बच्चे फूल नहीं होते.....
  डॉ. गीता गुप्त

नहीं, बच्चे फूल नहीं होते
   फूल स्कूल नहीं जाते
    स्कूल कत्लगाह नहीं होते...

कवि नरेश सक्सेना की ये पंक्तियाँ बच्चों के वर्तमान जीवन की विडम्बनाओं की ओर संकेत करती हैं। आज बच्चे जिन अमानुषिक यातनाओं का शिकार हो रहे हैं, उनके प्रति हिंसा, बलात्कार, प्रताड़ना की घटनाओं में जो बेतहाशा वृद्धि हो रही है-वह चिन्ताजनक है।

वस्तुत: बच्चे माता-पिता ही नहीं, राष्ट्र की भी अमूल्य निधि हैं। चाचा नेहरू को बच्चों से बहुत प्यार था। कहा जाता है कि बच्चे देश के भावी कर्णधार हैं। बड़े होकर वे देश का भविष्य संवारते हैं। अपने वृद्ध माता-पिता का सहारा बनते हैं, समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और देश की चहुँमुखी उन्नति का पथ प्रशस्त करते हैं। हम कह सकते हैं कि बच्चे आशा के दीप हैं, जो सबके दिलों में जगमगाते हैं और तमाम दुनिया को रोशन करते हैं।

चूँकि बच्चे देश का भविष्य हैं, अत: उनके सही पालन-पोषण, शिक्षा, पोषण-आहार, चिकित्सा, समुचित देखभाल एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी माता-पिता ही नहीं बल्कि समाज व देश की भी है। माँ के गर्भ में आने से लेकर किशोरावस्था तक बच्चों की सही देखभाल और सुरक्षा अत्यावश्यक है। अपना ही नहीं, गली-मुहल्ले का भी कोई बच्चा निरक्षर न रहे, बीमारी, कुपोषण व शोषण का शिकार न हो। छोटे बच्चों से कठोर श्रम न करवाया जाये, उन्हें कल-कारखानों, दुकानों व घरों में काम पर न रखा जाए। वे बुरी आदतों के शिकार न हो जाएँ। सदाचरण करें, सन्मार्ग पर चलें, झूठ, बुराई, अपराध के जगत् से दूर रहकर अपना भविष्य सँवारें-ऐसा प्रयत्न करना हम सबकार् कत्तव्य है।

बदलते समय के साथ बच्चों की जीवन-शैली बहुत बदल गयी है। उनका बचपन मानो छिन गया है। ठीक से चलना-बोलना सीख पाने के पूर्व ही उन्हें नर्सरी, किंडरगार्टन आदि भेजा जाने लगा है। प्रत्येक माता-पिता विद्यालय जाने वाले अपने बच्चे से कक्षा में सर्वोच्च अंक की आशा रखते हैं। वे बच्चों पर अपनी रुचियाँ व इच्छाएँ थोपना चाहते हैं। वह बचपन अपनी मंर्जी से नहीं जीता बल्कि अपने माता-पिता द्वारा निर्धारित नियमानुसार जीता है। विद्यालय में अपने वंजन अपने माता-पिता द्वारा निर्धारित नियमानुसार जीता है। विद्यालय में अपने वंजन से कहीं अधिक वंजन का बस्ता ढोता है। घण्टों की दूरी तय करके उस संस्था में अध्ययन करने जाता है, जहाँ की प्रतिष्ठा पालकों की दृष्टि से सर्वमान्य है। बड़ा होकर उसे वहीं कुछ बनना होता है, जो माता-पिता चाहते हैं, चाहे उसकी रुचि उनसे भिन्न क्यों न हो ? बच्चों को शीर्ष पर देखने के लिए माता-पिता हरसम्भव प्रयत्न व त्याग के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

आजकल विद्यालयों में बच्चों के प्रति अमानवीय व्यवहार के समाचार आए दिन पढ़ने-सुनने को मिलते हैं। यह दु:खद एवं चिन्तनीय है। बच्चों के साथ अप्राकृतिक दुष्कृत्य की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। घर, विद्यालय, सड़क, कोचिंग इंस्टीटयूट, गली-मुहल्ले कहीं भी बच्चे सुरक्षित नहीं है। ऐसे में उनका सही विकास कैसे सम्भव होगा ? व्यक्तित्व के समुचित विकास हेतु बच्चों का घर से बाहर निकलना अनिवार्य है, तो इस स्थिति से जुड़े तमाम पहलुओं पर नंजर रखना माता-पिता और समाज की भी जिम्मेदारी है।

