संस्करण: 17दिसम्बर-2007

दिल्ली में बालाएँ खाना नहीं शराब परोसेंगी

     दुलार बाबू ठाकुर

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में महिलाओं को रेस्तराओं में शराब परोसने की इजाजत दे दी है। इससे पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा ऐसा ही फैसला दिया गया था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। बार में महिलाओं द्वारा पूर्व से ही शराब परोसने का कारोबार होता रहा है। इसकी पुष्टि जेसिका लाल की हत्या से होती है। जेसिका लाल की हत्या महज इसलिए कर दिया गया था क्योंकि अधिक रात होने के कारण उन्होंने शराब परोसने से साफ इनकार कर दिया था। इस कारण कुछेक शराबी लोगों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी और एक सुंदर दिखने वाली जेसिका के लिए वह रात शराब परोसने की अंतिम रात साबित हुई।

इस घटना ने दिल्ली सहित संपूर्ण देश के दिल को झकझोरा। इसकी गुंज संसद में लगातार कई वर्र्षों तक सुनाई देता रहा। इस मामले को मीडिया ने जोर-शोर से उठाया था, जिसकी सराहना भी काफी हुई थी। जो भी हो, शराब तो आखिर शराब है जिसकी लत का समर्थन भारतीय समाज में नहीं किया जा सकता। दिल्ली भारत की राजधानी है और अनेक मामलों में परिपूर्ण है। इसलिए दिल्ली को दिलवालों का शहर कहा जाता है, साथ ही यह काफी आधुनिक है। बड़ी-बड़ी इमारतों के निकट से चिकनी चौड़ी सड़कों पर सरपट दौड़ती हुई चमचमाती आधुनिक गाड़ियों को देखकर एक आम ग्रामीण भारतीय की आंखे चौंधिया जाए तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। दिल्ली की आधुनिकता में चार चांद लगाती तिभिन्न कंपनियों की प्रचारयुक्त पोस्टरें, जिसमें अर्ध्दनग्न अप्सराएं अनंत पोज में करतव दिखाकर दिल्ली को पश्चिमी शहरों के एकदम निकट लाकर रख दी है। जब शहर की बनावट और आबोहवा एकदम से बदल गयी हो तो भला वहां जीवन बसर करने वाले जीव भला अपने को पुराने ढर्रे में रहने में संकोच क्यों ना करे? इसलिए दिल्ली की वह हर चीज बदल रही है जो पुरानी है। इस बदलाव के हवन में चाहे कितने घर उजड़ जाए या नष्ट हो जाए इसकी चिन्ता फिलहाल भारतीय समाज के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। तभी तो दिल्ली 2020 जैसे प्रोजेक्ट दिल्ली को सुंदर बनाएं जाने के नाम पर बनाएं जाते है और हजारों परिवारों को बेघर करके अंधाकार के आंसू रूलाए जाते है।

दिल्ली को आधुनिक बनाने में महिलाओं का हाथ अधिक माना जा सकता है। विविधा तरह के और विभिन्न रुप में फैशन वीक का आयोजन और उसमें चहलकदमी करती हुई आधुनिक मॉडलों ने दिल्ली को सचमुच में आम भारतीयों से बहुत दूर खींच लिया है। इतना ही नहीं, वर्तमान में यहां लड़कियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्त्र से यह अनुमान लगाना कठीन हो गया है कि दिल्ली भारत की राजधानी है या किसी पश्चिमी देश की। इसलिए दिल्ली में विविधा तरह के अपराधा में भी काफी वृध्दि हुई है। शहर जितना आधुनिक होता जा रहा है अपराधा उतनी तेजी से फैल रही है। आधुनिक दिल्ली महिलाओं के लिए पूर्व से ही असुरक्षित मानी जाती रही है। कभी हौज खास जैसे रिहायशी इलाके में, कभी दौड़ती हुई कार में हुई वालात्कार की घटना से यहां की स्थिति जगजाहिर है। वर्तमान में दिल्ली में जो भी बदलाव हो रहे है उसके पीछे पूंजीवाद का अर्थशास्त्र काम कर रहा है। यह पूंजीवाद इतना संवेदनहीन हो चुका है कि इसके लिए समाज का कोई भी सिध्दांत रुपए पैसे से बढ़कर नहीं है। इसलिए हर वह कार्य किए जा रहे है जिससे पूंजीवाद का विस्तार होता है। जब पूरे भारत में पूंजीवाद का प्रभाव सिर चढ़कर बोल रहा है तो भला दिल्ली तो भारत की राजधानी है। जहां हर पश्चिमी संस्कृति सर्वप्रथम प्रवेश करती है।

देश के विकास के लिए आर्थिक स्थिति का मजबूत होना आवश्यक होता है। आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए अर्थशास्त्र अनेक सिध्दांतो और नियमों को प्रतिपादित करता है तथा विविधा वस्तुओं का उत्पादन करता है। इस सिलसिले में अर्थशास्त्र के लिए शराब अधिक महत्वपूर्ण उत्पाद है जिससे सरकार को करोड़ों में राजस्व की प्राप्ती होती है। अर्थशास्त्र राजकीय मद्यशालाओं एवं आसवगृहों में सुरा के निमार्ण का परामर्र्श देता है और अनेक विधियों का उल्लेख करता है, जैसे- तंदुलों से बनायी हुई सुरा, अन्य चूर्ण से बनायी सुरा जो एक प्रकार की मसालेदार बीयर होती है, जंगली सेव की सुरा, मौरेय-कच्ची शक्कर, पीपल तथा मेश-श्रृंग वृक्ष की छाल से वनायी सुरा तथा आम्रमदिरा 'सहकार सुरा' एवं महुआ से वनायी शराब आदि। यह प्रक्रिया प्राचीन काल से चलती आ रही है जैसा कि उतर-पश्चिम में अंगूरों से मंदिरा बनायी जाती थी और शेष भारत को इसका निर्यात किया जाता था। दक्षिण में ताड़ी-ताड़ या नारियल के वृक्षों का उफना हुआ रस, प्रधान मद्यपेय था इसका प्रारम्भिक तमिल साहित्य में निरंतर उल्लेख मिलता है।

