संस्करण: 17दिसम्बर-2007

आडवाणी के प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोशित होने से जिन्ना जीते

 वीरेन्द्र जैन

इस बात को अभी बहुत दिन नहीं बीते जब श्री लालकृष्ण आडवाणी को भारतीय जनता पार्टी के अधयक्ष पद से अपमानित कर हटा दिया गया था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  नियंत्रित इस पार्टी में यह फैसला भी संघ के कार्यालय में ही लिया गया था और यदि  फैसला वहां नहीं लिया जाता तो आडवाणीजी विपक्ष के नेता और अधयक्ष दोनों की ही जिम्मेदारियाँ सम्हाल रहे होते क्योंकि इस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को कोई जगह नहीं है। संघ ने यह फैसला उनके पाकिस्तान में जिन्ना की प्रशंसा में दिये गये बयान के कारण लिया था जिसके लिए आडवाणी ने आज तक खेद व्यक्त नहीं किया। गत माह श्री आडवाणी की पत्नी कमला आडवाणी के 75वें  जन्मदिन पर संघ प्रमुख सुदर्शन संघ के कार्यवाहक संचालक मोहन भागवत के साथ उनके घर बधाई देने गये थे और रूकने का बहाना अनूप जलौटा की भजन संधया को सुनना भी था। इस दौरान उन्होंने न केवल राजनीतिक चर्चा ही की अपितु डिनर भी वहीं किया था। गुजरात में वोटिंग प्रारम्भ होने के ठीक एक दिन पहले आडवाणी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री प्रत्याशी बनाये जाने की घोषणा इसी डिनर पार्टी के बाद हुयी है। अब शायद संघ ने जिन्ना के सम्बन्धा में उनके विचारों को स्वीकार कर लिया है। वैसे भी वहाँ बाबरी मस्जिद तोड़ने के आरोपी से मन्दिर का शुभारंभ कराके मुशर्रफ ने उन्हें चुल्लू भर पानी में डूबने को मजबूर कर दिया था, जबकि वे एक घोषित धार्मनिरपेक्ष देश नहीं हैं।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि आडवाणी भाजपा में अटलबिहारी के समकक्ष नेता होते हुये उनसे कई गुना अधिक चतुर रहे हैं। उनके चतुर होने की तीव्रता इतनी अधिक है कि कई बार इसके लिए कुटिल शब्द का प्रयोग भी कर लिया जाता है जिसे राजनीति में बुरा नहीं माना जाता। उनका स्वास्थ अच्छा है व उनकी स्मृति तेज है। वे कुशलतापूर्वक ऐसी बात कर लेते हैं जिसका असुविधा होने पर  बाद में अपनी तरह से दूसरा मतलब भी बताया जा सके। वे आम सभाओं में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह चुटकले सुनाकर मनोरंजन तो नहीं करते पर फिर भी संघ परिवार के प्रभाव वाला श्रोता उन्हें रूचि पूर्वक सुनता है। उन्हें चुनाव लड़ने लड़ाने से लेकर केन्द्र में सूचना प्रसारणमंत्री गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री तक बनने का अवसर मिला है। 1977 में जनसंघ को जनतापार्टी में ऊपरी तौर पर विलीन करके उस पर अधिकार कर लेने की रणनीति उनकी ही थी। बाद में उस कूटनीति के पकड़ लिए जाने व उनकी पार्टी को बाहर कर दिये जाने पर निराशा से घिर गये नेतृत्व ने जब 'गांधीवादी समाजवाद' के नारे से जनता को फुसलाने की असफल कोशिश की थी तब उस निराशा से निकाल कर उसे दुबारा जनसंघ बना देना का कारनामा भी उन्हीं के हिस्से में जाता है। 1985 में जब उनकी पार्टी संसद में केवल दो सदस्यों तक सिमिट गयी थी तब बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि जैसे गैर राजनीतिक विषय को लाकर उत्तर भारत की जनता की आस्था के डंडे में अपनी पार्टी का झंडा लगा देने का खेल भी आडवाणी की ही उपज थी भले ही केन्द्र सरकार में केबिनेट मंत्री रहते हुये उन्होंने कभी याद भी नहीं किया था कि कोई रामजन्मभूमि मन्दिर विवाद भी है। आज भाजपा जैसी पार्टी को जो संसद की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव मिला हुआ है वह संघ के नैटवर्क और आडवाणी की कूटनीति के कारण ही है।

