संस्करण: 17दिसम्बर-2007

प्राकृतिक संसाधनों की घटती उपलब्धता

    प्रमोद भार्गव

देश में आज़ादी के बाद दूर-दृष्टि का बहाना लेते हुये जो विशाल जलाशय सिंचाई, विद्युत और पेयजल की सुविधा  के लिये हजारों एकड़ वन और सैकड़ों बस्तियों को उजाड़कर बनाये गये थे वे अब दम तोड़ रहे हैं। केन्द्रीय जल आयोग ने इन तालाबों में जल उपलब्धाता के जो ताजे आंकड़े दिये हैं उनसे ज़ाहिर होता है कि आने वाली गर्मियों में पानी और बिजली की भयावह स्थिति सामने आने वाली है। इन आंकड़ों से यह साबित होता है कि, जल आपूर्ति आलीशान जलाशयों(बांधा) की बजाय जल प्रबन्धान के लघु और पारम्परिक उपायों से ही संभव है न कि जंगल और बस्तियाँ उजाड़कर। बड़े बांधो के अस्तित्व में आने से एक ओर तो जल के अक्षय स्त्रोत को एक छोर से दूसरे छोर तक प्रवाहित रखने वाली नदियों का वर्चस्व खतरे में पड़ गया, दूसरी ओर जिन ग्रामों और कस्बों के लोगों को विस्थापित कर बसाने के जो भी प्रयास किये गये वे विस्थापित लोगों के लिये कई साल बीत जाने के बावज़ूद जीवन यापन के लिये अनुकूल सिध्द नहीं हुये।

लगातार कम वर्षा अथवा अवर्षा के चलते माताटीला सहित चार जलाशय अपनी स्थापित जल क्षमता को प्राप्त न होने के कारण न तो विद्युत उत्पादन के निधर्रित लक्ष्य को पूरा कर पाये और न ही सिंचाई और पेय जल की तय क्षमताओं पर खरे उतरे।मौसम के मिजाज में लगातार हो रहे परिवर्तन से साल दो हजार सात में मार्च माह से ही मई जैसी गर्मी की तपन परिवेश में अनुभव होने लगी है। इस कारण बिजली और पानी की मांग भी बढ़ी है। पहाड़ी क्षेत्रों में कम बर्फ गिरने व कम वर्षा से खाली पड़े जलाशय जल उपलब्धाता संबंधी चिन्ताओं को बढ़ावा दे रहे हैं। देश के 76 विशाल और प्रमुख जलाशयों की जल भण्डारण की स्थिति पर निगरानी रखने वाले केन्द्रीय जल आयोग द्वारा 10 फरवरी 2007 तक के तालाबों की जल क्षमता के जो आंकड़े दिये हैं, वे बेहद गम्भीर हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक 20 जलाशयों में पिछले दस वर्षों के औसत भण्डारन से भी कम जल का भण्डारण हुआ है। गौरतलब यह भी है कि दिसम्बर 2005 में केवल 6 जलाशयों में ही पानी की कमी थी, जबकि फरवरी की शुरूआत में ही 14 और जलाशयों में पानी की कमी हो गई है। इन 76 जलाशयों में से जिन 31 जलाशयों से विद्युत उत्पादन किया जाता है। पानी की कमी के चलते विद्युत उत्पादन में लगातार कटौती की जा रही है। जिन जलाशयों में पानी की कमी है उनमें उ.प्र. के माताटीला बांधा व रिहन्द, म.प्र. के गांधाीसागर व तवा, झारखंड के तेंनूघाट, मेथन, पंचेतहिल व कोनार महाराष्ट्र के कोयना, ईसापुर, येलदरी व ऊपरी तापी, राजस्थान का राणाप्रताप सागर, कर्नाटक का वाणीं विलास सागर, उड़ीसा का रेंगाली, तमिलनाडु का शोलायार, त्रिपुरा का गुमटी और पश्चिम बंगाल के मयुराक्षी व कंग्साबती जलाशय शामिल हैं।

चार जलाशय तो ऐसे हैं जो पिछले एक साल से लगातार पानी की कमी के कारण लक्ष्य से भी कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं। उ.प्र. के रिहन्द ज़िले के जलाशय स्थापित क्षमता 399 मेगावाट है। इसके लिये अप्रैल 2005 से जनवरी 2006 तक 938 मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वास्तविक उत्पादन 847 मिलियन यूनिट ही हो सका। म.प्र. के गांधी सागर में भी इसी अवधि के लक्ष्य 235 मिलियन यूनिट की तुलना में मात्र 128 मिलियन यूनिट और राजस्थान के राणाप्रताप सागर में 271 मिलियन यूनिट के लक्ष्य की तुलना में 203 मिलियन यूनिट विद्युत का उत्पादन हो सका। कम वर्षा के यही हालात रहे तो यह निश्चित है कि जिन जलाशयों की विद्युत की जो उत्पादन क्षमता है उसमें निश्चित रूप से असाधारण गिरावट आयेगी।