मैंने अक्सर सुबह छ: बजे कड़ी ठण्ड में बच्चों को स्कूल जाते देखा है। असह्य शीत में स्कर्ट पहने ठिठुरती छात्राओं को भी देखा, जिन्हें गणवेश में आने की बन्दिश के कारण पैरों में गर्म कपड़े पहनने की अनुमति नहीं है। शरीर के भार से अधिक भारी बस्ता क्या बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है ? बच्चों के जीवन की ये छोटी-छोटी तकलींफे-जिनके दूरगामी परिणाम होते हैं, किसी आयोग द्वारा नहीं वरन् तमाम माता-पिताओं की एकजुटता और पहल से हल होनी चाहिए। उज्जवल भविष्य के नाम पर बच्चों को अमानवीय यातनाएँ सहने के लिए बाध्य क्यों किया जाना चाहिए ष्ट?

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रस्तावित बच्चों के विरुद्ध अपराध (संरक्षण) बिल 2005 को कानून मंत्रालय ने लौटाते हुए यह तंर्क दिया था कि बिल के कई प्रावधान पहले से ही भारतीय दण्ड संहिता के विविध खण्डों में हैं। ऐसे में अलग कानून विधिक संस्थाओं के कार्य को प्रभावित करेगा।

अब संशोधित कानून बच्चों को घर में माता-पिता की हिंसा से बचायेगा। घर में बच्चों से मार-पीट करने वालों के साथ-साथ उन अभिभावकों की भी खैर नहीं है, जो बच्चों के समक्ष मार-पीट या कलह करते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चा अपनी सुरक्षा के लिए न्यायालय की शरण ले सकता है। हिंसा की स्थिति में बच्चे को उसके सुपुर्द किया जा सकेगा, जिसके संरक्षण में वह स्वयं को सुरक्षित अनुभव करे। 18 वर्ष तक के लड़के-लड़कियाँ कानून के तहत संरक्षण प्राप्त कर सकेंगे। न्यायालयीन आदेश का उल्लंघन करने पर दो वर्ष की कैद हो सकेगी।

क्या कर सकेंगे बच्चें

  •  न्यायालय से अन्तरिम संरक्षण प्राप्त कर सकेंगे।

  •  परामर्श ले सकेंगे या हिंसा करने वाले को अपने पास आने से रोक सकेंगे।

  •  हिंसा करने वाले को अपने से दूर करने के लिए कह सकेंगे।

  •  बच्चा स्वयं अथवा किसी रिश्तेदार, पड़ोसी, मित्र या स्वयंसेवी संस्था की मदद से न्यायालय में गुहार     लगाकर संरक्षण प्राप्त कर सकेगा।

बच्चों के अधिकार

  •   संयुक्त राष्ट्र की महासभा सावधानीपूर्वक तैयार की गयी दस सिद्धान्तों वाली घोषणा ये पुष्टि करती है कि प्रत्येक बच्चा अधिकारी है-

  •   प्रदत्त अधिकारों के इस्तेमाल का-जाति, रंग, लिंग, धर्म और राष्ट्रीयता के भेद के बिना।

  •   स्वतन्त्रता और सम्मान के साथ विशेष संरक्षण, अवसरों और सुविधाओं में स्वस्थ और सामान्य विकास का।

  •   एक नाम और राष्ट्रीयता का।

  •   सामाजिक सुरक्षा का-जिसमें शामिल हैं-पर्याप्त पोषण, आवास, मनोरंजन और चिकित्सा-सुविधाएँ।

  •   यदि विकलांग हैं, तो विशेष उपचार और शिक्षा का।

  •   अपने पालकों से यथासम्भव प्यार, सद्भावना, लगाव और सुरक्षा के वातावरण का।

  •   नि:शुल्क शिक्षा और मनोरंजन तथा निंजी योग्यताओं के विकास के लिए समान अवसरों का।

  •   विपत्ति में त्वरित संरक्षण और राहत का।

  •   सभी तरह के तिरस्कार, शोषण व निर्दयता के विरुद्ध संरक्षण का।

  •   ज़ाति, धर्मगत किसी भी भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण और शान्ति तथा विश्व-बन्धुत्व के वातावरण में विकास के अवसर का।