आडवाणी की पात्रता का दूसरा आधार भाजपा में दूसरे बड़े राष्ट्रीय स्तर के नेता का अभाव भी है। पुराने बलराज मधाक जैसे नेता जो जनसंघ के राष्ट्रीय अधयक्ष पद पर आसीन रह चके थे एवं श्री मदनलाल खुराना जिन्होंने आडवाणी जी के संग संग हवाला का आरोप लगने के बाद मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर नैतिकता का प्रदर्शन किया था आज पार्टी से बाहर हैं। जसवंत सिंह को तो उन्हीं की पार्टी की मुख्यमंत्री ने अपने विरोधा के कारण पुलिस केस में फंसा दिया है वैसे भी उन जैसे शालीन व्यक्ति संसद में तो योग्यता दर्शा सकते हैं पर उनके जननेता होने का प्रमाण नहीं मिलता। दूसरी श्रेणी के नेताओं में जो लोग हैं उनमें एक दूसरे के साथ इतना ईर्षा द्वेष है कि एक बार राजनाथसिंह को अधयक्ष के पद पर तो स्वीकार भी कर लें पर प्रधानमंत्री प्रत्याशी के नाम पर तो भाजपा का दो फाड़ होना लगभग तय है जिसके अब तक न होने की शेखी वे कई बार बघार चुके हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आडवाणीजी निर्विकल्प थे और मुरली मनोहर जोशी की महात्वाकांक्षाओं को छोड़ कर उन्हें सीधा चुनौती कहीं से नहीं थी। वे उमाभारती जैसी क्षेत्रीय नेता के सार्वजनिक अपमान से विचलित नहीं होते अपितु गम्भीरतापूर्वक धीरे धारे उन्हें ठिकाने लगा देते हैं।

आडवाणीजी की इतनी क्षमताओं के बाद भी उनके प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित होने की खुशफहमी संघ के आदेश से साकार नहीं हो सकती क्योंकि इसके लिए जरूरी है कि उनकी पार्टी को सरकार बनाने लायक बहुमत मिले। उनके इस पद पर प्रत्याशी होने की घोषणा के समय तक ना तो लोकसभा भंग हुयी थी और ना ही उसका कार्यकाल ही पूरा हुआ था तो फिर ये मुंगेरीलाल के हसीन सपनों का सीरियल क्यों प्रसारित किया गया? क्या इसलिए कि सिन्ध वोटों की अधिकता वाले अहमदाबाद में विधानसभा की वोटिंग होने वाली थी और नरेन्द्र मोदी की अलोकप्रियता व असन्तुष्टों की गतिविधियों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके क्योंकि आडवाणीजी वहीं से चुन कर आते हैं। एक गुजरात से चुना गये सिन्ध प्रत्याशी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने पर चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन भी नहीं होता है। ऐसे मौलिक हथकण्डे ही भाजपा के फेनिल अस्तित्व का सार तत्व हैं।