हमारे देश में बीते साठ सालों के भीतर जिस तेज़ी से कृत्रिम, भौतिक और उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा देने वाली वस्तुओं का उत्पादन बढ़ा है, उतनी ही तेज़ी से प्राकृतिक संसाधानों का या तो क्षरण हुआ है या उनकी उपलब्धाता घटी है। प्राकृतिक संसाधानों में से एक है ''पानी'' के साथ हमारे देश में ऐसा ही हश्र हुआ है। 'जल ही जीवन है' की वास्तविकता से अवगत होने के बावज़ूद पानी की उपलब्धाता भूमि के नीचे और ऊपर निरंतर कम होती रही है। आज़ादी के दौरान प्रति व्यक्ति सालाना दर के हिसाब से पानी की उपलब्धाता छ: हजार घनमीटर थी, जो अब घटकर करीब एक हजार दो सौ घनमीटर रह गई है। जिस तेज़ी से पानी के इस्तेमाल के लिए दबाव बढ़ रहा है और जिस बेरहमी से भूमि के नीचे के जल का दोहन नलकूपों से और नदी, नालों, कुओं व छोटे ताल-तलैयों से पम्पों के जरिये किया जा रहा है उससे यह निश्चित-सा हो जाता है कि अगले कुछ सालों बाद जल की उपलब्धाता घटकर बमुश्किल एक हजार घनमीटर से भी कम रह जायेगी।

पूर्व में टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टीटयूट (टेरी) के अनुसंधानपरक अधययनों से यह साबित हुआ कि भूमिगत जल के आवश्यकता से अधिक प्रयोग से भावी पीढ़ियों को कालांतर में जबरदस्त जल समस्या और जल संकट का सामना करना होगा। नलकूपों के उत्खनन संबंधी जिन आंकड़ों को हमने 'क्रांति' की संज्ञा दी, दरअसल यह संज्ञा तबाही की पूर्व सूचना है जिसे हम नज़र अंदाज करते चले आ रहे हैं। देश में खाद्यान्न सुलभता के आंकड़ों को पिछले साठ साल की एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है, लेकिन इस खाद्यान्न उत्पादन के लिए जिस हरित क्रांति प्रौद्योगिकी का उपयोग किया गया है उसके कारण नलकूपों की संख्या कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ी है, लेकिन उतनी ही तेजी से भूमिगत जल की उपलब्धाता घटी है।

अभी तक भूमिगत जल का ही संकट परिलक्षित हो रहा था, लेकिन अब केन्द्रीय जल आयोग ने जलाशयों में जलाभाव संबंधी जो आंकड़े दिये हैं, उनसे यह आशंकाऐं बढ़ गयी हैं कि बर्बादी की बुनियाद पर जिन बड़े जलाशयों की आधारशिला रखी गई थीं, और उनसे जल व विद्युत उपलब्धाता के जो दांवे बढ़ा चढ़ाकर पेश किये जा रहे थे वे खोखले साबित होने लगे हैं। हालांकि आज़ादी के बाद भारतीय जन मानस जिस तेज़ी से शिक्षित होने के बाद उपभोक्तावादी संस्कृति का अनुयायी हुआ उसी तेज़ी से उसने जल और विद्युत दोनों का बेरहमी से दुरूपयोग भी करना शुरू कर दिया। इस दुरूपयोग में सरकारी मशीनरी भी भागीदारी है। सरकारी और कॉर्पोरेट दफ्तरों के कक्षों को वातानुकूलित बनाये रखने के लिये चौबीसों घंटे एयर कंडीशनर का प्रयोग किया जाने लगा, वहीं खेतों में फसल की सिंचाई के लिये बिजली की उपलब्धाता नहीं है। गर्मियों में भी इन दफ्तरों में इतनी ठंडक पैदा कर दी जाती है कि, इन दफ्तरों में कार्यरत लोगों को गर्म कपड़े पहनने होते हैं।यह बिजली का दुरूपयोग नहीं तो और क्या है ? बिजली के ऐसे दुरूपयोग पर हर क्षेत्र में अंकुश लगाया जाना अत्यन्त जरूरी है। यदि केवल ए.सी. पर अंकुश लगाया जाता है तो हजारों मेगावाट बिजली दुरूपयोग से बचेगी।

