संस्करण: 31दिसम्बर-2007

 बढ़ती बेरोजगारी पर लगाम लगाने की चिंता

  विनय दीक्षित

भारत के आर्थिक विकास की नीतियों का बेरोजगारी उन्मूलन के लक्ष्य से कोई सरोकार नहीं है। यद्यपि पिछले एक दशक में रोजगार के क्षेत्र खुले हैं, जिनमें प्रतिवर्ष हजारों शिक्षित लोगों को लाभप्रद रोजगार अवसर प्राप्त हुए है। पिछले  कुछ वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी, प्रबंधान, जैव प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, औषधि विज्ञान के क्षेत्र में प्रतिभाशाली चंद लोगों को सवा करोड़ रुपये से डेढ़ करोड़ रुपये वार्षिक की नौकरियां भी मिली है।लेकिन रोजगार के इस चमकदार पक्ष के विपरीत यह एक अंधाकार पूर्ण सच भी हैं कि देश में बेरोजगारी की दर में साल-दर-साल तेज़ी आ रही है।

शिक्षित ही नहीं, अपितु अशिक्षित वर्ग में भी बेरोजगारी बढ़ रही हैं। भारत में कृषि क्षेत्र में अल्प शिक्षित, अशिक्षित और निरक्षरों को रोजग़ार उपलब्धा कराने की संभावना ज्यादा रहती है, लेकिन विकास की इस नई प्रक्रिया में कृषि क्षेत्र की जिस प्रकार उपेक्षा हुई है, उससे कृषि क्षेत्र में विकास दर में कमी आयी है और इसका असर रोजगार अवसरों पर भी विपरीत पड़ा है। यद्यपि सरकार ने भारत निर्माण, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और अन्य रोज़गार उपलब्धा कराने वाली अनेक योजनाएँ चलाने के बावज़ूद देश में बेरोजगारों की संख्या केवल यूपीए सरकार के कार्यकाल में 3 करोड़, 47 लाख से बढ़कर 3 करोड़ 67 लाख हो गयी है।

बेरोजगारी की रफ्तार 8.3 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। 1981 के 9 प्रतिशत के बाद 2006-07 सबसे अधिक बेरोजगारी वाला वर्ष है। योजना आयोग ने अगले पांच साल में बेरोजगारी की भीड़ थामने और 5 करोड़, 8 लाख नए रोजगार के अवसर पैदा करने का लक्ष्य रखा है। इतने रोजगार उपलब्धा कराने के बावज़ूद योजना के अंत में 2011-12 में 2 करोड़ 34 लाख बेरोजगार सड़कों पर नौकरी मांगने के लिए भटक रहे होंगे। लेकिन 2016-17 तक बेरोजगारी पर अंकुश लग पायेगा और देश में बेरोजगारी की संख्या घटकर मात्र 51 लाख रह जाएगी।

11 वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज़ में देश में बेरोजगारी की बढ़ती फौज पर गहरी चिंता व्यक्त की गयी हैं। यह समस्या जनसंख्या विस्फोट के साथ-साथ बढ़ रही है। आयोग ने 11 वीं योजना में 7 करोड़ नए रोजगार के अवसर उपलब्धा कराने का वायदा किया था, लेकिन प्रारूप में संशोधान करके इस संख्या को घटाकर 5.8 करोड़ कर दिया गया है। यदि लक्ष्य प्राप्त किया जा सका तो बेरोजगारों की रफ्तार 8.3 प्रतिशत से घटकर 4.8 प्रतिशत तक होगी। आयोग के मुताबिक देश में बेरोजगारों की संख्या 1993-94 में बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ थी। जो 1999-2000 में बढ़कर 2 करोड़, 67 लाख और 2006-07 में बढ़कर 3 करोड़, 77 लाख हो गयी।

एक नज़र बेरोजगारी बढ़ने की रफ्तार पर डाली जाए। 1993-94 में बेरोजगार 6.06 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़े। 1999-2000 में 7.3 प्रतिशत 2004-05 में 8.28 और 2006-07 में 8.36 प्रतिशत की रफ्तार से बेरोजगारों की फौज खड़ी हो रही है। ग्यारहवीं योजना के अंत में देश में दो करोड़ 34 लाख बेरोजगार होंगे तथा बेरोजगारों की रफ्तार 4.8 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ेगी। आयोग का अंदाजा है कि 2016-17 तक देश में मात्र 51 लाख बेरोजगार ही बचेंगे और बेरोजगारी की रफ्तार में घटकर 1.12 प्रतिशत रह जाएगी।

बेरोजगारी के बारे में दो तथ्य खास तौर पर उभरे है। एक बेरोजगारी गांवों में ज्यादा बढ़ी है और दूसरा खेती बाड़ी में लगे लोग बड़ी संख्या में बेरोजगार हो रहे है। कृषि श्रमिकों में 1993-94 में बेरोजगारी का प्रतिशत 9.5 था, जो 2004-05 में बढ़कर 15.3 प्रतिशत हो गया है। इसकी वज़ह कृषि उत्पाद में कमी होना हैं। गैर कृषि क्षेत्र में भी बेरोजगारी की तादाद 4.7 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रही है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के लिए आरक्षण करने के बावज़ूद बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है।

ग्यारहवीं योजना में योजना आयोग ने 5.8 करोड़ नए रोजगार उपलब्धा कराने का लक्ष्य रखा है। खास बात यह है कि आयोग ने खेती बाड़ी में काम करने वालों को हतोत्साहित करने की योजना बनायी है। आयोग का आकलन है कि 2007-2012 तक खेती मज़दूरों की ज़रूरत शून्य हो जाएगी और 2016-17 तक 40 लाख मज़दूरों को दूसरे में काम पर लगाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने स्वयं एनडीसी की बैठक में इस बात की घोषणा की कि खेती पर निर्भरता को कम करे और औद्योगीकरण को बढ़ावा दें। 11 वीं योजना में खनन, बिजली-पानी, निर्माण, उत्पादन, व्यापार, होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन, भंडारण, वित्त, रीयल स्टेट तथा अन्य सेवाओं में 5.8 करोड़ और 2017 तक 12 करोड़ अतिरिक्त रोजगार के अवसर उपलब्धा कराये जाएंगे।

विनय दीक्षित