रूस जैसे दोस्त को खोने का मतलब
नीरज नैयर

'तुम्हें गैरों से कब फुर्सत और हम गम से हैं कब खाली, चलो बस हो गया मिलना न तुम खाली न न हम खाली' भारत और रूस के बदलते रिश्तों पर यह शेर बिल्कुल सटीक बैठता है। दोनों के संबंधों को लेकर अब तक चली आ रही खुसफुसाहट विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी और रक्षामंत्री ए.के. एंटोंनी की रुस यात्रा के बाद खुलकर सामने आ गई हैँ एक तरफ जहाँ विश्लेषक रूसी नेतृत्व और जनमत की बेरुखी से हैरान हैं वहीं भारतीय दूतावास की चिंता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की 11-12 नवंबर को प्रस्तावित मास्को यात्रा को लेकर है। उन्हें डर है कि कहीं प्रधानमंत्री को भी रूसियों के रुखेपन का सामना न करना पड़े।

भारत और रूस के संबंध बहुत पुराने हैं सोवियत संघ विघटन के पूर्व से ही दोनों देश एक दूसरे के सुख-दुख के साथी रहे हैं। मगर सही मायने में दोनों के रिश्तों की शुरूआत 1954 में स्टालिन की मृत्यु के बाद हुई। उस वक्त रूस की आंतरिक राजनीति और अंतराष्ट्रीय स्थिति में ऐसे निर्णायक मोड़ आए कि दोनों देश एक-दूसरे के नंजदीक आते चले गये। कश्मीर के मसले पर रूस द्वारा भारत को समर्थन देने पर दोनों के बीच मैत्री संबंधों का सूत्रपात हुआ। वैसे रूस ने शुरूआत में भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का न सिर्फ विरोध किया, बल्कि उसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पिछलग्गू श्वान, अमेरिकी पूंजीवादी दलाल जैसे नाम दे डाले। मगर वक्त के साथ-साथ यह कड़वाहट खत्म हो गई। हालांकि इसके पीछे उसका मकसद अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व को रोकना था। अमेरिका उन दिनों बहुत तेंजी से एशिया पर अपनी पकड़ मंजबूत करने की जल्दबांजी में था और उसकी इसी जल्दबांजी ने भारत और रूस को नंजदीक आने का मौका दिया। इसके बाद दोनों देशों ने दोस्ती की राह पर चलते हुए कई आयाम स्थापित किए, रूस ने भारत का हर कदम पर साथ दिया फिर चाहे वह सुरक्षा परिषद में दांवेदारी की बात हो फिर आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा। उसने न सिर्फ भारत की सैन्य तांकत को मंजबूती प्रदान की बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की पहचान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 1962 में चीन युद्ध के दौरान भी रूस ने भारत का समर्थन किया, जबकि वह खुद चीन को नारांज करने के पक्ष में नहीं था। हालांकि इस युद्ध में भारत को हार का सामना करना पड़ा, तब यह बात उठने लगी कि सैनिक साजो-सामान के आयात पर किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहना उचित नहीं। इसके बाद भारत ने सोवियत संघ की निर्भरता से निकलने का प्रयास भी किया मगर निराशा ही हाथ लगी। न तो ब्रिटेन से ही भारत को कुछ हासिल हुआ और न ही अमेरिका की अजीबो-गरीब शर्तों को वह मंजूर कर पाया। इसके बाद भी जब 1971 में अमेरिका की शह पर उछालें मार रहे पाकिस्तान ने भारत को युद्ध की आग में झोंका तो रुस ने सारे गिले-शिकवे भुलाकर दोस्त की भूमिका को बखूबी अंजाम दिया। हां 80 का शुरुआती दौर जरूर दोनों देशों के बीच मनमुटाव वाला रहा जब अफगानिस्तान पर रूस के रुख का भारत ने समर्थन नहीं किया। मगर यह दौर भी ज्यादा लंबा नहीं चल सका। जैसे ही अमेरिका ने पाक को वित्तीय सहायता के एलान के साथ 3.2 मिलियन डॉलर के अत्याधुनिक हथियार मुहैया कराए, चिंतित भारत ने असंतुलन दूर करने के लिए सोवियत संघ के साथ 1.6 मिलियन डॉलर का रक्षा सौदा कर डाला।

