संस्करण: 31दिसम्बर-2007

तीसरे मोर्चे का सच
  कृष्ण गोपाल सिन्हा

1991 में केन्द्र में सत्ता में आई काँग्रेस सरकार के अलावा 1989 से जो भी सरकार बनी वह मोर्चे या गठबंधन की ही सरकार रही हैं। दरअसल किसी एक दल या चुनाव से पूर्व के गठबंधान के बहुमत में न आ पाने की दशा में कुछ दलों के नेता आपस में मिलजुलकर बहुमत जुटाने का उपक्रम करते हैं। कभी कार्यक्रमों के आधार पर तो कभी बिना किसी कार्यक्रमों पर अमल करने की घोषणा के भी एक बड़ी पार्टी कुछ दलों का सहयोग लेकर गठबंधन प्रस्तुत करती है। इस प्रकार के गठबंधन सत्ता के पक्ष और विपक्ष में बनाये जाते हैं। ऐसे दो गठबंधन के अलावा पक्ष और विपक्ष से बाहर रहने वाले दल मिलकर एक नया मोर्चा बना लेते हैं जिसे आमतौर पर तीसरे मोर्चे का नाम दे दिया जाता हैं। वस्तुत: यह भी एक तीसरा गठबंधन ही होता है परन्तु पक्ष और विपक्ष से अलग अपना एक अस्तित्व बनाने और दिखाने के उद्देश्य से ऐसे मोर्चो का मंतव्य और गंतव्य सत्ता का विकल्प न बन पाने की स्थिति में भी सत्ता के लिए संघर्ष करना और सरकार पर दबाव बनाना होता है साथ ही मुख्य विपक्षी गठबंधन के प्रति भी इनका तेवर विरोधा और संघर्ष का ही होता है।

सरकार बना पाने वाली अल्पमंत संयुक्त मोर्चे या राष्ट्रीय मोर्चे से अलग परिस्थितियों में 2007 के मधय में संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन के रूप में तीसरे मोर्चे का गठन उत्तर प्रदेश सत्ता परिवर्तन के बाद और राष्ट्रपति चुनाव की पृष्ठभूमि में किया गया। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भी समाजवादी पार्टी से अलग हुए राज बब्बर और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक मोर्चा बनाने की पहल की थी, जो समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया मुलायम सिंह यादव के विकल्प के रूप में अपने को प्रस्तुत कर रहा था। उत्तर प्रदेश में पार्टी की पराजय और सत्ता से बाहर होने पर पहले से ही काँग्रेस के विरोधा को और तेज़ करने तथा केन्द्र सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी करने के लिए पार्टी के मुखिया ने राष्ट्रपति चुनाव के अवसर पर एक मोर्चे का गठन आन्र प्रदेश, तमिलनाडु और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ मिलकर किया। इसमें असम गण परिषद और नेशनल कांफ्रेन्स भी शामिल हुई और अन्य क्षेत्रीय दलों को मिलाकर तीसरे मोर्चा राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए और एनडीए के प्रत्याशियों के विरोधा में मैदान में उतरा। राष्ट्रपति चुनाव में तीसरे मोर्चे की राजनीति वामपंथी दलों को साथ लेकर यूपीए और यूपीए के प्रत्याशी के लिए मुसीबते पैदा करने की थी। तीसरे मोर्चे ने पहले यूपीए और एनडीए से समान दूरी रखने का एलान किया और बाद में ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी पेश करके राजग और यूपीए को घेरने की कोशिश की। अन्तत: तीसरे मोर्चे ने राष्ट्रपति चुनाव से अपने को अलग रखने का निर्णय लिया पर मोर्चा इस चुनाव के साथ एकजुट नहीं रह सकी और जयललिता तथा ओम प्रकाश चौटाला तीसरे मोर्चे के निर्णय का पालन अपनी पार्टी से नहीं करा पाये। मोर्चा कुछ पाने से पहले ही खोने की हालत में आता दिखाई दिया।