अर्थशास्त्र संभवतया मौर्यकालीन अवस्थाओं को प्रतिबिम्बित करते हुए निरीक्षक की नियुक्ति का सुझाव देता है। केवल इसलिए नहीं कि मादक पेयो के विक्रय और उपयोग का वह नियंत्रण करें। बल्कि इसलिए की वह उनके निमाण्र का सुसंगठन करे। सार्वजनिक मुशाला चलाने वालों को अर्थशास्त्र आदेश देता है कि वे अपने प्रतिष्ठानों को सुस्सजित एवं सुविधाजनक बनाएं। इससे स्पश्ट होता है कि किस तरह से अर्थशास्त्र शराब को महत्व देता आ रहा है। वर्तमान में तो यह अधिक ही प्रभावित हो रहा है। हर जगह शराब की पार्टी होती है। सूर्य ढ़लते ही ऐसा प्रतीत होता है जैसे संपूर्ण दिल्ली की शाम हसीन और रंगीन हो गयी है।

ऐसी स्थिति में मात्र 21 वर्ष की लड़की के हाथ में शराब की बोतल लिए बार में खड़ा देखकर किसी भी शराबी की नशा चौगुनी हो सकती है और वह कुछ भी कर सकता है। इन साकियों के साथ बुरा बर्ताव हो सकता है, यौन हिंसा हो सकता है। बात नहीं बनता देख जेसिका लाल की तहर हमेशा के लिए मौत की नींद सुलाया जा सकता है। इससे दिल्ली में अनेक जेसिका लाल को पैदा होने से रोका नहीं जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह तर्क सही है कि महिलाओं द्वारा शराब परोसने पर रोक असंवैधानिक व मूलभूत अधिकारों का हनन है। अदालत के अनुसार यह संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुरुप है जिसके तहत धार्म, जाति एवं लिंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। परन्तु सवाल उठता है अनुच्छेद 15 में छिपे उद्देश्य का? साथ ही महिलाओं द्वारा शराब परोसने से क्या इस अधिकार का हनन नहीं होगा? सीधा सा जवाब है बालाओं द्वारा शराब परोसे जाने से उसके मौलिक अधिाकारों का हनन अधिक होगा। क्योंकि लिंग के आधार पर भेदभाव के कारण ही तो उसे षराब परोसने की नौकरी मिलेगी। हर रेस्तरां मालिक चाहेगा हमारे यहां अधिक भीड़ जुटे, जिसके लिए मात्र 21 वर्ष की लड़कियों को सजा संवार कर हाथ में शराब की बोतल लिए बार में खड़ा कर दिया जाएगा। पहला लिंग भेद तो यही झलकता है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र सरकार ने बार में महिलाओं के नृत्य पर पाबंदी लगा दी है और लगभग 75,000 हजार बार बालाओं को इस दलदल से बाहर निकाला गया है। ये महिलाए बार में शराब परोसने के कार्य में पुन: कदम रखने को उत्सुक हो सकती है। यह एक सभ्य समाज के लिए सही नहीं कहा जा सकता है। बार बालाओं की उम्र सीमा 25 से घटाकर 21 वर्ष किया जाना भी सही नहीं प्रतीत होता है क्योंकि अरब देशों में लगभग डेढ़ लाख भारतीय महिलाएं घरेलु नौकरानी के रुप में कार्य कर रही है। इनकी उम्र सीमा न्यूनतम 30 वर्श है फिर भी उत्पीड़न की घटनाएं काफी हो रही है। उत्पीड़न की घटनाओं में वृध्दि के कारण ही केन्द्र सरकार ने उम्र सीमा 30 साल तय किया है। एक तरफ महिलाओं को नौकरानी के रुप में काम करने के लिए उम्र सीमा 30 साल इसलिए तय किया जाता है ताकि अनैतिक घटनाएं कम हो। वही बार में शराब परोसने के लिए उम्र सीमा को 21 वर्ष किया जाना तर्क संगत प्रतीत नहीं होता है। शराब परोसने के लिए यह फैसला सिर्फ दिल्ली के लिए किया गया है। परन्तु इसकी क्या गारंटी की देश के अन्य महानगरों में यह संस्कृति पांव नहीं फैलाएगी? जो भी हो, दिल्ली में बालाएं अपने अभिभावकों को खाना परोसने में भले ही लिंग भेद किए जाने का आरोप लगाए। परन्तु गैर मर्दों को षराब परोसने के लिए वह बिलकुल स्वतंत्र हैं। घर में खाना परोसने से प्यार मिलता है लेकिन रेस्तरां में शराब परोसने से पैसा मिलेगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि पूंजीवाद पैसा को कितना अधिाक महत्व देता है। आखिर भारत भी तो पूंजीवाद की गिरत में आ चुका है। इसलिए दिल्ली में लड़कियां खाना नहीं शराब परोसेंगी।

दुलार बाबू ठाकुर