ऐसा नहीं है कि महज हथियार बेचकर मुनाफा कमाने की रणनीति के तहत ही रूस ने भारत से दोस्ती निभाई। दोनों देशों में सामरिक मुद्दे जैसे परमाणु ऊर्जा और वैज्ञानिक सहयोग को लेकर भी अच्छा तालमेल रहा। अंतरिक्ष तकनीक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी दोनों देशों के सहयोगात्मक रिश्ते रहे हैं। आज भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में जिस मुकाम पर है उसमें रूस का बहुत बड़ा योगदान है। 1975 से 1979 के दौरान रूस ने अंतरिक्ष अनुसंधान में अपने को स्थापित करने में भारत की हर संभव मदद की। रूसी सहायता के बल पर ही भारत अपना पहला उपग्रह छोड़ पाया, और 1984 में पहली बार किसी हिंदुस्तानी को रूसी अंतरिक्ष यान ''सोयज'' पर सवार होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भिलाई और बोकारो इस्पात संयंत्र स्थापित करने में रूस ने ही मदद की, इसके साथ ही मथुरा तेल शोध कारखाना, हरिद्वार में प्राणदायक एंटी बायोटिक औषधि निर्माणशाला आदि की स्थापना भी रूसी तकनीक के सहयोग से संभव हो सकी। व्यापार के मामले में भी दोनों देशों के रिश्ते मंजबूत रहे सोवियत संघ के जमाने में दोनों एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते रहे। मगर जब सोवियत संघ टूटा तो व्यापार में कमी आई, क्योंकि रूबल के दाम इतने कम हो गये कि दोनों देशों के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया कि मुद्रा विनियम का तरीका क्या होगा। मगर मुश्किल का यह दौर भी ज्यादा दूर नहीं चला। दोनों देशों ने मिल बैठ कर समस्या का समाधान निकाल ही लिया। वर्तमान में भारत और रूस के बीच करीब 12000 करोड़ का व्यापार है। जिसमें भारत की हिस्सेदारी बहुत कम है। दोनों देशों के मधुर संबंधों को देखते हुए अब तक तो यही कहा जा रहा था कि अगले कुछ सालों में व्यापार बढ़कर 90,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा। मगर मौंजूदा परिवेश में ऐसा कहना जरा मुश्किल हो चला है।

भारत और रूस के रिश्ते भले ही उतार-चढ़ाव वाले रहे पर उसमें परंपरागत तौर पर गर्मजोशी हमेशा देखने को मिली मगर अब लगता है कि इस दोस्ती के स्वर्णिम युग का अंत हो चला है। भारत को लेकर रूस के रुख में बदलाव की मुख्य वंजह अमेरिका से भारत की बढ़ती नजदीकियां है। पिछले कुछ सालों में अमेरिका से आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को घनिष्ट बनाने के चक्कर में भारत रूस से दूर निकल आया है। रूस भारत की अमेरिका से बढ़ी नजदीकी, सामरिक रिश्तों में उसकी शुरुआत और उसकी प्रक्षेपास्त्र प्रणाली का विरोध करने के मुद्दे पर भारत का अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण खफा हैं। हाल में रूस और भारत ने पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट को संयुक्त रूप से विकसित करने का सौदा किया है, लेकिन इंटलेक्चुअल प्रापर्टी राइट को लेकर बात अटकी है। रूस चाहता है कि ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल संयुक्त विकास परियोजना की शर्तों पर सहमति बने, जबकि भारत को यह पच नहीं रहा है। मास्को और वाशिंगटन के बीच का मनमुटाव जगंजाहिर है। ऐसे में भारत जैसे दोस्त के अमेरिका के प्रति झुकाव पर रूस का नारांज होना जायज ही कहा जा सकता है। अब इसे महज इत्तेफाक कहें या कुछ और कि जिस अमेरिका के चलते रूस और भारत की नजदीकियां बढ़ी आज वो ही दोनों के बीच दूरिया बढ़ाने में अहम् किरदार निभा रहा है। दरअसल अमेरिका एशिया पर वर्चस्व के अपने अधूरे सपने को पूरा करने की फिराक में है और भारत का तेंजी से निखरता रूप उसे प्रभावित कर रहा है। इसीलिए ही उसने परमाणु करार के मामले में अपने पुराने वफादार पाक को दरकिनार कर भारत से हाथ मिलाया। ताकि वो चीन और रूस से मिल रही चुनौती को समाप्त कर सके। वहीं रूस भी अपने पुराने वैभव को स्थापित करने की कोशिश में है मगर अमेरिका से भारत की दोस्ती उसकी राह में रोड़ा बने हुए है। भारत भले ही बहुत तेंजी से तरक्की कर रहा हो मगर उसे रूस की जरूरत हमेशा पड़ती रहेगी। आज भी उसकी 72 प्रतिशत रक्षा जरूरतों को रूस ही पूरा कर रहा है। भारत शायद कामयाबी की दौड़ में इतिहास को भूल गया है तभी तो उसे अमेरिका का पुराना चेहरा तक याद नहीं। अमेरिका की फितरत शुरू से ही उगते सूरज को सलाम करने की रही है। अभी उसे भारत की मंजबूत अर्थव्यवस्था की चकाचौंध भले ही आकर्षित कर रही है मगर हो सकता है कि कुछ समय बाद उसे फिर से पाकिस्तान का साथ प्यारा लगने लगे। तब भारत का क्या करेगा रूस भी उस वक्त तक शायद इतनी दूर निकल चुका होगा जहां से उसका वापस लौटना मुश्किल मुमकिन न हो। तब शायद भारत को इस बात का अहसास होगा कि रूस जैसे दोस्त को खोने का मतलब क्या होता है।

 

नीरज नैयर