संस्करण: 31दिसम्बर-2007

उथल-पुथल से भरपूर 2007
     एल.एस.हरदेनिया

पिछला वर्ष भारत के पड़ोसियों के लिए अत्यधिक दुखदायी व चिंता का रहा। भारत के दो पड़ोसी देशों की-बंगलादेश व पाकिस्तान प्रजातंत्र की व्यवस्था चरमरा कर धाराशायी हो गई। वहीं दो अन्य देशों-बर्मा व नेपाल में प्रजातंत्रात्मक व्यवस्था की स्थापना के लिए ख़ूनी संघर्ष जा रहा। वैसे पहले से ही बंगलादेश व पाकिस्तान में प्रजातांत्रिक संस्थाएँ अत्यधिक कमजोर नींव पर खड़ी थीं। परंतु वे भी पिछले वर्ष ताश के पत्तों के समान धवस्त हो गई। बंगलादेश में तो चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। बंगलादेश के संविधान के अनुसार चुनाव के दौरान वहाँ पदस्थ चुनी हुई सरकार इस्तीफा दे देती है और उसके स्थान पर एक अंतरिम सरकार सत्ता संभालती है। इस अंतरिम सरकार के मुखिया ने सत्ता सम्हालते ही आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल लागू करने के बाद बंगलादेश के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों के विरूध्द दंडात्मक कार्यवाही प्रारंभ हो गई। यह संयोग है कि ये दोनो पूर्व प्रधाानमंत्री महिलाएँ है। जिस समय बंगलादेश में आपातकाल लागू किया गया उस समय शेख हसीना, जो बंगलादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं, विदेश में थीं।बंगलादेश की अंतरिम सरकार ने उन्हें देश में प्रवेश करने से रोका। बाद में उन्हें किसी तरह आने दिया गया। उसी तरह बंगलादेश की एक और पूर्व प्रधानमंत्री बेगम जिया को गिरफ्तार कर दिया गया शेख हसीना को भी गिरफ्तार कर लिया गया। चुनाव फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। अब चुनाव कब होंगे यह कहना मुश्किल है। पाकिस्तान में तो घटनाक्रम अत्यधिक नाटकीय रहा। वहां के सैनिक राष्ट्रपति ने वहाँ के मुख्य न्यायाधीश  को बर्खास्त कर दिया, बाद में उन्हें फिर से मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। यह भी एक अजीब संयोग है कि पाकिस्तान के दो पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तथा बेनज़ीर भुट्टों सात साल से पाकिस्तान से बाहर रह रहे थे।कुछ दिनों पूर्व नवाज शरीफ जब पाकिस्तान वापस लौटे तो उन्हें हवाई अड्डे से ही सऊदी अरेबिया के लिये रवाना कर दिया गया परंतु कुछ दिनों बाद एक और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों को पाकिस्तान आने दिया इसी बीच मुशर्रफ फिर से राष्ट्रपति बन गए। परंतु उनने राष्ट्रपति बनते ही पाकिस्तान में आपातकाल घोषित कर दिया। पिछले 15 दिसंबर को मुर्शरफ ने आपातकाल समाप्त भी कर दिया। उनने आश्वासन भी दिया है कि जनवरी में पाकिस्तानी संसद का चुनाव हो जाएगा।

इस दरम्यान पाकिस्तान की जनता ने तानाशाही का जमकर विरोधा किया विरोधा करने वालों में मीडियाकर्मी तथा वकील शामिल थे। इस विरोधा से यह आशा बढ़ी है कि पाकिस्तान में वास्तविक प्रजातंत्र होने की संभावना है।

2007 में नेपाल में क्रांतिकारी परिवर्तनों की स्थितियां निर्मित हुई हैं सदियों पुराना राजतंत्र की नींव पूरी तरह हिल चुकी है। यह अत्यधिक संतोष की बात है कि नेपाल के सभी राजनीतिक दल राजतंत्र के विरूध्द एकमत हैं। अंतर इतना है कि कुछ दल इस परिवर्तन की प्रक्रिया को दुरतगति से पूरा करना चाहते तो कुछ उसे शनै: शनै: करना चाहते हैं।

2007 में बर्मा में स्थितियाँ विस्फोटक रहीं। वहाँ के सैनिकों शासकों के विरूध्द विरोधा के स्वर ज्यादा मुखारित हुए हैं। वहाँ के सैनिक शासक कितने आततायी हैं कि उनके विरूध्द आवाज बुलंद करने वालों में वहाँ के बुध्द भिक्खु भी शामिल हो गए हैं। इस दरम्यान बर्मा के सैनिक शासकों पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी बढ़ा है। आशा है 2008 बर्मा के सैनिकों शासकों शासकों का तख्ता पलटते देखेगा।

