर हो गई है कि उसके प्रत्याशी की जमानत भी न बच सके। वर्तमान मे प्रदेश कांग्रेस की कमान सम्हालने वाले सुभाष-जमुनादेवी को चिंतन और मनन करना चाहिए। यहां याद दिलाना बेहतर होगा कि इसी मधयप्रदेश में दिग्विजयसिंह सरकार के पहले पांच साला कार्यकाल के बाद उनके पराजय की राजनीति समीक्षकों ने ताल ठोंककर घोषणा की थी लेकिन वे पूर्ण बहुमत के साथ आए और लगातार दस वर्षों तक शासन करने का रिकार्ड कायम किया। क्या इस पराजय और इसके पहले मिली पराजय से सीख से लेकर कांग्रेस के राज्य के कर्णधार राज्य में कांग्रेस की जीत पक्की कर पाएंगे? भाजपा का जाना तो तय माना जा सकता है लेकिन कांग्रेस की वापसी की गारंटी भी तय करनी होगी।

   कुमार