राष्ट्रपति चुनाव के लिए परिदृश्य स्पष्ट होते हुए भी उपराष्ट्रपति के चुनाव में सबसे पहले तीसरे मोर्चे ने अपना प्रत्याशी घोषित किया परन्तु लोक सभा और राज्य सभा में यूपीए, एनडीए और यूएनपीए की स्थिति को देखते हुए यूपीए प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित थी। वामदलों ने पहले की तरह उपराष्ट्रपति चुनाव में भी यूपीए का साथ दिया। संख्या बल के आधार पर यूपीए प्रत्याशी को अधिक मत मिले, जबकि राजग और तीसरे मोच्रे के प्रत्याशियों को अपनी कुल संख्या से क्रमश: 17 और 6 मत कम मिले। स्पष्ट है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में तीसरे मोर्चे को अपना प्रत्याशी खड़ा करके अपनी राजनैतिक हैसियत और उपस्थिति दर्ज कराने का एक अवसर मिला और 2009 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए एक राजनैतिक धारातल उपलब्धा हुआ।

राजनैतिक संयोग या दुर्योग से अपने राजनैतिक एजेण्डे को बढ़ाने का एक और अवसर तीसरे मोर्चे को परमाणु करार पर हो रहे तकरार से भी मिला। एक बार फिर सरकार का विरोधा करने का तेवर तेज़ तो हुआ पर इस विरोधा में एनडीए के साथ खड़ा होना तीसरे मोर्चे को कतई गवारा नहीं लगा। परमाणु करार को लेकर वामपंथी दलों के रवैये और तेवर से तीसरे मोर्चे को कुछ राहत और हौसला अगर मिला हो तो इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। दरअसल एनडीए की तरह तीसरा मोर्चा भी यह आस लगाये बैठा रहा है कि सत्ताधाारी यूपीए गठबंधान से वामपंथी मोर्चा अपना समर्थन वापिस ले और चुनाव के हालात पैदा हों। करार को लेकर एनडीए और वाम मोर्चे के विरोधा के जो भी राजनैतिक कारण हों, तीसरे मोर्चे द्वारा करार के विरोधा में आवाज उठाने के पीछे यूपीए सरकार को सत्ता से बाहर होते देखना कहा जा सकता है।

आईए अब यूएनपीए के वर्तमान स्वरूप पर चर्चा करें। केन्द्र सरकार पर दबाव बनाने और लोकसभा चुनाव 2009 से पहले करवाने के लिए आशान्वित और क्रियाशील क्षेत्रीय दलों के आकाओं (जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू, मुलायम सिंह यादव और ओम प्रकाश चौटाला (सभी पूर्व मुख्यमंत्री) की उम्मीद इस बात पर टिकी है कि लोकसभा चुनावों में उनके दलों की स्थिति पहले के मुकाबले बेहतर हो और उसी के बूते राज्य में खोयी हुई धारातल को फिर से प्राप्त करने की सम्भावना जुड़ी हुई है।

राष्ट्रपति चुनाव और उपराष्ट्रपति चुनाव के अनुभवों से गुजरे तीसरे मोर्चे के एकजुटता को लेकर कोई संदेह करने का आधार तो नहीं है पर इस बात की गारण्टी भी नहीं दी जा सकती कि लोकसभा के चुनावों के बाद इनमें से किसी की या सभी की स्थिति बेहतर होगी ही। थोड़ी देर के लिए स्थिति के बेहतर होने की सम्भावना को मानकर भी इस बात का कोई पुख्ता आधाार तो नहीं दिखाई देता कि अपनी-अपनी संख्या और राजनैतिक हितों के मद्देनज़र तीसरे मोर्चे की पार्टी या पार्टियां बहुमत या सरकार बनाने वाली पार्टियों से तालमेल करने को लालायित नहीं।

तीसरे मोर्चे में शामिल दलों के बारे में यह याद रखना होगा कि समाजवादी पार्टी के अलावा इसके अन्य घटक दलों और उसके सुप्रीमों ने पहले भी दूसरे गठबंधानों के साथ अपने को जोड़ा था। तेलगू देशम पार्टी 2005 में और इण्डियन नेशनल लोक दल 2004 के चुनाव से पहले यूएनडीए से अलग हुई। अन्नाद्रमुक चुनाव में 1999 में काँग्रेस के साथ तथा 2004 में एनडीए के साथ पराजय के बाद एनडीए से अलग हो गई।

लोकसभा में तीसरे मोर्चे की वर्तमान स्थिति को देखे तो तेलगू देशम के 4, अन्ना द्रमुक के 2, नेशनल कांफ्रेंस के 2, समाजवादी पार्टी के 38 सदस्य हैं। इण्डियन नेशनल लोक दल का लोकसभा में प्रतिनिधित्व शून्य है। इस मोर्चे की वर्तमान स्थिति और संख्या बल तथा आगामी लोकसभा चुनाव में इसकी स्थिति में विशेष सुधार या परिवर्तन की संभावना के मद्देनज़र केन्द्र में उसे सत्ता के विकल्प के रूप में देखना सहज नहीं लगता। जहाँ तक अपने-अपने राज्यों में इन केन्द्रीय दलों की स्थिति बेहतर होने की बात है तो इन्हें इसके लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा, क्योंकि यह सभी पार्टियां इस समय सत्ता से बाहर हैं।

