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''देश में बढता तेंजाबी बारिश का दायरा''

डॉ. सुनील शर्मा

ल और वायु जीवन के आधार हैं, जल प्रकृति से विरासत में मिला वह संसाधान है जो ब्रम्हाण्ड में सृष्टि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि एक आवश्यक घटक की भूमिका निभाता है। जल है तो जहान है इसके विपरीत जल नहीं तो कुछ भी नहीं और वायु इस जल की निर्मात्री है, वायु प्राणदायी है इसके वगैर जीवन कुछ ही मिनटों में समाप्त हो जाता है। पेड़ो और वनस्पतियों का जीवन और हरियाली इन्हीं के कारण संभव है। जल एक यौगिक है, एक अच्छा विलायक है अत: स्थान, वातावरण तथा अनेक क्रिया-प्रक्रिया में कई चीजें इसमें मिल जाती है और यह अशुद्व हो जाता है, और फिर प्रकृति के अस्तित्व के लिए हानिकारक बन जाता है। वायु गैसीय पदार्थो का आवरण है, जो पृथ्वी को चारों ओर से घेरे रहती है तथा इसमें विभिन्न गैसों का मिश्रण नियत होता है। परन्तु इसमें परिवर्तन वायु को प्रदूषित कर देता है। जल और वायु विभिन्न अपमिश्रणों के असंतुलन से अनेक पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो रही है, इनमें से एक है तेजाबी बारिश जो एक गंभीर समस्या के रूप में हमारे सामने आ रही हैं। वायु प्रदूषण के प्रभाव के फलस्वरूप वर्षा का जल अम्लीय होकर गिरने लगा है। ज्ञातव्य है कि किसी रसायन अथवा वस्तु की अम्लीयता और क्षारीयता पी.एच. पैमाने पर मापी जाती है। यह पैमाना 0 से 14 तक अंकित होता है तथा लघुगुणक पद्वति पर आधारित है एक उदासीन विलयन या घोल का पी.एच. का मान 7 होता है। अम्लीय घोल का पी.एच.मान 7 से कम तथा क्षारीय घोल 7 से अधिक होता है। अगर बारिश के जल का पी.एच.मान 7 से कम हो तो बारिश अम्ल बर्षा कहलाती है। चूंकि विभिन्न उद्योगों तथा वाहनों से निकली कार्बन डायआक्साइड, सल्फर डायआक्साइड तथा नाइट्रिक आक्साइड गैसे वायुमण्डल में जाती हैं, तो वहाँ वह जल वाष्प से मिलकर मश: कार्बोनिक अम्ल, सल्फपूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल बनाते हैं, और वर्षा के साथ ये अम्ल पृथ्वी पर आ जाते हैं। इस अम्ल वर्षा से जमीन की मिट्टी में अम्लीयता बढ जाती है और पी.एच.मान से कमी होने के कारण मिट्टी के उपजाऊपन पर इसका प्रभाव पडता है, जंगल नष्ट हो जाते हैं। इससे दूषित पानी वनस्पति तथा जीव जगत को प्रभावित करता है। बडे-बडे भवन, इमारतें, स्मारक आदि का क्षय होने लगता है। अम्लीय वर्षा का असर बहुत लम्बे क्षेत्र तक पडता है और दूसरे देश अनजाने ही किसी अन्य देश की गलतियों का खामियाजा भुगतते हैं। वर्तमान में हमारे देश में भी अम्लीय बर्षा का प्रभाव लगातार बढता जा रहा है। देश में बढते सघन औद्योगीकरण, शहरी करण और वाहनों की वेतहाशा बढती संख्या के कारण बर्षा के जल का पी.एच. लगातार घटता जा रहा है। इंडियन इन्स्ट्टीटयूट आफ मेट्रोलाजी के वैज्ञानिकों ने अपने अधययनों में पाया है कि अम्लीय वर्षा की प्रमुख कारक नाइट्रस आक्साईड गैस का उत्सर्जन पिछले दो दशकों से लगातार बढ रहा है, तथा इसके उत्सर्जन की वार्षिक वृद्वि दर 5.5 प्रतिशत है। एक और अन्य गैस कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन भी इस बीच छ: गुना तक बढ चुका है। बडे शहर, औद्योगिक केन्द्र तथा ताप विद्युत गृह इनके उत्सर्जन के प्रमुख केन्द्र बने हैं। अभी हाल ही में देश के पर्यावरण मंत्री ने राज्य सभा में बतलाया है कि पुणे और नागपुर की बारिश के जल में अम्लीयता बढी है, तथा भारतीय मौसम विभाग ने भी अपने अधययन में पाया है कि इन शहरों के बारिश के जल का पी.एच.मान 5 से कम हो गया है। इसके अलावा भारतीय मौसम विज्ञान ने इलाहाबाद, जोधापुर, कोडाईकनाल, मिनीकाय, मोहन बारी, पोर्ट ब्लेयर, श्रीनगर तथा विशाखापट्टनम में भी बारिश के पानी के विश्लेषण में पाया है कि पिछले तीन दशकों के दौरान इसके पी.एच.मान में लगातार कमी आ रही है। इसके अलावा आगरा, दिल्ली, मेरठ, कानपुर, इंदौर जैसे शहरों में भी तेजाबी वर्षा के लक्षण नजर आते रहते हैं हालांकि अब देश का बडा हिस्सा इसके दायरे में है। शायद सर्वे की कमी से हम इससे अनजान है। मथुरा में स्थित खनिज तेल रिर्फाईनरी के कारण वायुमंडल में बढती नाइट्रस ऑक्साइड के जमाव के कारण होने वाली तेजाबी बारिश की वजह से आगरा के विश्व प्रसिध्द ताजमहल को क्षय का खतरा पैदा हो गया है। दिल्ली जैसे महानगर के ऊपर इन गैसों का जमाव खतरनाक हो चला है, वहाँ बढते वाहनों ने इसे गंभीर बनाया है।

                   तेजाबी बारिश हमारे जल स्रोतों की रासायनिक संरचना बिगाड रही है। इनमें खतरनाक धात्विक तत्व शामिल हो रहे हैं। मिट्टी के पोषक तत्व खत्म हो रहें है। पेड़ सूख रहे हैं। बर्फीले क्षेत्रों में बर्फ में भी ये