संस्करण: 31दिसम्बर-2007

 भविष्य के सपने और भूत के भय के परिणाम

   प्रमोद भार्गव

 गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम प्रचार अभियान में सकारात्मक सोच की सार्थक अभिव्यक्ति का जनादेश  सिद्ध हुए हैं। भाजपा बनाम नरेन्द्र मोदी ने जहां भविष्य के सपने दिखा आशावादी माहौल रचा और नई उम्मीदें जगाईं। वहीं कांग्रेस भूतकाल का भय जताते हुए दु:स्वपों में उलझी रही। कांग्रेस ने मोदी विरोधियों को साथ लेकर सत्ता में आने का जो सपना देखा था वह चकनाचूर हो गया। उसके पास भविष्य का कोई एजेण्डा भी नहीं था। परिणाम पूर्व इस चुनाव को भले ही कड़े संघर्ष के रूप में देखा गया लेकिन गुजरात के जागरूक मतदाताओं ने स्पष्ट जनादेश देकर दलबदलुओं और निर्दलियों की भूमिका को ही नकार दिया है। चुनाव में मोदी केन्द्रीय भूमिका में रहने के साथ भावी प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में भी देखे जाने लगे हैं। लिहाजा बतौर राष्ट्रीय एजेण्डा दक्षिणपंथी राजनीति में उग्र हिन्दुत्व उभरेगा और कांग्रेस अल्पसंख्यक जाप में ठहराव लाने की कोशिश कर सकती है ?

मौत का सौदागर निरूपित किए गए मोदी नतीजों के बाद सपनों के सौदागर साबित हुए हैं। राक्षसी संबोधन और गौड़से के अनुयायी जैसी कांग्रेस की दलीलें मतदाता को न तो उकसा पाईं और न ही बरगला पाईं। उलटे मोदी आधुनिक विकास के कारगर सूत्रधार बनकर सामने आए। उनके विशिष्ट अंदाज, विकासोन्मुखी ईमानदार छवि, आक्रामक भाषण शैली और अपने कामकाज पर जरूरी जनमत संग्रह जुटाने में मोदी सफल रहे। मौत का सौदागर वाक्य को उन्होंने तुरूप के इक्के के रूप में इस्तेमाल कर बखूबी भुनाया। नतीजतन मोदी एक ऐसे कद्दावर नेता हैं जो पार्टी कार्यकर्ताओं के विद्रोही तेवर, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल, भारतीय किसान संघ और मीडिया से भी लोहा लेते हुए जीत का दमखम रखते हैं। संघ की यह परेशानी हो सकती है कि साधारण स्वयं सेवक रहे मोदी का व्यक्तित्व संघ की शाखाओं की भट्टियों में तपकर ही खरे सोने की तरह निखरा और वही मोदी  संघ से आंखें तरेर रहे हैं ? आंख की किरकिरी बने मोदी का भविष्य में संघ से टकराव भी संभव है। क्योंकि संघ की बढ़ते कद के पांव काट देने की परंपरा रही है। कल्याण सिंह और उमा भारती इस आदी परंपरा के शिकार हो चुके हैं।

मोदी के सामने ऐसा कोई करिश्माई प्रतिद्वंदी चेहरा या व्यक्तित्व नहीं था जिसे खण्डित करने में वे अपनी मनीषा लगाते अथवा ऊर्जा झोंकते। मोदी की तुलना में कांग्रेस मुख्यमंत्री के रूप में किसी नेता को पेश नहीं कर सकी। ऐसे में मतदाता दांव भी लगाता तो किस पर ? कांग्रेस ने विश्वास भी किया तो भाजपा के दिग्गज बागी नेता केशुभाई पटेल पर। लेकिन वे अपने ही गढ़ में कोई चमत्कार नहीं दिखा पाए। इससे तय होता है कि मतदाता को कांग्रेस की भाजपा के बागी केशुभाई से नजदीकी रास नहीं आई। इन अनुकूल परिस्थितियों में नरेन्द्र मोदी को स्वयं को उभारने और निखारने के भरपूर अवसर मिले। इसीलिए वे अपने आभा मण्डल में चमक भी लाए और उसका विस्तार भी किया। फलस्वरूप राज्य में कांग्रेस सोनिया के नेतृत्व में एकजुट रहने के बावजूद कोई करतब नहीं दिखा पाई और मोदी स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं में बिखराव के बाद भी जीत का सेहरा अपने सिर बांधने में सफल रहे।

जीत के बाद मोदी की तत्काल प्रतिक्रिया ''सीएम हूं और रहूंगा'' से भले ही अहंकार झलकता हो लेकिन फिल्मों के द्विअर्थी संवादों की भांति मोदी ने सीएम के मायने 'कॉमन मेन बनाम आम आदमी' में बदल दिए। मसलन मोदी गुजरात की साढ़े पांच करोड़ जनता के मुख्यमंत्री भी हैं और जनता के बीच आम आदमी थी ! शायद इसीलिए उनकी लोकप्रियता प्रचार अभियान के दौरान फिल्म स्टारों और धर्मगुरूओं की तरह दीवानेपन की हद तक दिखाई देती रही है। यहां तक कि युवतियों ने भी अपने गालों पर ऑटोग्राफ लेने के लिए मोदी से आग्रह किया। लेकिन मोदी ने भारतीय परंपराओं का ख्याल रखते हुए इस तरह की बेहुदी हरकतों को उम्र की नादानी समझते हुए मर्यादा का ही पालन किया। मोदी की छवि के कायल युवा तो हैं ही महिलायें भी उनकी जबरदस्त प्रशंसक हैं।

