संस्करण: 17दिसम्बर-2007

विकृत शिक्षा व्यवस्था और ज्ञान आयोग

    महेश बाग़ी

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारतीय शिक्षण व्यवस्था बुध्दिजीवियों की आलोचना की शिकार होती रही है। हालांकि सरकारी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार के कई प्रयास किए गए, किंतु उनका अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुआ।इसके लिये हमारे नीति नियंताओं को ज़िम्मेदार ठहराया गया और एक नीति की विफलता के तत्काल बाद दूसरी नीति अपनाई गई। इसका नतीजा भी ढाक के तीन पात की तरह ही रहा। अब सरकार ज्ञान आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने के प्रति गंभीर दिखाई दे रही है और क्षुद्र राजनीति के चलते इसका विरोधा भी होने लगा है। इसके बावज़ूद केन्द्र सरकार की पहल स्वागत योग्य है। ज्ञान आयोग की सिफ़ारिशें लागू करते समय इस तथ्य पर विशेष रूप से धयान देने की ज़रूरत है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का लाभ हमें ही मिल सके और विदेशी पलायन के प्रति भारतीय प्रतिभाओं की रूचि कम हो।

क्या यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि जिस देश ने शून्य से लेकर दशमलव तक का आविष्कार किया हो, उसी देश में अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था का विकास नहीं किया जा सका ? पूरी दुनिया में संभवत: भारत ही ऐसा देश है, जिसमें दो प्रकार की शिक्षा पध्दति अपनाई गई है। एक समय था जब भारतीय शिक्षा पध्दति को सर्वोच्च दर्ज़ा प्राप्त था, क्योंकि वह शिक्षा मस्तिष्क के साथ आत्मा का भी प्रशिक्षण देती थी, जिसका उद्देश्य ज्ञान के साथ विवेक का विस्तार करना भी था। दुर्भाग्यवश मौज़ूदा शिक्षा राष्ट्र की दुर्गति के साथ अमानवीय आचरण, निराशा, हतप्रभता और पराजित मनोवृत्ति का कारण बन चुकी है। भारत में होने वाली आत्महत्याओं के मामलों में छात्रों की सर्वाधिक संख्या इसे प्रमाणित करती है। सरकार की उदासीनता के कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था शिक्षाविदों और योग्य प्रशिक्षकों के हाथ से निकल चुकी है, जिस पर शिक्षा माफ़िया ने कब्ज़ा जमा लिया हैं। राजनेता, नौकरशाह और व्यापारियों की तिकड़ी ने शिक्षा को बंधाक बना लिया है। इसी कारण देश में शिक्षा को सबसे सफल व्यवसाय माना जाने लगा है। इन शिक्षण संस्थानों से निकले विद्यार्थी व्यावहारिक जीवन में असफल सिध्द होते हैं, क्योंकि उनकी पढ़ाई उनके किसी काम में नहीं आती है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट हमारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाल तस्वीर उज़ागर करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल लगभग 110 लाख युवक स्नातक की डिग्री तो प्राप्त कर लेते हैं, किंतु उनमें से 90 प्रतिशत यवा किसी नौकरी के लायक नहीं होते हैं। इसका कारण है शिक्षा माफिया द्वारा फैलाया गया फर्ज़ीवाड़ा, फर्जी मार्कशीट, फर्ज़ी प्रवेश, फर्ज़ी स्कूल, फर्ज़ी विद्यार्थी, फर्ज़ी शिक्षक, सामूहिक नकल जैसे सैकड़ों मामले हर साल प्रकाश में आने के बाद भी इसके ज़िम्मेदारों का बाल तक बांका नहीं होता है। लक्ष्मी की चकाचौंधा सबकी आंखों पर पट्टी बांधा देती है। ग़ैर सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में इस प्रकार की धाधाली खूब होती है। ऐसे माहौल में प्राप्त की गई डिग्री सिर्फ़ दीवार पर टांगने लायक ही होती है। एक तथ्य यह भी है कि भारत में हर साल संगठित क्षेत्र में 44 लाख और असंगठित क्षेत्र में दो करोड़ से अधिक रोज़गार के अवसर उपलब्धा होते हैं, मगर उनके लायक उम्मीदवार ही नहीं मिल पाते हैं। इस दृष्टि से हमारी शिक्षा व्यवस्था बेरोज़गारों की फ़ौज तैयार करने का काम कर रही है। कभी हमारे बुध्दिजीवी वर्ग द्वारा लार्ड मैकाले की शिक्षा पध्दति की यह कह कर आलोचना की जाती थी कि इससे क्लर्क पैदा हो रहे हैं, पर अब तो हमारे युवाओं के हाथ से क्लर्क की नौकरी भी निकलती जा रही है। पांचवे-छठे दशक में चीन को अफीमची कह कर उसकी आलोचना की जाती थी। उसने रोज़गार आधारित शिक्षा नीति अपना कर इस कलंक को धोया और आज दुनिया के सामने सिर उठाए खड़ा है और नालंदा-तक्षशिला का गौरव प्राप्त भारत आज अपने ही देश में रोज़गार के अवसरों से वंचित हो रहा है। डॉलर की चमक ने उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवकों को विदेश की उड़ान लुभा रही है और हम अपने पैरों पर खड़े होने की स्थिति में भी नहीं हैं। कभी विश्वगुरू का दर्ज़ा प्राप्त भारत के लिए क्या यह शर्मनाक स्थिति नहीं है ?