  •   संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा में मौलिक अधिकारों, मानव की गरिमा और प्रतिष्ठा में विश्वास प्रकट किया गया। बच्चों के अधिकारों के इस घोषणापत्र का उद्देश्य यही था कि वह एक अच्छा बचपन गुंजारे और प्रदत्त अधिकारों का अपने और समाज के कल्याण के लिए उपयोग करें। पालकों, पुरुषों, महिलाओं, स्वैच्छिक संगठनों, स्थानीय अधिकारियों और राष्ट्रीय सरकारों से भी इस संदर्भ में अपेक्षा की गयी कि वे इन अधिकारों को मान्यता दें और इन अधिकारों की कानूनन व अन्य उपायों से रक्षा करें।

  •   यह सच है कि विकासशील देशों के अलावा अन्य देशों में भी बच्चों की एक बड़ी तादाद है जो जीवन की प्राथमिक सुविधाओं यथा-स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण से वंचित है। अधिकतर बच्चे अज्ञान और गरीबी की भयावह दुनिया में छोटा और कष्टप्रद जीवन जीते हैं। भूख, बीमारी और कुपोषण से वे अल्पायु में ही मृत्यु के लिए अभिशप्त हैं। दुनिया के कई कोनों में बच्चों के लिए कोई चिकित्सा-सुविधा नहीं है, न ही शिक्षा और मनोरंजन की सुविधाएँ हैं और न ही कोई कानूनी संरक्षण है।

  •   ज़िस शान्ति की अभिलाषा आज सारी मानवता कर रही है, वह मात्र सशस्त्र संघर्षों से मुक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक है। यह बुनियाद हो सकती है किन्तु सच्ची शान्ति का अर्थ है- जीवन को उसके तमाम वरदानों के साथ जीने के तमाम अवसर।

बाल अधिकारों की जानकारी

बाल अधिकारों का प्रचार इसलिए आवश्यक है कि जहाँ बाल-मंजदूरी समाप्त कर दी गयी है, जहाँ बच्चे असम्भावजनक दासत्व से मुक्त हैं, जहाँ बच्चों के प्रति विधि-सम्मत क्रूरता और शिशु-हत्या पूर्णत: प्रतिबन्धित है, जहाँ व्यापक चिकित्सा-सुविधाएँ सुलभ हैं, जहाँ नि:शुल्क और पर्याप्त शिक्षा की व्यवस्था है- वहाँ कई लोग इस बात से सहमत नहीं होंगे कि बाल अधिकारों को परिभाषित करने या बचाने की कोई आवश्यकता है। जबकि इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि असुविधा में जी रहे बच्चों की ओर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इन बच्चों में विशेष उल्लेखनीय समूह हैं-असमान व्यवहार की शिकार छोटी उम्र की बालिकाएँ, झुग्गियों में रहने वाले बच्चे, प्रवासी मंजदूरों के बच्चे, गलत कार्यों में लिप्त बच्चे, अनाथ, बच्चे, शरणार्थियों के बच्चे, ग्रामीण क्षेत्रों के निर्धन बच्चे, दवाओं और अपराधों के आदि बच्चे, शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित बच्चे और कुपोषण से पीड़ित बच्चों के समूह। बच्चों के शारीरिक विकास के साथ-साथ उनके बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विकास के लिए अवसर सुलभ कराना प्रत्येक राष्ट्र का दायित्व है।

भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए बने राष्ट्रीय आयोग ने अपने लक्ष्य की पूर्ति हेतु एक अभिनव योजना तैयार की। इसके अन्तर्गत अब बच्चों को उनके अधिकारों के बारे में विद्यालयों की कक्षाओं में ही बताया जाएगा। निस्सन्देह यह योजना बच्चों के लिए लाभप्रद होगी। इस योजना को 14 नवम्बर-बाल दिवस से लागू करने की कोशिश की जा रही है। वस्तुत: बच्चों का कल्याण हर जगह प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है इसलिए कि यह दुनिया की समृद्धि और शांति से जुड़ा हुआ मसला है।

आशा की जा सकती है कि बच्चों को अपने अधिकारों का ज्ञान होने पर वे एक बेहतर नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर हो सकेंगे। महिला एवं बाल विकास मन्त्रालय द्वारा बच्चों को हिंसा से बचाने के लिए उठाया गया कदम अवश्य कारगर होगा लेकिन इसके लिए समाज और देश की प्रत्येक इकाई का सहयोग अपेक्षित है।

डॉ. गीता गुप्त