बड़े बांधा(जलाशय) हजारों एकड़ भूमि पर खड़े जंगलों को काटकर बनाये जाते हैं। जबकि ये जंगल जलवायु को संतुलित बनाये रखने के साथ, धारती में नमी बनाये रखने के लिये भी जरूरी हैं। इस नमी से भी मिट्टी में 0.2 प्रतिशत आर्द्रता रहती है। इसी आर्द्रता से वायु में 0.1 प्रतिशत शीतलता बनी रहती है। जंगली और दुर्लभ वन्य प्राणियों के लिये भी इन जंगलों का अस्तित्व बनाये रखना जरूरी है। लेकिन हम वन्य प्राणियों की तो क्या, बड़ों बांधों के लिये उन बस्तियों और उनमें रहने वाले लोगों को भी उजाड़ देते हैं जो जल और जंगल से आत्मसात होते हुये सदियों से जीवन गुजारते चले आ रहे होते हैं। जब इन लोगों का संबंधा बांधा क्षेत्रों की जमीन और जंगल से विस्थापन के बहाने टूट जाता है तो इनकी कई पीढ़ियाँ कई दशकों तक दाने-दाने को मोहताज बनी रहती हैं। भले ही सरकार इनके ठीक से पुर्नस्थापित किये जाने के दावे चाहे जितने ही करती रहे ?

पाश्चात्य और आयात शिक्षातंत्र के बहाने हमारे राजनेताओं और नौकरशाहों ने पारम्परिक जीवन पध्दतियों की अवहेलना कर विकास के नये ढांचों को सदियों के लिये उपयोगी जताकर भले ही खड़ा किया हो ? देश की आज़ादी के पचास-साठ साल के भीतर ही विकास की कथित अवधाारणाएँ खंडित होने लगी हैं और इनके नतीजें निरर्थक साबित होने के साथ प्रकृति के साथ किये खिलवाड़ को भी स्पष्ट करने लगे हैं। यही कारण है कि आज हम अवर्षा अथवा कम वर्षा जल और विद्युत संकट का सामना करने के लिये विवश और लाचार दिखाई दे रहे हैं।

इस समस्या के निराकरण के सार्थक उपाय बड़ी मात्रा में पारंपरिक जलग्रहण के भण्डार तैयार करना है। पारंपरिक मानते हुये जलग्रहण की इन तकनीकों की हमने पिछले पचास-साठ सालों में घोर उपेक्षा की है, नतीजतन आज हम जल समस्या से जूझ रहे हैं, जबकि इन्हीं तकनीकों के जरिए स्थानीय मिट्टी और पत्थर से पद्मश्री और पद्मविभूषण से सम्मानित अण्णा हजारे की अगुआई में महाराष्ट्र के गांव रालेगन सिध्दि में जो जल भण्डार तैयार किए गए हैं, उनके निष्कर्ष समाज के सर्वांगीण विकास, समृध्दि और रोजगार के इतने ठोस आधार बने हैं कि वे जल संग्रहण की अभियांत्रिकी तकनीक (वॉटर रिर्सोसेज इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी) और रोजगार मूलक सरकारी कार्यक्रमों के लिए जबर्दस्त चुनौती साबित हुये हैं।

अण्णा हजारे द्वारा ईजाद किए कुशल जल प्रबंधान पर्यावरण की एक साथ तीन समस्याओं का निदान खोजने में भी सहायक हैं। इस तकनीक से भूगर्भीय जलस्तर बढ़ा है।भू-क्षरण रूका है और बड़े बांधों के जल रिसाव से खेती के लिए उपयोगी जो हजारों बीघा जमीन दलदल बन जाती है उसकी कोई गुंजाइश नहीं है, साथ ही जंगलों का विनाश करने की भी जरूरत नहीं है। ऐसी तकनीक ईजाद करने में हमारे वैज्ञानिक और इंजीनियर नाकाम रहे हैं। जल संग्रहण की इन तकनीकों की एक खासियम यह भी है कि इनकी संरचना के निर्माण में किसी भी सामग्री को बाहर से लाने की  जरूरत नहीं है। स्थानीय मिट्टी, पानी और पत्थर से ही जल संग्रहण की ये सफल तकनीकें तैयार होती हैं। यदि इन तकनीकों का गंभीरता से अनुसरण नहीं किया गया तो पूरे राष्ट्र को जल विद्युत और न जाने कौन-कौन सी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। जिनसे निपटना सरकार और प्रशासन के सामर्थ की बात नहीं रह जायेगी।

प्रमोद भार्गव