यूएनपीए के सच को समझने के लिए यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि इसमें शामिल सभी दल राज्य स्तर की पार्टियां हैं। सत्ता के प्रति विरोधा और विपक्ष के प्रति दुराग्रह की राजनीति करते हुए अपनी सुविधा और राज्य के हितों के लिए कभी भी और किसी भी गठबंधान से जुड़ने और फिर परिस्थिति बदलने पर उनसे नाता तोड़ने में इन्हें किसी तरह का गुरेज़ नहीं हो सकता।

परमाणु करार को लेकर हो रहे तकरार के थमने या निपटने के साथ ही लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधान और तालमेल की बिसात बिछने लगेगी। दरअसल आगामी लोकसभा के चुनाव के लिए दस्तक उत्तर प्रदेश विधाान सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ही देने शुरू हो गये थे परन्तु पहले राष्ट्रपति चुनाव फिर उपराष्ट्रपति चुनाव और अब परमाणु करार पर विवाद के चलते चुनाव की आहट कभी तेज़ तो कभी धमी होती रही है। महंगाई के बढ़ने के होहल्ले के बीच आर्थिक मोर्चे पर सरकार की कामयाबी से भी विपक्ष की ही तरह तीसरा मोर्चा भी थोड़ा सहमा हुआ है। चुनाव के लिए मुद्दे की तलाश में सभी पार्टियां हरकत में आती लगने लगी हैं। ऐसी स्थिति में कोई दमदार मुद्दा तीसरे मोर्चे के हाथ में आता नहीं दिखाई देता। अपने-अपने राज्यों में तीसरे मोर्चे के दलों को पहले मुख्य विरोधाी सत्ताधाारी पार्टियों से मोर्चा लेना होगा। कांग्रेस का यदि कर्नाटक में डीएमके से कोई चुनावी तालमेल या सीटों का बंटवारा होता है तो अन्नाद्रमुक के लिए यह परेशानी का सबब होगा और वह सिमटने के लिए मज़बूर होगी। आंधा्र प्रदेश में कांग्रेस और तेलगू देसम के बीच सीधाा मुकाबला होगा तथा उत्तर प्रदेश में बसपा की ओर से सपा के लिए बड़ी चुनौती होगी तथा राज्य में तीसरी बड़ी पार्टी भाजपा और कांग्रेस के बीच भी मुकाबला कही सपा से तो कहीं बसपा से होने की दशा में सपा की स्थिति बेहतर होने की सम्भावना कम है। तीसरे मोर्चे का ताना-बाना और भविष्य इन्हीं तीन दलों (तेलगू देसम, अन्नाद्रमुक और समाजवादी पार्टी) पर टिका लगता है। यह कितनी देर और कब तक टिका रह पायेगा, कहना कठिन है।

आपात स्थिति और आनन-फानन में क्षेत्रीय हितों के परिप्रेक्ष्य में सीमित संभावनाओं की दृष्टि से जुटने वाले दलों का मोर्चा कितना स्थायी और कारगर होगा, अतीत के प्रयोगों और अनुभवों के आधार पर यह कहना व्यावहारिकता और वास्तविकता से परे ही लगता है।

हाल ही में जयललिता द्वारा तीसरे मोर्चे के नेता के बयानों से अपने को अलग बताये जाने से मोर्चे के अस्तित्व को एक बार फिर झटका लगा है। पुराने अनुभवों के आधार पर अन्नाद्रमुक एनडीए और यूपीए के साथ चुनाव के मौके पर नाता तोड़ने और जोड़ने की बात करने लगी है। यह लगभग तय लगने लगा है कि तेलगू देशम पार्टी तथा समाजवादी पार्टी को ही तीसरे मोर्चे के कमजोर होने या टूटने से सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है तथा भविष्य को लेकर बनायी गई रणनीति कारगर होने से पहले ही विफल हो सकती है। आनन-फानन में विरोधा की राजनीति के चलते बनाये गये मोर्चो का सम्भवत: यही हश्र होता है यह विश्वास एक बार फिर मज़बूत होने लगा है।

कृष्ण गोपाल सिन्हा