तानाशाह की भूमिका में मुशर्रफ
U प्रमोद भार्गव

कल तक फौजी शासक रहे मुशर्रफ पाकिस्तान में एकाएक आपातकाल लागू करने के साथ निर्मम शासक बनाम तानाशाह की भूमिका में आ गए हैं। पाकिस्तान में यही होना तय था। क्योंकि मुशर्रफ को जो राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष के नाते सत्ता में बने रहने के अधिकार मिले थे, उन्हें वे किसी भी सूरत में हस्तांतरित नहीं करना चाहते थे। उन्होंने यह भांप लिया था कि लोकतंत्र में अधिकारों की निष्पक्ष और बेबाक फैसला देने वाली सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके पक्ष में नहीं आ रहा है। हालांकि फैसला आने में अभी पांच दिन शेष थे। लेकिन हुकूमत के हिमायती मुशर्रफ के सामने बढ़ती आतंकी हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता से निपटने के लिए इस विकल्प के अलावा कोई और चारा भी नहीं रह गया था।

पाकिस्तान की कमोवेश संपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था से खिलौने की तरह पूरे 8 साल खिलवाड़ करने वाले मुशर्रफ सुप्रीम कोर्ट को अपने हाथों का खिलौना बनाए रखने के मामले में चूक गए। उसे ध्वस्त करने के लिए आखिरकार उन्हें अस्थायी संविधान लागू कर आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी। यदि सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश मोहम्मद इफ्तिखार चौधरी भी प्रधानमंत्री शौकत अजीज की तरह उनके विश्वसनीय और निष्ठावान अनुयायी रहे होते तो मुशर्रफ को आपातकाल बनाम मॉर्शल लॉ का ऐलान नहीं करना पड़ता। आपातकाल को 24 घण्टे होने से पहले ही चौधरी को बर्खास्त कर सत्ता में न्यायिक हस्तक्षेप की संभावनाओं पर भी पूर्ण विराम लगा दिया गया है और पाकिस्तान में शासन प्रशासन की समस्त शक्तियाँ मुशर्रफ की मुट्ठी में हैं। इसके साथ ही पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली के लिए जनवरी 2008 में जो आम चुनाव प्रस्तावित हैं, वह भी टाल दिए जाएंगे।

दरअसल पिछले 8 सालों के भीतर पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में हर चाल मुशर्रफ के अनुकूल ही रही। इसे उनका कुशल अथवा कुटिल राजनीतिक नेतृत्व भी कह सकते हैं। इसके समांतर वे कूटनीति के भी इतने कामयाब चतुर सुजान निकले कि उनके सम्मोहन के भ्रमजाल की मृग-मरीचिका में अमेरिका और भारत भी चौंधियाते नजर आए। वे अपने इसी अनूठे नंजरिए के चले सर्वशक्तिमान अमेरिका का वरदहस्त भी अपने सिर पर रखे रहे और पाकिस्तान नियंत्रित कश्मीर के उग्रवादी शिविरों में जिहादियों को पनाह व शह देते हुए भारत में बारूदी गोले दागकर खून-खराबा करते रहे। यही नहीं आगरा में आक्रामक उपस्थिति दर्ज कराकर अटल बिहारी वाजपेयी के समक्ष आंखे तरेरकर मुशर्रफ लौटे। अफगानिस्तान में भी जनता को पाक से निर्यात आतंकवाद का दण्ड भोगना पड़ रहा है। बलुचिस्तान के प्रसिद्ध नेता अकबर अहमद बुग्ती का कद बढ़ाने लगा और इच्छायें परवान चढ़ने लगी तो उनका कत्ल करा, बुग्ती का वंजूद नेस्तनाबूद कर देने में भी मुशर्रफ ने वक्त जाया नहीं किया। पाकिस्तान के जिओ टी.वी. के ब्यूरो चीफ हामिद मीर का तो अब भी कहना हे कि इमरजेंसी नहीं यह वास्तव में मार्शल लॉ है, जो अमेरिका के इशारे पर लगाई गई है। मसलन अमेरिकी सरपरस्ती परवेंज मुशर्रफ को अभी भी मिल रही है। नवांज शरीफ ने भी इस कदम को इमरजेंसी और मॉर्शल लॉ की खिचड़ी ठहराया है।

इन तमाम शक्तियों और क्रियाकलापों को अपने मनमुताबिक कर लेने की कला में पारंगत मुशर्रफ सुप्रीम कोर्ट और उसके मुखिया को अपने मोहपाश में नहीं बांध पाए। यही कारण रहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट को अपनी मंशानुसार हांकने के लिए उसके प्रधान न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को पद के दुरूपयोग के आरोप में निलंबित भी करना पड़ा। अपने मनपसंद न्यायाधीश को