संस्करण: 31दिसम्बर-2007

'गर्दिश में गंगा'

   विन्ध्यमणि

भारतीय जनमानस में अथक आस्था के रूप में पूजित 'गंगा' असामान्य दिख रही है। गंगा का पानी कम हो गया है जो बचा खुचा पानी है भी वह अशुध्द है। विगत कई वर्षों से खासकर उत्तर प्रदेश में माघ मेले की शुरूआत पर पानी की अनुपलब्धाता और गन्दगी की व्यापक स्तर पर शिकायत ज़ाहिर करती है कि अब हम गंगा को बस अपना पाप धुलवाने के लिए याद करते हैं प्रयोग करते हैं। कश्मीर से पोर्ट ब्लेयर तक देश की अनादि आस्था की स्रोत गंगा नदी में पानी का अभाव है और निचले स्तर से हो रहे परिवर्तन के कारण गंगा का दायरा सिकुड़ रहा है। इलाहाबाद में इसके कारण 'संगम' पूरब दिशा की ओर खिसकता जा रहा है। गटर और सीवर के प्रदूषित जल के साथ गंगा में खुल रहे नालों पर यदि प्रतिबन्धा नहीं लगाया गया तो पर्यावरणविदों का मानना है कि अगले बीस सालों में 'गंगा' बरसाती नदी होकर रह जायेगी।

संगम पर डेढ़ महीने तक माघ मेला चलता है, जिसमें कई मुख्य स्नान पर्व पड़ते हैं। साधु, सन्यासी, गृहस्थ यहाँ स्नान और कल्पवास करते हैं।मुख्य कार्य स्नान ही होता है, लेकिन पिछले कई वर्षों से धीरे-धीरे पानी का कम होना चिन्ता का विषय है। वही गंगा जो असाढ़ के महीने उफनायी रहती है, खतरे के निशान तक पहुँच जाती है, आज पानी की कमी के कारण रेतीली चमक भर रह गयी है। ऑंकड़ों के अनुसार पिछले छ: वर्षों में गंगा का स्तर डेढ़ मीटर घटा है। नवम्बर 2000 में स्तर 77.72 मी. था यह स्तर 2006 में घटकर 76 मी. रह गया। इस वर्ष नवम्बर महीने में ही जल स्तर डेढ़ मीटर घट चुका है। यद्यपि गंगा को बचाने और उसके अस्तित्व को साफ सुथरा रखने के लिए 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत काफी समय से काम हो रहा है तथापि ये सब योजनाएँ कागज़ी, अखबारी सूचनाओं और ऑंकड़ों की बाज़ीगरी तक सीमित है। वस्तुस्थिति इतनी भयावह है कि पर्यावरण संस्था 'ग्रीनपीस' ने विश्व की दस महत्व पूर्ण नदियों के समाप्त होने की बात कही है उनमें से एक 'गंगा' भी है सरकार तो खैर अपने मन्त्रिमण्डल, विपक्षियों पर दबाव बनाये रखने और जनाधार बढ़ाने की चिन्ता से मुक्त होकर काम करे तो इस तरह की स्थिति को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों फटकार लगायी और गंगा की सफाई, सुरक्षा के लिए स्पष्टीकरण मांगा है। गंगा जिन मार्गों से होकर जाती है, उसके तट पर बसे हुए औद्योगिक जनपद इसको प्रदूषित करने में सबसे आगे हैं। इसमें कानपुर सबसे ऊपर है। फिलहाल न्यायालय की सख्ती के कारण कानपुर के 32 टेनरियों को सील कर दिया गया है और कानपुर से इलाहाबाद के बीच 59 नालों को बन्द करने का आदेश दिया गया है। स्नानार्थियों को होने वाली परेशानी से निपटने के लिए 'नरौरा' से तीन सौ क्यूसेक पानी, साथ ही टिहरी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट से एक हजार क्यूसेक पानी छोड़कर तात्कालिक समस्या को साल्व करने का प्रयास किया जा रहा है, किन्तु यह स्थायी हल नहीं है। राज्य सरकार गंगा की गिरती गरिमा, दशा पर गम्भीर नहीं है। अगर सचेत होती फिर न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता ही क्यों पड़ती ?

प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये गंगा की सफाई,सुरक्षा के लिए खर्च किये जा रहे हैं फिर भी 'गंगा' की स्थिति जस की तस है। अब वो समय आ गया है कि हम सब मिलकर गंगा के अस्तित्व के लिए जागरूक होकर औरों को इसके लिए जागरूक करें। मूल मुद्दा का है। गंगा का पानी पेयजल का बहुत बड़ा आधार रहा है। पेय जल की किल्लत बढ़ रही है यह संकट कमोवेश हर जगह लगभग एक जैसा है। गंगा में पानी की कमी और प्रदूषण बढ़ रहे पर्यावरण असन्तुलन के कारण मानवजनित प्रकृति से की गयी छेड़छाड़ दुव्यवहार हमारे सामने प्रतिक्रिया के रूप में आ रही हैं तो कहीं अतिवृष्टि के कारण फसले बरबाद हो रही हैं और कहीं तो पानी रिहायशी इलाकों में घुसकर सबकी जान लेने पर तुला है। पर्यावरण की सुरक्षा हर हाल में करनी होगी। भू वैज्ञानिक और पर्यावरणविद प्रो.एस.एस. ओझा मानते हैं कि ''देश का पठार पश्चिम दिशा में उठ रहा है और पूरब की ओर झूक रहा है। इसका असर गंगा पर भी पड़ रहा है। पानी की कमी ने गंगा को सिमट जाने को मज़बूर कर दिया है और इसी के कारण संगम की दूरी बढ़ती जा रही है।'' पठार का उठना गंगा को प्रभावित करता है और यह स्थिति नवीन जीवन शैली, औद्योगीकरण, नगरीकरण्, ग्रीन हाउस गैसों का बहुतायत उत्सर्जन से बनी है इसके जिम्मेदार हम सब हैं। गंगा को गर्दिश में ले जाने वाले और भी कारक हैं। गंगोत्री हिम शिखर को गंगा का उद्गम स्थल माना जाता है। यह शिखर लगातार पिघलने के कारण् गंगा के पानी पर प्रभाव छोड़ रहा है। हिमालय के शिखर ग्लेशियर पर किये गये तमाम शोधा बताते हैं कि ये ग्लेशियर ही गंगा की वास्तविक ऊर्जा है। हाल ही में किये गये तमाम रिसर्च रिपोर्टों में हिमालय के अनेक ग्लेशियरों के पिघलने की बात की गयी है। हिमालय की मिट्टी रेत में परिवर्तित हो रही है इसी के साथ भविष्य पर रेत पड़ती जा रही है। नदियों का पानी तो कम हो ही रहा है और खाद्यान्न के उत्पादन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कार्बन डाई ऑक्साईड क्लोरो क्लोरो कार्बन के साथ अन्य तमाम ग्रीन हाउस गैसों के दबाव से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। संकट का जो स्वरूप अभी गंगा में कम पानी के रूप में दिख रहा है वही सुनामी जैसी आपदा को आमंत्रण दे रहा हैं। भोजन पानी का संकट, शरणार्थियों का आवागमन तो बना ही रहेगा साथ ही करोड़ों लोग लू, बाढ़, सुखाड़ और तूफान की आकस्मिक चोट से इस दुनिया को छोड़ जायेंगे। वस्तुत: हम सब ने मिलकर प्रकृति का संरक्षण नहीं किया तो आने वाला समय गंगा को मिटा देगा और हम सबसे पूरी तरह अपना हिसाब चुकता करेगा।

विन्ध्यमणि