नौकरशाहों, राजनेताओं और व्यापारियों की तिकड़ी इसके लिए ज़िम्मेदार है। कभी प्रौढ़ शिक्षा, कभी साक्षरता अभियान और अब सर्वशिक्षा अभियान के नाम पर सरकारी धान पानी की तरह बहाया जा रहा है। देश में प्राथमिक शिक्षा की यह स्थिति है कि साढ़े छह हज़ार से अधिक प्राथमिक स्कूलों में से 16 प्रतिशत स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है। इन स्कूलों में 21 प्रतिशत अप्रशिक्षित शिक्षक अधयापन में जुटे हैं। ऐसी दुरावस्था के बीच करोड़ों रुपए के टी.वी. विज्ञापन सर्वशिक्षा अभियान का प्रचार कर रहे हैं। दीवारों पर इस अभियान के फायदे गिनाए जा रहे हैं और स्कूलों के यह हाल हैं कि कहीं भवन नहीं हैं, कहीं टाट पट्टी तो कहीं ब्लैक बोर्ड तक नहीं है। कुल जमा इस तरह के अभियान शिक्षा माफिया का पेट ही भर रहे हैं, जबकि शिक्षा व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है।

इन तमाम विकृतियों के बीच पहली बार यह अहसास हुआ है कि केन्द्र सरकार शिक्षा व्यवस्था के प्रति गंभीर हो चली है। 11 वीं पंचवर्षीय योजना के कुल बजट का 20 प्रतिशत यानी 2.85 लाख करोड़ रुपए शिक्षा के लिए रखे गए हैं। इससे लगता है कि सरकार ज्ञान आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने के प्रति गंभीर है। ज्ञान आयोग देश को शिक्षा के क्षेत्र में पश्चिम के समान लाना चाहता है। इसके लिए पर्याप्त धान जुटाने के सरकारी संकल्प का स्वागत किया जाना चाहिए। यद्यपि वामपंथी संगठनों ने ज्ञान आयोग की सिफारिशों की आलोचना की है, क्योंकि इससे उनका बुनियादी वैचारिक मतभेद हैं। वामपंथी विचार अपनी जगह हैं और उनके महत्व को एकदम खारिज़ भी नहीं किया जा सकता, लेकिन हमारे लिए यह ज्यादा ज़रूरी है कि शिक्षा क्षेत्र का बुनियादी ढांचा तैयार किया जाए। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज़ादी के बाद से अब तक किसी भी सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को केन्द्र में रख कर नीति-निधर्रण नहीं किया। यही कारण है कि कुल बजट का 3-4 फीसदी ही शिक्षा पर खर्च किया जाता रहा। शिक्षा के प्रति शासन की इस उदासीनता के कारण जहाँ सरकारी शिक्षा व्यवस्था लालफीताशाही के कारण चरमरा गई, वहीं निज़ी शिक्षण संस्थान धान कमाने के केन्द्र बनते चले गए। शालेय तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हम कोई कारगर पहल नहीं कर सके। जिन उच्च शिक्षा संस्थानों पर देश गर्व करता है, वहाँ से शिक्षा प्राप्त युवक यूरोपीय देशों का पेट भरने में लगे हैं। ऐसी स्थिति में अब केन्द्र सरकार ने शिक्षा बजट 20 प्रतिशत करने का साहस किया है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।

ज्ञान आयोग की मंशा है कि देश में 30 नए केन्द्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएं, जिनमें से 16 ऐसी जगह पर हों, जहां एक भी केन्द्रीय विश्वविद्यालय नहीं है। आयोग 14 विश्वविद्यालयों को 'मॉडल' दर्जा देना चाहता है, जिनमें से प्रत्येक पर एक हज़ार करोड़ रुपए खर्च होना है। इसके अलावा सात-सात नए आईआईटी-आईआईएम,पांच विज्ञान संस्थान, 10 प्रौद्योगिकी संस्थान तथा 20 सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान खोले जाने का लक्ष्य है। निश्चित रूप से इससे भारतीय शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा मिलने की उम्मीद बंधी है। शिक्षा व्यवस्था देश की ज़रूरतों को पूरा कर सके, इसके लिए यह प्रावधान करना आवश्यक होगा कि हमारे देश की प्रतिमाएं विदेशों की ज़रूरतों को ही पूरा करने का माधयम बन कर न रह जाएं।

महेश बाग़ी