संस्करण: 31दिसम्बर-2007

  स्त्री : दोयम दर्जा कब तक

   डॉ. गीता गुप्त

 आजकल स्त्रियों की स्वतन्त्रता, समानता और अधिकारों की चर्चा सुर्ख़ियों में है। निस्सन्देह पूर्वापेक्षा स्त्रियों में एक जागरूकता दृष्टिगत हो रही है। वे खुलकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सामने आयी हैं। समाज में एक क्रान्ति सी दिखाई दे रही है।

यह सर्वविदित है कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्त्री ने अपनी योग्यता सिध्द कर दी है और इसे पुरुष से कम नहीं ऑंका जा सकता। परन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्त्री परिवार की धुरी है और आज सामाजिक परिदृश्य बदल चुका है, तदनुरूप स्त्री की भूमिका भी बदल गयी है।

स्त्री के सन्दर्भ में सदियों से चली आ रही रूढ़ियाँ, परम्पराएँ आज उपयुक्त प्रतीत नहीं होतीं इसलिए उदारतापूर्वक इनमें परिवर्तन को स्वीकारना चाहिए और परिवार तथा समाज में इसे सहज स्वाभाविक रूप में लिया जाना चाहिए। वर्तमान में परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए नारी का आगे आना अनिवार्य है और विभिन्न क्षेत्रों में उसके द्वारा महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों का निर्वहन भी महती आवश्यकता है।

अब वह युग नहीं रहा, जब घर का मुखिया अकेले कमाता था और पूरा परिवार सुखपूर्वक रहता था। प्रतिस्पध्र्दा और महँगाई के मौजूदा दौर में प्रत्येक व्यक्ति अनेक स्तरों पर जूझ रहा है। घर के आर्थिक ढाँचे की मज़बूती के लिए स्त्री आगे आयी है और खेतों ही नहीं कल-कारखानों और विभिन्न संस्थानों में कार्य कर रही हैं। आज यह सभी स्वीकारते हैं कि शारीरिक संरचना की बात छोड़ दें तो स्त्री-पुरुष में कोई अन्तर नहीं है। वह प्रत्येक कार्य, जिसे पुरुष कर सकता है-स्त्री भी करने में सक्षम है और वह पुरुष से अधिक क्रियाशील है।

स्त्री का विवाह होता है, वह अन्जान परिवेश में अन्जान लोगों के बीच जाकर सामंजस्य स्थापित करती है, ज़िम्मेदारियाँ निभाती है और एक नया जीवन आरम्भ  करके आख़री साँस तक जूझती रहती है। कभी वह सफल रहती है, कभी असफल। पुरुष भी विवाह करके घर बसाता है, लेकिन उसके हिस्से में विवाह के बाद वे जटिलताएँ नहीं आती, जिनसे अकेली स्त्री रू-ब-रू होती है। वह तो  जन्म के बाद से ही भली प्रकार संरक्षण पाता है और विवाह की दहलीज़ पर पहुँचते ही पत्नी नामक प्राणी उसे जीवन भर सेवा के लिए उपलब्धा हो जाती है। जबकि स्त्री पैदा होने के बाद से ही उपेक्षा, भेदभाव और असुरक्षा की पीड़ा भोगती है। बाल्य-काल बीतते ही उस पर ज़िम्मेदारियाँ लाद दी जाती है। विवाह के पूर्व माता-पिता के घर की ज़िम्मेदारी और बाद में पति के घर की ज़िम्मेदारी का अलिखित संविधाान उसके लिए निर्मित है।

माता-पिता के घर अविवाहित युवतियों को तरह-तरह की नसीहतें मिलती हैं जैसे-धारे हँसों, धीरे बोलो, भविष्य में तुम्हें पराये घर जाना है। धीरे-धीरे खाओ, ढंग से चलो, घर के काम सीखो, नाक कटवाओगी क्या हमारी, ससुराल में ? लड़कों से नहीं कहा जाता कि-गला फाड़कर नहीं, ज़रा धीरे बोलो, धीरे हँसों, ढंग से चलो, तहज़ीब से रहो, विनम्र, सहिष्णु और ज़िम्मेदार बनो। दोनों के पालन-पोषण में यह भेद-भाव ही उनके व्यक्तित्व में मित्रता पैदा कर देता है। स्त्री स्वभाव से उदार, सहनशील और ज़िम्मेदार बन जाती है और पुरुष निरंकुश, अनुदार और ज्यादातर गैरजिम्मेदार। इसलिए लड़की और लड़के के पालन-पोषण में समानता का व्यवहार अनिवार्य है।

जीवनरूपी रथ के दो पहिये हैं स्त्री-पुरुष। दोनों पहियों का मज़बूत होना ज़रूरी है। भेदभावपूर्ण तथा असमान व्यवहार से यह सम्भव नहीं है। जन्म से ही लड़की और लड़के के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। जैसे लड़कों के जन्म पर खुशियाँ मनायी जाती हैं, उनके उज्ज्वल भविष्य के सुखद स्वप्न संजोये जाते हैं, उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ सुलभ करायी जाती हैं- ठीक वैसे ही लड़कियों के साथ होना चाहिए। तब एक में विशिष्टता और दूसरे में हीनता का भाव नहीं पनपेगा और दोनों अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास कर राष्ट्र की उन्नति में सहायक होंगे।

लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी भी आज सर्वाधिाक स्त्रियों पर है। क्योंकि वे जन्मदात्री हैं, एक माँ के रूप में वे ईमानदारीपूर्वक सन्तान के प्रति अपनेर् कत्तव्य निभायें और कन्याओं की उन्नति का पथ प्रशस्त करें। एक सास अपनी बहू के साथ उदार दृष्टिकोण रखकर उसके प्रति सकारात्मक और सहयोगात्मक रवैया अपनाए। पुरुषों का सहयोग तो पिता और पति के रूप में अपेक्षित है। वे मार्ग में बाधाक न बनें बल्कि सही मायनों में स्त्री के सहचर सिध्द हों तो इस दिशा में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं रहेगी।

आज हमारे देश की जनसंख्या अरबों में है, इसे नियंत्रित करना परिवार, समाज और राष्ट्र की खुशहाली के लिए अनिवार्य है। लड़का हो या लड़की-सिर्फ़ एक या दो बच्चों के बाद सहर्ष परिवार-नियंत्रण को अपनाया जाना नितान्त आवश्यक है तभी समस्त आकांक्षाओं की पूर्ति और देश की उन्नति सम्भव है। आज पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की घटती संख्या चिन्ताजनक है।

स्त्री का शोषण, हिंसा, अनाचार और अत्याचार के मामले बढ़ रहे हैं।इसके मूल में एक कारण पुरुषों में संस्कारहीनता भी है, इस दिशा में धयान देने की आवश्यकता है। आज स्त्रियों के समान पुरुषों में भी सुन्दर दिखने, सजने-संवरने, आकर्षक लगने की भावना पैदा हो रही है जिसका प्रमाण पुरुषों के ब्यूटी पार्लर हैं। यह अच्छी बात है। थोड़ा-सा धयान उनके संस्कारशील होने पर दे दिया जाए, तो यह सोने में सुहागा होगा। जिस तरह बचपन से ही लड़कियों को अनेक गुणों में दक्ष बनाया जाता है, वे डॉक्टर, इंजीनियर, उच्चाधिकारी होते हुए भी अन्य कई कलाओं में निपुण और व्यवहारकुशल होती हैं, ठीक वैसा ही लड़कों के लिए भी होना ज़रूरी  समझा जाना चाहिए। आज शिक्षित, कामकाज़ी माताएँ- जिन्होंने अपने जीवन में विसंगतियाँ झेली है, उनकी इस दिशा में सजगता-सक्रियता अनिवार्य है। कुछ परिवर्तन भी दिखाई दे रहा है पर वह अपर्याप्त और दिशाहीन है।

स्वतन्त्रता-समानता के नाम पर स्त्री जिस स्वच्छन्दता की राह पर चल पड़ी है, वह लज्जास्पद है। स्त्री का बाज़ारवादी दृष्टिकोण समाज के लिए ही नहीं, उसके स्वयं के लिए भी घातक सिध्द होगा। आज परिवार टूट रहे हैं, स्त्रीत्व का -हास हो रहा है, यह चिन्ताजनक है। स्त्री को स्वतन्त्रता के मायने समझने होंगे। पुरुष के समकक्ष और हमक़दम होने का अर्थ उसके जैसी ही वेशभूषा अपना लेना और पुरुषोचित आचरण करना नहीं हैं।

उपभोक्तावादी संस्कृति और मीडिया ने स्त्री को वस्तु बना दिया है। स्त्री स्वयं भी इसके लिए ज़िम्मेदार है। वह भी अपने को देह मात्र समझ रही है और बाज़ार में प्रदर्शन की होड़ में है। आज के नब्बे फीसदी विज्ञापन स्त्री की देह के हैं। देह-प्रदर्शन कर अपार धान-सम्पन्न सिने तारिकाएँ भी जाने कितना धान कमाना चाहती हैं और क्यों ? अर्ध्दनग्न होकर नाचने या देह-प्रदर्शन कर धान कमाने पर उनकी आत्मा नहीं कचोटती और कला के नाम पर सबके सामने अपनी देह परोसकर वे समाज में अनेक विकृतियों को जन्म दे रही हैं।

स्त्री के प्रति हिंसा, छेड़छाड़, बलात्कार और असामाजिक दुर्घटनाओं की जो बाढ़ आयी है उसके लिए मीडिया और स्त्री की प्रदर्शनप्रियता व अनुकरणशील प्रवृत्ति भी दोषी हैं। प्रगतिशीलता के नाम पर फूहड़पन और उच्छृंखलता को अपनाना अनुचित है। बेहतर होगा यदि स्त्री देह-विज्ञान से परे मन, बुध्दि और विवेक के विस्तार पर धयान देकर शील सम्पन्न मर्यादित सौन्दर्य के साथ उपलब्धियों के शिखर पर पहुँचने की चेष्टा करे। आर्थिक स्वावलम्बन स्त्री के लिए आवश्यक है किन्तु इसके लिए ग़लत माधयम अपनाया जाना अवांछनीय है।

नारी के जीवन की दिशा अभी तक सुनिश्चित नहीं है, इसके लिए कोई निधर्रित पैमाना नहीं है। शिक्षित, सुसंस्कृत परिवारों में इस ओर धयान दिया जा रहा है परन्तु सामान्यतया अभी तक मधयमवर्गीय परिवारों में इस ओर पर्याप्त जागरूकता का अभाव है और निम्न वर्ग अपनी ही समस्याओं की गिरफ्त में है। स्त्री चाहे किसी भी वर्ग की हो, उसे संगठित होकर अपनी स्थिति पर विचार करना चाहिए। महिला आयोग या कोई संगठन उनकी दशा नहीं सुधार सकता। इसके लिए उन्हें स्वयं कटिबध्द होना होगा, अपनी प्राथमिकताएँ तय करनी होंगी और तदनुसार क़दम बढ़ाना होगा। कोई मसीहा उनके कल्याण के लिए नहीं आएगा, उन्हें अपना मसीहा खुद बनना होगा।

डॉ. गीता गुप्त