संस्करण: 31दिसम्बर-2007

''युवाओं को नैतिक अवनति की ओर ले जाती तकनीकी प्रगति''
 स्वाति शर्मा

आज की युवा पीढ़ी संचार माधयमों व प्रौद्योगिकी की दीवानी है। ये उनकी जिंदगी का अहम् व अविभाज्य हिस्सा बन चुके हैं। युवाओं के आई. पॉड आदि आवश्यकताओं के साथ-साथ फैशन की अभिव्यक्ति का माधयम बन गए हैं। ये अपने कई घंटे इन उपकरणों के साथ बिताते हैं। 12 से 29 साल के किशोर व युवाओं के इस वर्ग को ऐसा लगता है कि प्रौद्योगिकी के नए उपकरण उनके जीवन का अहम हिस्सा हैं, जिनके बगैर आज के आधुनिक समय के साथ वे कदम नहीं मिला सकते। इस पीढ़ी के बच्चों को 'टेक्नॉलॉजी बेबी' कहा जा रहा है, जिनका जन्म 1985 से 1998 के बीच हुआ है और इनकी संख्या 3 करोड़ 20 लाख के लगभग हैं। इंडियन एकेडमी फॉर पेडिएट्रिक्स के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत का औसत बच्चा, एक साल में स्कूल के बजाय टी.वी. के सामने औसतन 30 घंटे प्रति सप्ताह और स्कूल में 25 घंटे प्रति सप्ताह व्यतीत करता हैं। अर्थात एक आधुनिक युवा प्रतिदिन औसत आठ घंटे टी.वी., मोबाइल, कंप्यूटर व इंटरनैट पर सर्फिंग, चैटिंग, फिल्म व गाने डाउनलोड करने में खर्च करता है।

कंप्यूटर आदि आधुनिक उपकरणों पर युवा पीढ़ी की इतनी निर्भरता वाकई एक चिंता का विषय है। प्रश्न उठता है कि यह तकनीकी प्रगति सकारात्मक प्रभाव छोड़ रही है या नकारात्मक। इनका एक सीमा तक उपयोग तो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है, परंतु इन पर अधिक निर्भरता उन्हें जीवन के स्वाभाविक आनंद से दूर ले जाती है। सामाजिक व्यक्ति के रूप में उनका विकास रूक जाता है। वे स्वयं इन उपकरणों की भाँति मशीनी व्यवहार करने लगते हैं। अर्थात उनकी मानवीय संवेदनाएँ कम होने लगती हैं। उन्हें परिवार व समाज के लोगों से मेल जोल बढ़ाने का समय ही नहीं रहता। यहाँ तक कि स्वयं को पहचानने हेतु भी समय नहीं निकाल पाते। अन्य शैक्षिक, सांस्कृतिक, सामाजिक कार्यों व गतिविधियों में भी ये युवा भाग नहीं लेना चाहते। इस तकनीकी विकास में ये आधुनिक चीजों से तो परिचित हो जाते हैं, परंतु सांस्कृतिक चीजों से अनभिज्ञ रहते हैं। अत: उनका एक पक्षीय विकास होता है।

वास्तव में यह तकनीकी विकास उन्हें नैतिक पतन की ओर ले जा रहा है। साइबर कैफे का चलन युवाओं में बहुत तेज़ी से बढ़ा है। इंटरनैट के फायदे तो अनेक हैं, यह हम सभी जानते हैं, परन्तु तकनीकी उपयोगिता से बढ़ते एकाकीपन के कारण युवक-युवतियाँ इसका बहुत दुरूपयोग भी कर रहे हैं। मोबाइल व नैट से भेजे जाने वाले 50 प्रतिशत एस.एम.एस. अश्लील होते हैं। लड़कियाँ भी इस मामले में पीछे नहीं है। एम.एम.एस. तकनीक ने तो अश्लीलता की सारी हदें ही पार कर दी हैं। एक सर्वे के मुताबिक मोबाइल अश्लीलता का कारोबार पिछले साल 23 हजार करोड़ रु. का हो चुका है।

आज की युवा पीढ़ी पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित, एम.टी.वी. के संगीत पर थिरकने वाली, माता-पिता व गुरू को परंपरागत सम्मान न देने वाली है। यह अपनी सभ्यता व संस्कृति के नैतिक मूल्यों को भूल चुकी है।युवाओं को समझना होगा कि एक सीमा के बाद यह भौतिकवाद, भोगवाद व पश्चिमी रहन-सहन वाली विचारधारा बहुत हानिकारक सिध्द होती है। हमारे देश में विवाह को कितना पवित्र व जीवन पर्यंत निभाया जाने वाला बंधान माना जाता है, जबकि विदेशों में उन्मुक्त यौन संबंधा, शादी व तलाक रोजमर्रा की बातें होती हैं। युवा पीढ़ी इन सबके जाल में फंॅसती जा रही है। इनसे चरित्रहीनता व यौन रोगों के सिवाय कुछ नहीं मिलता।आज के युवा विदेशों की तर्ज पर बूढ़े माता-पिता की परवाह नहीं करते, उनकी ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहते। भाई-बहन, देवर-भाभी, चाचा-चाची, दादा-दादी, मामा-मामी, आदि ढेर सारे स्नेहयुक्त रिश्तों की उनकी नज़रों में अहमियत कम होती जा रही है। युवतियाँ भी लज्जा के आवरण को त्याग कर पश्चिमी नग्नता अपनाने में गौरव महसूस करती हैं।

युवाओं को ये समझना होगा कि दोनों सभ्यताएँ बिल्कुल विपरीत हैं।अत: उचित को ग्रहण कर अनुचित का त्याग करना ही लाभदायक है। पश्चिम के धान संपन्न लोग, अत्यंत उन्नत व विकसित लोग, वैज्ञानिक उपलब्धियों से संपन्न लोग, अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले लोग उस भौतिक सुख और वैभव से ऊब कर सुख-शांति की खोज़ में भारत की तरफ आ रहे हैं। वे भी भारतीय संस्कृति व सभ्यता को प्रशंसनीय व ग्राहय मानने लगे हैं। हमें उनकी तकनीकी प्रगति से प्रेरणा लेना है, परन्तु अपने नैतिक मूल्यों को भी बनाए रखना है। आज दुनिया के साथ कंधो से कंधा मिला कर चलने के लिए व देश को आर्थिक विकास की राह पर ले जाने के लिए युवा पीढ़ी का तकनीकी रूप से दक्ष होना आवश्यक है। परन्तु प्रौद्योगिकी का प्रयोग महज मनोरंजन के बजाय शिक्षा व जागरूकता बढ़ाने के लिए अधिक करना चाहिए। इससे आधुनिक तथा प्राचीन सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्यों के बीच में सामंजस्य बढ़ेगा।नैतिक गिरावट को रोका जा सकेगा व बच्चों एवं युवाओं का सर्वांगीण विकास संभव हो सकेगा।

स्वाति शर्मा