यह तो तय है कि देश में अब केवल गठबंधान की ही सरकार बनेगी और भाजपा केवल उत्तर भारत की पार्टी है। उत्तर भारत में भी वे उत्तरप्रदेश में अपनी चमक खो चुके हैं व पंजाब और बिहार में वे जूनियर पार्टनर की तरह निचले पायदान पर लटके हुये हैं। छत्तीसगढ और उत्तराखण्ड में वे बेहद क्षीण बहुमत के आधार पर निर्दलियों से सौदा करके सरकार बनाये हुये हैं। उनकी अपनी दम पर उनके पास गुजरात राजस्थान और मधयप्रदेश ही आते हैं। मधयप्रदेश और राजस्थान में उनकी सरकारों की अलोकप्रियता चरम पर है और कांग्रेस की कमजोरी ही उनकी संजीवनी बनी हुयी है । आयातित नेताओं की दम पर कर्नाटक में उनकी उपस्थिति भले ही दिखायी दे रही हो पर सरकार में उनका आना शायद ही पसंद किया जाये। यदि वर्तमान स्थितियों के आधार पर आंकलन किया जाये तो आगामी लोकसभा चुनाव में वे अधिक से अधिक सत्तर से सौ के बीच सीटों पर जीत सकते हैं। तय है कि उन्हें गठबंधान करना होगा, जिसके लिए इस समय उनके पास बेमन से फिर जुड़ गयी शिवसेना, जार्ज को हटा देने की शर्त के साथ जेडी(यू) ,अकालीदल व बीजू जनता दल ही हैं जिनके कुल सांसद भी सरकार नहीं बना सकते। इन दलों में भी आडवाणी के नाम पर कितनी स्वीकृति होती है यह देखना अभी बाकी है। तो क्या आडवाणीजी भैंरों सिंह शेखावत की तरह केवल प्रत्याशी भर बनने की प्रक्रिया में हैं?फिर अभी लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आना शेष है। गत दिनों जब आडवाणी को मुक्त कर बाकी आरोपियों पर प्रकरण दर्ज होने का फैेसला आया था तब मुरली मनोहर जोशी की नाराजी देखने लायक थी।

दूसरा सवाल है कि भाजपा और संघ नेतृत्व जिस नफरत को फैलाकर जीवन पाता है उसको अपने हित में कैसे भी बदल लेता है। गांधा की हत्या के आरोपों से घिरे ये लोग जिन्ना की प्रशंसा करने वाले को प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित करने में क्या कोई शर्म भी महसूस नहीं करते जिसको कुछ ही दिन पहले वे इसी आरोप पर अधयक्ष  पद से हटा चुके थे।

आडवाणीजी को प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित करने से पहले क्या इन्हें अटलजी की उस चिट्ठी के बारे में सफाई नहीं देनी चाहिये थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि मैं स्वस्थ होकर जल्दी आ रहा हॅं तथा जिसमें 'अपनों के विघ्नों ने घेरा' वाला संदेश भी दिया था। या तो उनका बताया जा रहा वह पत्र असली नहीं था और यदि असली था तो क्या उनके स्वस्थ होने तक प्रतीक्षा नहीं करना चाहिये थी जिससे वे स्वयं ही यह फैसला सुनाते? भाजपा का कार्यकर्ता अभी भी अटल जी का आडवाणीजी से अघिक सम्मान करता है और उन्हें ही प्रधानमंत्री पद के लिए प्राथमिकता पर रखता है। वैसे भी कहा जाता रहा है कि आडवाणीजी ने ही उपप्रधानमंत्री बनने के लिए अटलजी के स्वास्थ और आदतों के बारे में अमेरिका के अखबार में समाचार प्रकाशित कराके दबाव बनाया था और उपप्रधानमंत्री पद हथिया लिया था। यही कारण रहा था जब अटलजी अमेरिका से लौट कर आये थे तो उन्होंने वैंकया नायडू के उस बयान पर असंतोष व्यक्त किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि अगला आम चुनाव अटल और आडवाणी दोनों के नेतृत्व में लड़ा जायेगा। एक राज्य सरकार के चुनाव के लिए अपने वरिष्ठ नेता के प्रति असंवेदनशील हो जाना ही क्या भाजपा की संस्कृति है?

वीरेन्द्र जैन