मोदी ने जातीय समीकरणों और सरोकारों को दरकिनार कर खुद को एक दुखी राष्ट्रवादी हिन्दू की तरह केन्द्र में  खड़ा कर प्रचार अभियान की शुरूआत की। यह पहला मौका था जब गुजरात चुनाव में भाजपा के आला नेता बैनर पोस्टरों से कमोवेश नदारद थे। मोदी गोधरा दंगों को बहुसंख्यक समाज का स्वाभाविक आक्रोश जताने में उसी तरह सफल रहे जिस तरह 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजे दंगों पर राजीव गांधी ने 'कोई बड़ा दरख्त गिरता है तो धरती हिलती ही है' कहकर दुलारा था। हालांकि कांग्रेस ने जातीय आधार पर लाभ उठाने की कोशिशें की। उसने पटेल पाटीदार और कोली जातियों को पत्तों के रूप में उछाला भी। केशुभाई से भी कांग्रेस को उम्मीद  थी कि सौराष्ट्र में पटेल मतदाताओं को रिझा लेंगे। लेकिन भाजपा को कोई बड़ा घाटा नहीं हुआ। केशुभाई से दक्षिण गुजरात में भी ऐसी ही उम्मीद थी लेकिन कांग्रेस मतदाताओं से अपेक्षित प्रतिसाद नहीं पा सकी ? मोदी की अपनी जाति का वैसे भी गुजरात में कोई मजबूत आधार नहीं है। बमुश्किल एक प्रतिशत मोदी समुदाय है। भाजपा में जातीय दंभ के गुमान में रहे नेताओं को टिकट न देकर मोदी पहले ही किनारा कर चुके थे। ये बागी कांग्रेस की झोली में बैठकर अथवा भाजपा से बेदखल उमा भारती की जनशक्ति की शक्ति हासिल कर लेने के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए। गुजरात के नतीजों ने तय किया कि ईमानदार और निर्णायक नेतृत्व के लिए जातीय आधार कोई मायने नहीं रखते ? इसीलिए गुजरात में मोदीत्व की तूती बोली।

मोदी के उत्कर्ष को भाजपा के बे नेता नहीं पचा पा रहे हैं जो अशोक रोड पर भाजपा कार्यालय मे बैठे शंतरंजी चालें चलते रहते हैं। ये नेता अतीत में कई जमीनी नेताओं की दुकानें बंद करने और खोलने में करिश्मे दिखाते रहे हैं। लेकिन अब मोदी की बल्ले-बल्ले से उन्हें ही खतरा उत्पन्न हो गया है। उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी देखा जा रहा है। उनके उग्र हिन्दुत्ववाद के चलते  ऐसे भी कयास लगाए जाने लगे हैं कि अब बाल ठाकरे और आडवाणी जैसे दिग्गज नेपथ्य में चले जाएंगे ? आडवाणी को इसी नेपथ्य की छाया से बचाए रखने के लिए पार्टी और संघ के शीर्ष नेतृत्व ने गुजरात की गहमा-गहमी के बीच ही आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तक घोषित कर दिया। ऐसी अटकलें हैं कि ऐसा नरेन्द्र मोदी की चुनौती से बचने के लिए किया गया। हालांकि अभी मोदी राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाने के लायक नहीं हैं। यदि वे दिल्ली में जगह तलाशते हैं तो उन्हें विवेक और विनम्रता का लावादा ओढ़ना होगा जो उनके चाल, चरित्र और चेहरे के अनुकूल फिलहाल की स्थितियों में नहीं है। गुजरात में जीत के बाद मोदी का कद इतना जरूर बढ़ गया है कि वे संघ और भाजपा को स्वीकारने की विवशता बन गए हैं।

गुजरात चुनाव परिणामों ने यह भी तय किया कि सोनिया का जादू आक्रामक नेतृत्व के समक्ष चलने वाला नहीं है। क्योंकि सोनिया का चुनावी सभाओं में लिखा हुआ भाषण उठाए जाने वाले परंपरागत मुद्दों की उबाऊ पुर्नावृत्ति भर रह गए हैं। उनमें भूतकाल की भयावहता का जिक्र तो होता है लेकिन भविष्य के सपनों के दृष्टांत और दृष्टि का अभाव है। गुजरात में भी उन्होंने अतीत की ही घटनाओं को दोहराया। चतुर और प्रतिउत्पन्नमति मोदी ने सोनिया द्वारा उठाए मुद्दों को ही प्रतिक्रिया स्वरूप उछालकर राष्ट्रीय सन्दर्भ से जोड़ा और जनता की भावनाओं को भुनाया। जब सोनिया ने गोधरा और सोहराबुद्दीन के प्रसंग में मोदी को 'मौत का सौदागर' ठहराया तो मोदी ने दिल्ली सल्तनत से खुद के लिए फांसी पर चढ़ा देने का आह्वान कर डाला। वहीं संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी के फंदे से बचाए रखने के लिए उन्होंने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को हथियार बनाकर कांग्रेस पर तीखे प्रहार किए। मोदी आतंकवाद जैसे मुद्दों को राज्य की अस्मिता से जोड़ने में भी कामयाब रहे।

लोकतंत्र में मोदी एक चमत्कारी नेतृत्वकर्ता के रूप में सामने आए हैं। मोदी क्षेत्रीय गरिमा को राष्ट्रवादी भावना से ओतप्रोत कर देने में भी सफल रहे। इसीलिए गुजरात में भाजपा की लहर नहीं मोदी का वाद चला। जिसे प्रबुद्ध राजनैतिक समीक्षकों ने मोदीत्व की संज्ञा दी। इसी मोदीत्व के चलते मोदी अब मायावती, जयललिता, लालूप्रसाद यादव, मुलायम सिंह और चन्द्रबाबू नायडू की तरह क्षेत्रीय छत्रप भी बनकर उभरे हैं। उनके महत्व और वजूद को भविष्य में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

प्रमोद भार्गव