सिख समाज की अनुकरणीय पहल

महेश बागी

र्म का अर्थ होता है धारण करना यानी अच्छे संस्कार, विचार और व्यवहार अपनाना। भारत में सिंर्फ सिख धर्म ही ऐसा है, जो 'गुरुवाणी' की न सिंर्फ आराधना करता है, बल्कि उसे आचरण में लाने की भी पूरी कोशिश करता है। हाल ही में दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी ने एक आचार संहिता की घोषणा की है, जिसमें विवाह को सादगी से आयोजित करने पर बल दिया गया है। इस आचार संहिता के प्रति कमेटी कितनी गंभीर है, इसका अंदांज इसी से लगाया जा सकता है कि इसका उल्लंघन करने पर एक वरिष्ठ ग्रंथी को निलंबित कर दिया गया है। गुरुद्वारा कमेटी को यह निर्णय क्यों लेना पड़ा ? समाज में सादगी और समरसता के लिए दंड की व्यवस्था क्यों की गई ?

दरअसल इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला यह कि भ्रूण हत्या के मामले में पंजाब शीर्ष पर है और दूसरा यह कि सिख समाज में शादियों पर इतना आडंबर किया जाने लगा कि गुरु ग्रंथ साहिब में दी गई व्यवस्थाएँ पार्श्व में चली गई। एक समय था जब इस धर्म में होने वाले  सादगीपूर्ण विवाह अन्य धर्मावलंबियों के लिए मिसाल होते थे। गुरु-द्वारा में होने वाली शादियों पर मात्र सवा रुपए  खर्च आता था। वर-वधू गुरु ग्रंथ साहिब की परिक्रमा करते थे। इसे 'आनंद कारज' कहा जाता था, जिस पर मात्र आधा घंटे से भी कम समय लगता था। इस अवसर पर किसी भी प्रकार का कर्मकांड नहीं होता था। सिखों के अलावा केश कटवा लेने वाले मोना सिख भी इसी परंपरा से विवाह प्रक्रिया सम्पन्न करते आए हैं। सिख धर्म में सादगी की यह मिसाल खुद धर्मगुरूओं द्वारा प्रेरित है। तीसरे धर्मगुरू अमरदासजी ने अपनी बेटी की शादी उस व्यक्ति से की थी, जो अनाथ तो था, लेकिन मेहनतकश भी था। जेठा भाई नामक यह व्यक्ति उबले चने बेच कर भरण पोषण करता था और शेष समय गुरुद्वारे में सेवा करता था। गुरु अमरदास जी ने बाद में उन्हें गुरु की पदवी सौंपी और धर्म के सर्वोच्च पद पर बैठाया। बाद में यही जेठा जी, रामदास जी कहलाए, जिन्होंने अमृतसर जैसा शहर बसाया।

यह उदाहरण बताता है कि सिख धर्म सादगी, कर्म और कर्मठता पर बल देता है। इस धर्म के अनुयायियों ने अपने गुरुओं के संदेश को आत्मसात किया और हर अच्छे-बुरे वक्त में कर्मठता को अपने से दूर नहीं होने दिया। याद कीजिए विभाजन के दौर को, जब पाकिस्तान से लुटे-पिटे सिख भारत आए थे। उनके पास सिंर्फ अपनी कर्मठता की पूंजी थी, जिसके बल पर उन्होंने अपना वंजूद फिर से खड़ा किया। उद्योग, व्यापार और खेती से लेकर परिवहन-इंजीनियरिंग तक हर क्षेत्र में कड़ी मेहनत से वे अपने पैरों पर खड़े हुए। उन्होंने न सिंर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में अपनी कर्मठता की मिसाल कायम की। इसीलिए आजकल यह कहा जाने लगा है कि पूरी दुनिया में कहीं भी निकल जाओ, वहाँ एक पगड़ीधारी(सिख) जरूर मिल जाएगा। समाज में अपना स्थान बनाने के बाद सिखों पर विभाजन के बाद दूसरा आघात तब पड़ा, जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई और इसकी प्रतिक्रिया में सिखों को दंगों का सामना करना पड़ा। सिखों ने इस संकट का भी सहजता से सामना किया और अपना कर्म करना जारी रखा।

कहते हैं कि लक्ष्मी अपने साथ कुछ अवगुण भी लेकर आती है। सिखों के साथ भी ऐसा ही हुआ। अमीरी ने गुरु ग्रंथ साहिब के उपदेशों को तिरोहित कर दिया समाज में शादियों पर इतना आडंबर होने लगा कि लोग सकते में आ गए। शादी के रिश्तों में सादगी और कर्मठता के बजाय व्यक्ति की माली हालत तौली जाने लगी। आडंबर की हद तो तब हो गई जब हेलिकॉप्टर से दूल्हे उतरने लगे और विमानों में डोलियों की बिदाई होने लगी। व्यावसायिकता की इस चकाचौंध ने मध्य और निम्न वर्गीय सिखों को परेशानी में डाल दिया। अच्छे रिश्ते उनसे दूर होते गए और हर जगह यह देखा जाने लगा कि सामने वाले की आय-व्यय की क्या स्थिति है। इसी स्थिति ने आम सिख को लिंग परीक्षण और भ्रूण हत्या करने के लिए मंजबूर किया। हालात इतने बिगड़ गए कि भ्रूण हत्या में पंजाब शीर्ष पर आ गया और लड़कों की तुलना में लड़कियों का ग्राफ तेंजी से नीचे गिरने लगा। इस सामाजिक असंतुलन को नियंत्रित करने के लिए गुरुद्वारा कमेटी को आगे आना पड़ा। उसने फरमान जारी कर दिया कि अब सारी शादियां गुरुद्वारों में ही होंगी और उनमें पूरी तरह सादगी बरती जाएगी यानी भव्य पंडाल, आतिशबांजी, ढोल ढमाके के साथ शराब और मांसाहार की छुट्टी। निम्न और मध्य वर्ग ने इस फरमान को हाथों-हाथ लिया तो उच्च वर्ग को भी अपनी अमीरी को दरकिनार कर सादगी से शादी करने को मजबूर होना पड़ा।

समाज को सही दिशा में लाने के लिए गुरुद्वारा कमेटी का यह निर्णय आज एक ऐसी मिसाल बन गया है, जिससे अन्य धर्मावलंबियों को भी प्रेरणा लेने की जरूरत है। दहेज का दानव आज अपने पैर किस कदर पसार चुका है, यह बताने की जरूरत नहीं है। टी.वी. चैनल्स पर रोंजाना ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें दहेज को लेकर बहुओं को घर से निकालने या जला कर मारने जैसे अमानवीय कृत्य किए जाते हैं। कई बार लोग अपनी बेटियों की हत्या सिंर्फ इसलिए कर बैठते हैं, क्योंकि वे उनके लिए दहेंज जुटाने में असमर्थ थे। ऐसी घटनाओं के आलोक में यह देखे जाने की जरूरत है कि गुरूद्वारा प्रबंध कमेटी के सादगीपूर्ण विवाह के फरमान को अन्य धर्मावलंबी कितनी गंभीरता से लेते हैं ? बात-बेबात धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के नाम पर सड़कों पर हुड़दंग करने वाले धर्म के ठेकेदार सिख समाज की इस अच्छी और अनुकरणीय पहल को आत्मसात् न कर सकें तो इसका अर्थ यही होगा कि वे धर्म के नाम पर पाखंड कर रहे हैं और झांकीबांजी के जरिये सिंर्फ अपनी दुकान चला रहे हैं।

महेश बाग