संस्करण: 31दिसम्बर-2007

 योजनाओं में रखें आखिरी आदमी का खयाल

   अखिलेश सोलंकी

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के बाद अब ग्यारहवीं योजना के मसविदे पर राष्ट्रीय विकास परिषद की भी मुहर लग गई है। यानी इसे अमल में लाने का रास्ता साफ़ हो गया है। गौर करें तो इस योजना का जोर तीन बातों पर है। एक, योजना-काल के शुरूआती दौर में विकास दर को नौ फीसद और अंतिम वर्ष में दस फीसद तक ले जाना। दो, पिछली, योजना की तुलना में शिक्षा के लिए आबंटन काफ़ी बढ़ा दिया गया है। इस मद में व्यय में भारी बढ़ोत्तरी की ज़रूरत इसलिए भी महसूस की गई कि ऊंची विकास दर बड़े पैमाने पर कुशल मानव-श्रम के बगैर हासिल नहीं की जा सकेगी। तीन, पहली बार पंचवर्षीय योजना में सार्वजनिक और निज़ी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाने की वकालत की गई हैं। इनके अलावा बाकी बातें वही हैं जो हर योजना के मसविदे में मिल जाएंगी। केन्द्र सरकार और योजना आयोग ने इस योजना के ज़रिए उम्मीदों का जो नक्शा बुना है उसके केन्द्र में जीडीपी की वृध्दि दर है। इस विकास दर का कितना फायदा गरीबों को मिल पा रहा है इस सवाल का सीधो जवाब न देकर कहा गया है कि विकास दर को अधिक से अधिक समावेशी बनाया जाएगा। लेकिन यह कैसे होगा, इसका कोई संतोषजनक उत्तर मसविदा नहीं देता।

दरअसल, योजना के प्रारूप में गिनाने के लिए ढेर सारी अच्छी लगने वाली बातें शामिल कर ली गई हैं, पर अधिकतर बुनियादी सवालों को दरकिनार कर दिया गया है। मसलन, देश में क्षेत्रीय विषमता बहुत तेज़ी से बढ़ रही है और इसमें कुछ हाथ केन्द्रीय योजना में राज्यों को मिलने वाले आबंटनों का भी रहा है। मगर लगता है क्षेत्रीय गैर बराबरी न तो केन्द्र के लिए कोई खास चिंता की बात है और न योजना आयोग के लिए। पांच साला प्रारूप में कुछ और भी कमियां हैं। जैसे, इसमें पर्यावरण-रक्षा पर बहुत कम धयान दिया गया है। जिस समय सारी दुनिया जलवायु बदलाव से निपटने के लिए कमर कस रही है, और भारत पर भी इस संकट के बादल मंडरा रहे हैं, योजना आयोग का मसविदा इस मसले पर लगभग चुप्पी साधो हुए हैं।

राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने संघीय भावना और जिम्मेदारी से ग्यारहवीं योजना को अमल में लाने का आव्हान किया। लेकिन इसके बरक्स विकास संबंध प्राथमिकताएं तय करने में राज्यों की भूमिका घटा दी गई है। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस पर कड़ी आपत्ति की, जो कि उचित नहीं थी, मगर वह अल्पसंख्यक विवाद में दब कर रह गई।

हर योजना भविष्य की सुनहरी तस्वीर दिखाते हुए शुरू होती है। लेकिन इस अवसर पर प्रधानमंत्री के भाषण में ही चेतावनी की घंटी भी सुनाई दी। उन्होंने कहा कि जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घट कर बीस फीसद से नीचे आ गई हैं। इसे बढ़ाने का दिलासा योजना के मसविदे में दिया गया है।

प्रधानमंत्री ने आने वाले दिनों में खाद्य सुरक्षा पर दबाव पड़ने की भी आशंका जताई है। इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने भी खाद्यान्न की उपलब्धाता में कमी आने की चेतावनी दी हैं। सवाल है कि क्या खेती को गैर-लाभकारी बनाए रख कर इस खतरे से निपटा जा सकता है ? कर्ज में डूबे किसानों को राहत दिलाने के लिए एक विशेष पैकेज लाने की बात तो कही है, मगर खेतो को कैसे पुसाने लायक बनाया जाए इसकी फिक्र मसविदे में सिरे से नदारद है। ऐसे में अगली योजना के साथ कितनी उम्मीद जोड़ी जाए !

आर्थिक उदारीकरण में अहम् भूमिका निभाने वाले योजना आयोग के उपाधयक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को प्रधानमंत्री का सबसे करीबी आर्थिक रणनीतिकार माना जाता है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से जुड़े रहे उस वक्त देश के वित्त सचिव थे जब नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में मनमोहन मोंटेक की जोड़ी ने देश में आर्थिक सुधारों की शुरूआत की थी। उनका मानना है कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में कृषि की हालात सुधारी है और किसानों की आत्महत्याएँ भी कम हुई हैं। मोंटेक का दावा है कि पहले के मुकाबले भ्रष्टाचार कुछ कम हुआ है लेकिन आज भी रुपए में से 50 पैसे ही खर्च हो पाते हैं।मोंटेक के मुताबिक ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य है समाज के सभी तबकों का तेज़ी से विकास। योजना के पहले साल में विकास दर 'करीब' साढ़े आठ फीसदी रहेगी। मोंटेक मानते हैं कि विकास का लाभ समाज के निचले तबके को हुआ है, लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए। गरीबी रेखा के वाले लोगों का प्रतिशत कम हुआ है। लेकिन यह उतनी तेज़ी से कम नहीं हो पा रहा है। देश की 28 फीसदी आबादी अब भी गरीब है। लेकिन 46 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। 50 फीसदी छात्र सेकेंडरी शिक्षा से पहले ही स्कूल छोड़ देते है। खून की कमी से पीड़ित महिलाओं का ऑंकड़ा 60 फीसदी है। सरकार का धयान योजना को लागू करते समय इस बात पर ज़रूर होना चाहिए, क्योंकि ऊपरी तौर का विकास या मधयवर्ग का विकास ही विकास नहीं होता। असली विकास आखरी आदमी तक पहुँचने वाली सुविधाएँ हैं।

अखिलेश सोलंकी