जहाँ तक हमारी आंतरिक स्थिति का सवाल है। लगभग पूरा वर्ष अणुशक्ति संधि तथा नंदीग्राम के झगड़े में ही उलझा रहा। वामपंथियों ने जो भूमिका अपनाई है उस पर आने वाली पीढ़ियां भरोसा नहीं करेंगी। एक तरफ वामपंथियां के समर्थन से केंद्र की यूपीए सरकार सत्ता में बनी हुई है वहीं दूसरी और वामपंथ के कारण यूपीए सरकार की नींद लगभग वर्ष भर हराम रही। इस तरह प्रेम, व घृणा का संबं दुनि के किसी अन्य राष्ट्र में नहीं पाया जाएगा। वामपंथी किसी भी हालत में अमरीका से संधि का समर्थक नहीं थे। वर्ष भर बीच-बीच में सरकार से समर्थन वापिस लेने की धामकी देते रहे। परंतु ऐसा किया नहीं। जहाँ वामपंथ ने केंद्रीय सरकार पर सतत दबाव बनाए रखा वहीं स्वयं नंदीग्राम की समस्या में बुरी तरह उलझे रहे। इस मुद्दे को लेकर पश्चिम बंगाल की काफी आलोचना हुई। आलोचना का मुख्य कारण माक्र्सवादी मुख्यमंत्री द्वारा अपनी पार्टी के लोगों द्वारा वहाँ घुसपैठ किए हम लोगों को खदेड़ना था। आरोपित है कि पार्टी सदस्यों ने हथियारों का खुलेआम उपयोग किया था। इस बात की भी आलोचना की गई कि मुख्यमंत्री ने भी पार्टी के सदस्या की इस हरकत को उचित ठहराया था। बुध्ददेव भट्टाचार्य ने कहा हमने उनके साथ ''टिट फार टेट'' का व्यवहार किया है। परंतु कुछ समय बाद मुख्यमंत्री ने अपनी गलती स्वीकारी जो उनके बड़प्पन का प्रतीक था तथा जो इस बात का भी संकेत देता है कि वे व उनकी पार्टी नंदीग्राम की घटनाओं से सबक सीखने को तैयार हैं। संपूर्ण देश के किसी न किसी कोने में आतंकवादी ऐसी घटनाएँ करते हैं। जिससे हर किसी का दिल पसीज जाता है। पिछले वर्ष में ही उत्तरप्रदेश में कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद नहीं थी। मायावती ने जो किया उससे उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी अब ''सब जन'' की पार्टी बनने जा रही है। मायावती और उनके कांशीराम जीवन भर ब्राम्हण, क्षत्रियों व वैश्य को गालियां देते रहे और उन्हें कभी बहुजन समाज का हिस्सा नहीं मानते थे, उन्हें वे लगभग गालियों के लहजे में मनुवादी बताते थे। मायावती ने उन्हीं के साथ समझौता किया और भारी संख्या में इन वर्गो के लोगों को टिकट दिया, जिताया भी और उच्च पदों पर बिठाया भी। शासन यह 2007 का यह सबसे बड़ा अजूबा था। मधयप्रदेश के भीतर 2007 के शुरू के दिनों में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का सितारा बुलंदी पर रहा। परंतु 2007 के अंतिम हिस्सों में ''डंपर'' के कारण उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची। डंपर कांड की बदनामी से वे अभी तक उभरे भी नहीं थे कि खरगोन लोकसभा तथा सांवेर विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी की करारी हार से उनकी प्रतिष्ठा को और ठेस पहुँची और जिस काँग्रेस में लगभग मुर्दानगी छायी हुई थी सांवेर व खरगोन की जीत ने उस कांग्रेस को एक नई जिंदगी दे दी। इसके पूर्व सीधी लोकसभा का तथा शिवपुरी में भी भाजपा की हार हो चुकी थी। इन क्षेत्रों में 2003 में भाजपा ने विजय पाई थी। इन उपचुनावों में हार के बाद यह शंका होने लगी है कि क्या 2008 में भाजपा पुन: सत्ता में आ सकेगी या नहीं।

2007 की दो अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं थी गुजरात का महाचुनाव तथा राजस्थान में गुर्जरों का आंदोलन।

गुजरात में नरेन्द्र मोदी की जीत से एक नया इतिहास बना है।

एल.एस.हरदेनिया