संस्करण: 17दिसम्बर-2007

 अब हँसी बिकने लगी है- हँसी के बहाने चले हैं
 करोड़ों कमाने

     डॉ. राजश्री रावत ''राज''

बहुल पहले कहा जाता था-''हँसना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है खुलकर हँसिए भई। हँसने के पैसे थोड़े ही लगते हैं'' परन्तु आजकल तो हँसने हँसाने के ही लोग करोड़ों कमा रहे हैं। आजकल तो लोग हँसी के बहाने चले हैं करोड़ों कमाने। जिधार देखिये लोग हँसने-हँसाने के नए-नए आइडिया ईजाद करने में लगे हुए हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दूरदर्शन की बलिहारी है वह तो जिसे चाहे आसमान पर चढ़ा दे या जिसे चाहे नीचे पटक दे। सर्वशक्तिमान टी.वी. चैनलों ने हँसी को सर्वोच्च स्थान दिला रखा है। किसी भी चैनल पर रिमोट पर रखी ऊंॅगलियाँ रूकती हैं कोई न कोई हँसी के कार्यक्रम या तो चलता दिखाई देता है या कार्यक्रम की झलकियाँ दिखाई देती ही हैं। हँसाने वाली फ़िल्में भी पिछले 1-2 वर्षों में कई आई और बॉक्स ऑफिस में सफल हुईं तथा जनता के बीच बहुत अधिक पसंद की गईं। हेराफेरी, मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस., गरम मसाला, मालामाल विकली, भूल भुलैया, आदि इन सब फ़िल्मों ने निर्माताओं को मालामाल कर दिया।

मोबाइल सेवाएँ भी हास्य से भरे एस.एम.एस., भेजकर लोगों का मनोरंजन करने में लगी हुई हैं। दूरदर्शन में आने वाले विज्ञापनों में अधिकांश लोगों को आकर्षित करने के लिए हास्य का सहारा ही ले रही हैं। सामान बेचने वाले जान चुके हैं कि यदि सामान बेचना है तो हँसाना ज़रूरी हैं। लोग हँसते-हँसते कुछ भी कर सकते हैं। मोबाइल में एस.एम.एस. चुटकुलों की भरमार है।

सबसे पहले कॉमेडी की कामयाबी शेखर सुमन ने मूवर्स एंड शेकर्स के ज़रिये पाई। अपनी चटपटी लच्छेदार बातों और हँसी हँसी में बड़े-बड़े व्यक्तित्वों पर व्यंग्य कसकर लोगों को अपना फैन बनाते गए, और वे स्वयं सबसे महंगे सितारे बन गए। चैनल के किसी अधिकारी से अनबन के कारण जब यह कार्यक्रम बंद हुआ तो अन्य चैनल जो न जाने कब से उन्हें हथियाने को ललचा रहे थे खुश होकर 'सिंपली शेखर' और कैरी ऑन शेखर के रूप में प्रोग्राम चलाने लगे।

'स्टान वन' चैनल के द्वारा जब से प्रेरित होकर ''ग्रेट इंडियन लॉफ्टर चैलेंज शो'' प्रारम्भ किया। इस कार्यक्रम ने टी.वी. चैनलों की दिशा ही बदल दी साथ ही कलाकारों की किस्मत बदल दी। इसमें भाग लेने वाले कलाकारों का पारिश्रमिक 100 भुना, अधिक हो गया। ये कलाकार अब स्टार वन चुके हैं। दर्शक ऑटोग्रॉफ-फोटोग्रॉफ लेने उनके पास जाते हैं। अनेकों विज्ञापनों में उन्हें काम मिल गया हैं। ये सारे कलाकार करोड़पति बन चुके हैं। अनेकों चैनलों में 'जस्ट लॉफ बाकी माफ' इंडिया टी.वी. पर सहारा पर फिरंगी फ़िल्मी दूरदर्शन पर ''सुपर हिट मुकाबला'' ''हँसोंगे तो फंसोगे'' आदि कार्यक्रम आसानी से अपना सिक्का जमवा रहे हैं। रेडियो एफ.एम. आदि भी हँसी के कार्यक्रमों को लेकर आ रहे हैं। हँसाने वाले कार्यक्रम और इन कलाकारों की कामयाबी का हाल यह है कि न्यूज़ चैनलों को जो सिर्फ़ न्यूज़ देने का कार्य करते हैं वे भी अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए हर थोड़ी देर में एक हास्य कार्यक्रम का सहारा लेने लगे हैं। हास्य कवियों का पारिश्रमिक अब बहुत अधिक हो गया है। पहले हँसने हँसाने वाले कार्यक्रम गिने चुने होते थे तथा कलाकार भी गिने चुने होते थे, परन्तु अब हास्य कार्यक्रमों और कलाकारों की भरमार हो गई है।

हालाँकि हँसाना भी कोई आसान काम नहीं है। अच्छी कॉमेडी लिखना उसे अच्छे ढंग से प्रस्तुत करना तथा इन प्रस्तुति के लिए अच्छे कलाकारों को ढूँढ़ना आसान काम नहीं है, परन्तु आज सभी चैनलों में इन कलाकारों की भीड़ देखते हुए यही लगता है कि बाज़ारवाद के दौर में बाज़ार की मांग सबकुछ करवा सकती है। व्यक्ति को जो कुछ चाहिए सब कुछ बाज़ार ने तैयार कर रखा है। जो आपको चाहिए, सब कुछ मिलेगा। आख़िर ये युग उपभोक्ताओं का युग है।हास्य की नई प्रतिभायें एक के बाद एक आती जा रही हैं।

चूंकि कॉमेडी शो में कोई कहानी या घटनाक्रम नहीं होता है, इसलिए दर्शक कहीं से भी इसे देखना शुरू कर सकता है। आम आदमी दिन भर की व्यस्तता, थकान और संघर्ष के बाद जब विश्राम के क्षणों में जब टी.वी. खोलता है तो इस तरह के हास्य कार्यक्रम उसे ताज़गी के साथ-साथ मनोरंजन भी देते हैं। यही सब कारण हैं कि दर्शक आज इन कार्यक्रमों की तरफ भी आकर्षित होते जा रहे हैं। टेलीविज़न का सारा आर्थिक गणित दर्शकों पर निर्भर करता है जितने ज्यादा दर्शक उतनी टी.आर.पी. और उतनी ही रेवेन्यू। और हास्य शो सभी चैनलों के लिए इस दृष्टि से फायदेमंद हुए है। और लोग भी हँसने-हँसाने और लोटपोट होने के लिए तैयार है।

डॉ. राजश्री रावत ''राज''