संस्करण: 31दिसम्बर-2007

वृध्दावस्था कल्याण विधेयक और वृध्दों का कल्याण

     डॉ.राजश्री रावत 'राज'

 माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की दुर्दशा और अनदेखी इस देश में और विदेशों में भी कोई नई बात नहीं है। वृध्दाश्रमों में बढ़ती हुई संख्या इस बात की गवाह है कि वृध्दावस्था स्वयं के शरीर के साथ-साथ उन बच्चों पर भी बोझ बन जाती है जिनके जन्म से लेकर बड़े होने, परवरिश करने और शादी कराने, आदि में माता-पिता अपना जीवन खपा देते हैं। अंत में जीवन की संधया में जब उन्हें सहारे देखभाल और इलाज की आवश्यकता होती है, तब वे ही बच्चे उन्हें असहाय उपेक्षित कर वृध्दाश्रम में छोड़ आते हैं।

यह बहुत चिंतनीय बात है कि भारत जैसे देश में, जहाँ संस्कारों को घुट्टी के साथ पिलाया जाता है, माता-पिता को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है, ऐसे लोग और बच्चे हैं जो माता-पिता को अपने साथ रखने और उनकी देखभाल करने से हिचकिचाते हैं। जिन्हें उनकेर् कत्तव्य याद दिलाने के लिए किसी कानून की आवश्यकता पड़े यह और भी अधिक दुख और चिंता की बात है। आखिर हमारे संस्कार कहाँ जा रहे हैं ? क्यों हम इतने संस्कारहीन होते जा रहे हैं? यह चिंतनीय प्रश्न है।

परंतु इन समस्याओं से पीड़ित वृध्दों को राहत देने की पहल के लिए अंतत: माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक देख रेख व कल्याण विधोयक 2007 पर लोकसभा के बाद राज्यसभा ने भी मंजूरी की मोहर लगा दी। इस कानून के तहत वे वरिष्ठ नागरिक व माता-पिता जो उपेक्षा, अनादर, तिरस्कार और अपमान के साथ-साथ बिना इलाज और उचित देखभाल की जीवन बिता रहे हैं, अपने बिगड़े बच्चों के ख़िलाफ़ ट्रिब्यूनल में शिकायत कर सकेंगे और बच्चों को इस बात पर मज़बूर कर सकेंगें कि वे गुजारे के लिए उन्हें हर महीने खर्च अदा करें, साथ ही यदि उनके साथ दर्व्यवहार हो रहा है तो वे अपने द्वारा बच्चों को हस्तांतरित की गई संपत्ति को वापस भी ले सकेंगे।

वास्तव में इस भावना का स्वागत तो होना चाहिए कि वृध्दों को कानून द्वारा कुछ सुरक्षा और राहत तो दी गई। परन्तु फिर भी कुछ प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं कि क्या इस समस्या का हल कानून बनाकर ही संभव था। वर्तमान में दैनिक जीवन में हर बच्चे को चाहे वह लड़का हो या लड़की अपने कैरियर को बनाने में और बाद में जीवन यापन में असंख्य तनावों से गुजरना पड़ता है। इस तनाव और बाज़ारवाद के युग ने संबंधां को ताक पर रख दिया हैं। हालांकि यह नहीं है कि हर बच्चा अपने माता-पिता की अनदेखी करता है पर यह भी सच है कि अनेकों तनावों के चलते कई बार चाहते हुए भी बच्चे माँ-बाप को सहारा नहीं दे पाते हैं। यहीं पर कानून भी असहाय हो जाता है। हालांकि इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता वृध्दावस्था में सार्वजनिक सहायता या सुरक्षा का अधिकार दिलवाना सरकार के प्रमुखत:र् कत्तव्यों में से एक है। जिनके अंतर्गत रियायती अथवा मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण, इलाज, और वृध्दावस्था पेंशन आदि की व्यवस्था करना सरकार का दायित्व बनता है। मगर विधोयक में यह सब स्पष्ट नहीं किया गया है। इस विधोयक में सिर्फ बच्चों को कानून के द्वारा दंडित करना और दबाव बनाना ही घोषित किया गया है। इस हेतु सरकार की तरफ से किसी विशेष फंड की घोषणा न किया जाना भी विधोयक को शक के दायरे में लाता है।

होना यह चाहिए कि कई अन्य देशों की तरह जैसे सिंगापुर मलेशिया आदि की तरह माता-पिता देख रेख कानून में संशोधान करना होगा अर्थात दंड या दबाव के साथ कुछ प्रलोभन या सहायता, जो बच्चों को आकर्षित कर सके तथा माता-पिता को साथ रखने में सहायता भी कर सके, भी दी जाये। जैसे विशेष स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ, मुफ्त इलाज और वृध्दावस्था, पेंशन आदि सरकारी-योजनाएँ यदि सरकार बुजुर्गों के लिए प्रारम्भ करती हैं तो वे ही बच्चे माता-पिता को बोझ समझते हैं, सहर्ष तैयार हो सकते हैं। इस प्रकार की सुविधाओं के उपलब्धा होने पर वे बच्चे, जो अपनी आर्थिक असहायता के कारण न चाहते हुए भी माता-पिता को अपने आप से अलग कर देते है। वे भी इनका लाभ लेते हुए अपने बूढ़े माँ-बाप की सही देखभाल और सेवा सुश्रुषा कर सकेंगे। अर्थात कानून बनाने उनको क्रियान्वित करने के साथ-साथ अन्य कल्याणकारी योजनाओं को चलाने की आवश्यकता है।

डॉ.राजश्री रावत 'राज'