306; सुधार के लिए अपनी अनुशंसाएं देती हैं। लेकिन कुल मिलाकर सारी कवायद अनुदान आवंटन, 'पाठयक्रम' में फेर-बदल तक सीमित रह जाती है। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए कोई ठोस कदम सामने नहीं आया है। देश के उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान धीरे-धीरे या तो परीक्षा केन्द्र या फिर वेतन प्राप्त करने में तब्दील होते जा रहे हैं। आज प्रोफेसर का ऊंचा वेतन भले ही समाज और अफसरशाही मेंर् ईष्या का विषय हो, उसकी व्यावसायिक संतुष्टि और सामाजिक सरोकारों के प्रति कोई भी चिंतित नहीं है।

अखिलेश सोलंकी