संस्करण: 31दिसम्बर-2007

''भंवरजाल के बीच जनस्वास्थ्य समस्याएँ''

   डॉ. सुनील शर्मा

कमीशन ऑफ मैक्रो इकानॉमिक्स ऐण्ड हेल्थ की वर्ष 2001 की रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य पर निवेश में 500 फीसदी का मुनाफा है। विश्व बैंक द्वारा आंकलित आंकड़े इस कमीशन का रिपोर्ट पर सत्यता की मुहर लगाते हैं, इस संदर्भ में कुछ अधययनकर्ताओं ने इंडोनेशिया के रबर के पेड़ों से रस निकालने वालों को आयरन की अतिरिक्त खुराक देने के प्रयोग का अधययन किया। यह अधययन था कि आयरन की गोली लीजिए और समय पर खुराक लेकर इनाम पाइए। डॉलर के हिसाब में यह वृध्दि प्रति वर्ष 132 डॉलर की थी, जबकि खुराक की लागत प्रति मज़दूर प्रतिवर्ष सिर्फ़ आधार डालर थी। सही समय पर सही खुराक लेने के इनाम 11 डॉलर को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो स्पष्ट है कि यह प्रयास स्वास्थ्य सुधारने के साथ-साथ कमाई के मामले में भी लाभकर रहा। कुछ ऐसा ही हिसाब केन्या में स्कूली बच्चों के पेंट में कीड़े मारने की दवा वितरण में सामने आया है। इस अधययन में यह बात स्पष्ट हुई है कि कीड़े मारने की दवा मामूली से आधार डॉलर खर्च की तुलना में बच्चे को लगभग प्रति वर्ष 30 डॉलर का फायदा होगा। स्पष्ट है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर निवेश के शारीरिक फायदों के साथ-साथ आर्थिक फायदे भी हैं। हमारे देश में भी गरीब मज़दूर शुध्द पानी के अभाव में बीमार होने की बजाए महंगा बोतलबंद पानी खरीद कर पीते देखे जा सकते हैं, ताकि बीमार होने से बचे तथा उनकी मज़दूरी में होने वाली हानि का मौका न आ पाए ये अविश्वसनीय सी बात है पर सच है क्योंकि आजादी के 60 वर्षों बाद जनस्वास्थ्य को सबसे बड़ा खतरा दूषित पेयजल से ही है जिसे की पूर्ति अब तक लोककल्याणकारी सरकारें नहीं कर पाई हैं। और शुध्द पेयजल का एक बहुत बड़ा बाज़ार तैयार हो गया है। आज देश में जन स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है तथा इस बात को बिल्कुल ही अनदेखा किया जा रहा है कि कामगारों के स्वास्थ्य में सुधार का फायदा उत्पादकता के रूप में सामने आता है।

आज हमारे नीति निर्माता इस बात को भी विस्मृत कर जाते है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है और स्वस्थ्य नागरिक ही एक मज़बूत राष्ट्र का निर्माण करते हैं। अत: किसी भी राष्ट्र को स्वास्थ्य सुधार के मामले में अपेक्षाकृत अधिक धयान देना चाहिए। परंतु हरित एवं श्वेत क्रांतियों की सफलताओं के बावज़ूद समाज के कमज़ोर वर्गों की महिलाओं और बच्चों में कुपोषण बढ़ा है। मलेरिया और कालाजार महामारी बन रहे हैं, घेंघा और टी.बी. का कुचक्र बढ़ रहा है। फाइलेरिया, चिकिन पाक्स और पोलियों की वापसी हो रही है। इसके अलावा एड्स, कैंसर एवं नशीली दवाओं की लत जैसी भयंकर समस्याएं तेजी से पैर पसार रही हैं। ये समस्याएँ जनस्वास्थ्य, समाज और अर्थव्यवस्था के लिए भारी चुनौतियां हैं। देश में लगातार बढ़ती आर्थिक असमानता भी इसमें दोषी है एक तरफ तो पंच सितारा पध्दति के सर्व सुविधायुक्त अस्पताल खुल रहे हैं तो दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों का चक्कर काटता हुआ गरीब आदमी मलेरिया से दम तोड़ रहा हैं उसे कुनेन और पेरासिटामाल की गोली भी दुर्लभ है। आज़ादी के बाद अस्पताले खुलीं, दवाओं की आपूर्ति बढ़ी डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ी अगर आंकड़ों पर गौर करें तो सन् 1951 में देश भर में 725 स्वास्थ्य केन्द्र तथा 9209 अस्पताल और 61800 डॉक्टर थे, जो वर्ष 2004 तक बढ़कर क्रमश: 1,68,986 स्वास्थ्य केन्द्र, 38000 अस्पताल और डॉक्टरों की संख्या 6,25,131 हो गई। परंतु आम आदमी की समस्याएँ और बीमारियाँ में कहीं कमी न ही आई। सरकारी अस्पताल भ्रष्टाचार के केन्द्र बन गए। औषधिा का स्थान चूने की गोलियों ने लिया और विकल्पहीनता की स्थिति में ही अब आदमी सरकारी अस्पताल में जाना चाहता है एक तरफ महंगे इलाज वाले प्राइवेट अस्पताल है, तो दूसरी ओर सुविधााहीन सरकारी अस्पताल मतलब मौत गरीब, मज़दूर और मेहनत कश की है। निश्चित रूप से ऐसी स्थिति नीति निधर्रकों और शासन तंत्र को सोचना होगा कि देश के हर एक नागरिक को सस्ता और सुलभ इलाज मिल सके जो कि त्वरित भी हो। इस दिशा में सम्पूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था का संचालन व निधर्रण सेवाभावी ट्रस्टों, एन.जी.ओ. और व्यवसायिक घरानों को सौंपा जाना चाहिए, क्योंकि अभी तक जो उदाहरण हमारे सामने है उनके अनुसार जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में इस प्रकार के संस्थानों ने उत्कृष्ट कार्य किए हैं। इस दिशा में टाटा ग्रुप, मिशनरीज और विभिन्न धार्मार्थ ट्रस्टों के अस्पतालों के नाम उल्लेखनीय है। इस प्रकार चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में त्वरित जवाबदेही तो सामने आएगी जो कि सरकारी नियंत्रण वाले अस्पतालों में नहीं देखी जा रही है, जहाँ पर जो चिकित्सक घड़ी के कांटों से काम प्रारंभ और खत्म कर देते हैं और वहीं चिकित्सक अपने निज़ी चिकित्सालय में दिन रात इलाज करते हैं। फिर स्वास्थ्य सेवाओं के सरकारीकरण के आडम्बर को क्यों ढोया जाए ? इनकी स्थापना और संचालन पर होने वाली भारी-भरकम राशि का उपयोग जनस्वास्थ्य बीमा योजनाओं पर हो, देश क हरेक गरीब, नागरिक का स्वास्थ्य बीमा सरकारी खर्च पर होना चाहिए। तथा इन निज़ी चिकित्सालयों को इसके माधयम से गरीबों के इलाज का भुगतान होना चाहिए।

चिकित्सा सेवा में सुधार के साथ-साथ ग्रामीण विकास, कृषि व खाद्यान्न उत्पादन, स्वच्छता और पेयजल आपूर्ति को भी जन स्वास्थ्य से संलग्न मुद्दा मानकर इन विषयों पर भी गौर करना होगा। आज के बाज़ार के युग में जनस्वास्थ्य बाज़ार से जुड़ा मुद्दा भी है यह बात भी विचारणीय है।

डॉ. सुनील शर्मा