देश का आर्थिक विकास और लघु उद्योग

निलय श्रीवास्तव

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देश में पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या वृध्दि के साथ रोज़गार के अवसर उपलब्धा नहीं होने पर सरकार लघु उद्योगों को बढावा देकर रोज़गार को आसान बना रही है। लघु उद्यम क्षेत्र ने अच्छा कार्य निष्पादन किया है जिससे निर्यात में वृध्दि हुयी है और रोजगार के अवसर बढे हैं। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय नियमों ने देश में भारी निवेश कर रखा है जो उद्योगों की ओर विशेष धयान देने की आवश्यकता पर बल देता है। लघु उद्योग कम पूंजी में चलने वाले वह उद्योग हैं जिनमें श्रम का अधिकांश भाग लगा है और इन्होंने भारत के परम्परागत उद्योगों की श्रृंखला को भी जीवित रखा है, विशेषत: ऐसे उद्योगों को जिनमें भारत की संस्कृति रची बसी है। भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की इस नई दुनिया में जबकि विकसित देशों की अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां गरीब और विकासशील देशों में अपने झंडे गाड रही हैं तो लघु और परम्परागत उद्योग कहीं इनके द्वारा निगल न लिए जाएं इसलिए लघु उद्योगों का विशेष धयान रखना होगा।

लघु उद्योग क्षेत्र ने भारत के आर्थिक और सामाजिक ढांचे के विकास में महती भूमिका निभायी है। कुल औद्योगिक उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक का योगदान इस क्षेत्र ने किया है। कहना उपयुक्त होगा कि देश की बढती आर्थिक विकास दर में लघु उद्योगों का महत्वपूर्ण योगदान है। कुल राष्ट्रीय निर्यात में 39 प्रतिशत से अधिक भागीदारी देकर भी इस क्षेत्र ने विशेष गौरव प्राप्त किया है। केन्द्र सरकार ने लघु उद्योग क्षेत्र को बढावा देने तथा उसके प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए विशेष नीतियाँ और कार्यम बनाएं हैं। पहला, उद्योगों के विकास के लिए एस.आई.डी.ओ. में जैव प्रौद्योगिकी सेल का गठन किया गया है। दूसरा, उद्योग संगठन को परीक्षण केंद्र स्थापित करने और राज्य सरकारों और उनके स्वायत्त निकायों को गुणवत्ता चिन्हित करने वाले केंद्रों को परीक्षण सेवाओं और गुणवत्ता उन्नयन सेवाओं के लिए सहायता दी जाएगी। तीसरा,लघु उद्योग समूह विकास कार्यम को लागू करने का प्रयोजन है जिसके अंतर्गत यू.एन.आई.डी. ओ. के सहयोग से पत्थर, मशीनटूल अर्थात कुछ विशेष कलपुर्जे, हस्त औज़ार सहित 80 समूहों के विकास का काम प्रारंभ कर दिया गया है। गुणवत्ता के मानकों का विशेष स्थान रखने के लिए इन उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाता है तथा गुणवत्ता के लिए 90009001 प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है। आई.एस.ओ. 90009001 प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए खर्च की गई राशि का 75 प्रतिशत भाग सरकार द्वारा खर्च किया जाता है।

देश में कृषि के बाद लघु उद्योग क्षेत्र रोज़गार के सर्वाधिक अवसर उपलब्धा करातश् हैं। अनुमानत: लघु उद्योग क्षेत्र में एक लाख रुपए की स्थाई परिसंपत्तियों के निवेश से चार व्यक्तियों को रोज़गार मिलता है। पिछले चार वर्षों में इस क्षेत्र में रोज़गार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या इस प्रकार है वर्ष 2002-2003 में 260.21 लाख, 2003-04 में 271.41 लाख और वर्ष 2004-05 में 282.57 लाख थीं। लघु उद्योग क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित होने से वर्तमान में महिला उद्यमियों की कुल संख्या 10,63,721(10,11 प्रतिशत) है। लघु उद्योग क्षेत्र में महिला कर्मचारियों की संख्या 33,17,496 है। लघु उद्योग क्षेत्र में कुल रोज़गार में महिला कर्मचारियों का अनुपात 13.31 प्रतिशत है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और आंधा्र प्रदेश राज्यों में स्थापित लघु उद्योग इकाइयों में लगभग 57.62 प्रतिशत महिला कर्मचारी हैं। लघु उद्योग क्षेत्र से मुख्यत: खेल-कूद का सामान, सिले-सिलाए परिधान, ऊनी परिधान एवं बुने वस्त्र, प्लास्टिक के उत्पाद, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ तथा चमडे के उत्पाद निर्यात किये जाते हैं। पिछले पांच वर्षों में इस क्षेत्र द्वारा किया गया निर्यात इस प्रकार है-वर्ष 2001-2002 में 69,797 करोड़ रुपये, 2002-2003 में 71,244 करोड़ रुपये, 2003-2004 में 86,013 करोड़ रुपये, 2004-05 में 97,644 करोड़ रुपये।

वैशवीकरण की प्रक्रिया के कारण लघु उद्योगों के समक्ष चुनौतियां और अवसर दोनों ही सामने हैं। इसका मुकाबला करने के लिए सरकार, उद्यमियों एवं लघु उद्योग संगठनों को आपस में तालमेल से काम करना होगा। लघु उद्योग प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकें इसलिए लघु उद्यमों के लिए कुछ विशेष नीतियां बनायी जाना चाहिए। लघु उद्योग क्षेत्र के आधुनिकीकरण और विकास के लिए आर्थिक रूप से उपयुक्त और तकनीकी रूप से सही प्रौद्योगिकियों को विकसित किए जाने की जरूरत है। इन प्रौद्योगियों का रखरखाव सरल होना चाहिए। पिछडे क्षेत्रों में लघु उद्योग इकाइयों के लिए 50 प्रतिशत की दर से निवेश की छूट, महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तथा कमजोर वर्गों के लिए उद्यमशीलता विकास के विशेष कार्यम, अति लघु उद्योगों के लिए बनाए गए पैकेज का तत्काल क्रियान्वयन और लघु उद्योगों के विकास संबंधी प्रयासों में गैर-सरकारी संगठनों और औद्योगिक संगठनों की और बडे पैमाने पर भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही बैंकों की और अधिक शाखा खोलने की आवश्यकता है, जो विशेष रूप से लघु उद्योगों को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराएं।

निलय श्रीवास्तव