संस्करण: 9 सितम्बर-2013

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बंजारा का इस्तीफा, मोदी-शाह के

गुनाहों का लिखित प्रमाण

       गुजरात के निलंबित डीआईजी डीजी वंजारा ने पूर्व गृह रायमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की पोल खोल दी। यह और बात है कि इस अफसर ने सच्चाई तब उगली जब उसे अहसास हो गया कि नरेंद्र मोदी ने अपना काम निकल जाने पर उसे भुला दिया है। ऐसे अफसर किसी भी तरह से संवेदना के हकदार नहीं हो सकते, क्योंकि उन्होंने जो इस्तीफा लिखा है उसकी इबारत बताती है कि यदि नरेंद्र मोदी ने इस अफसर को बचाने का प्रयास किया होता या बचा लिया होता तो इन्होंने मोदी और अमित शाह के इशारे पर जितनी हत्याएं की गई हैं,किसी का राज नहीं खोलते।    

? विवेकानंद


बंजारा के रहस्योद्धाटन के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार बनाया जाएगा

        क्या अब भी भारतीय जनता पार्टी, और विशेषकर संघ परिवार, ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री का अपना उम्मीदवार घोषित करेगा, जिनके बारे में एक समय उसके सबसे ज्यादा विश्वस्त रहे पुलिस अधिकारी ने यह कहा कि उसकी और उसके नेतृत्व वाली गुजरात सरकार की उचित जगह गांधी नगर में नहीं वरन् साबरमती जेल में है। नरेन्द्र मोदी के बारे में इतनी तीखी टिप्पणी डी.जी. बंजारा ने की है। बंजारा वे खूँखार आई.पी.एस. अधिकारी हैं, जिन्होंने नरेन्द्र मोदी के कहने पर जघन्य से जघन्य अपराध किये थे। बंजारा ने ऐसे अपराध किये हैं,जैसे एक दुर्दान्त अपराधी भी नहीं करेगा।

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एल.एस.हरदेनिया


आशारामदेवों की सरपरस्त पार्टी भाजपा

      जो लोग देश के नागरिकों की आस्थाओं से खिलवाड़ करते हुए अपना धन्धा करते हैं उन्हें भाजपा और संघ परिवार बहुत सुहाता है। वैसे तो धर्म के नाम पर भावनाओं को भुनाने का काम अकाली दल, मुस्लिम लीग शिव सेना और केरल कांग्रेस आदि भी करती है किंतु गलत कामों की खुली वकालत करने और मुँहजोरी करने में भाजपा समेत पूरे संघ परिवार का कोई सानी नहीं। यही कारण है कि धर्म से जुड़ी पुरानी मान्यताओं को सफल धान्धो में बदलने वालों के लिए यह पार्टी सबसे अनुकूल पड़ती है।

 ? वीरेन्द्र जैन


संत की संतई पर लगा सवालिया निशान

      खिरकार स्वयंभू संत आसाराम पुलिस की गिरफ्त में आ ही गए। 11 दिन देश की कानून व्यवस्था को धता बताने वाले आसाराम को इंदौर स्थित उनके आश्रम से जिस बेदर्दी से जोधपुर पुलिस की टीम ने रातों रात उठाया उससे देर-सवेर ही सही मगर यह तथ्य तो पुख्ता हुआ ही है कि कानून की नजर में आम और खास में कोई अंतर नहीं है।

? सिध्दार्थ शंकर गौतम


भाजपा को ले डूबेगी गुटबाजी

         अंतर्कलह का लाभ अपनों को नहीं, बल्कि दुश्मनों को मिलता है, यह कहावत चरितार्थ हो रही है, भाजपा पर। अजा भाजपा जिस अंतर्कलह से गुजर रही है, उसका पूरा लाभ कांग्रेस उठा रही है। इस समय यशवंत सिन्हा और अरुण जेटली के बीच शीतयुध्द चल रहा है। उधर दिल्ली भाजपा की हालत भी अच्छी नहीं है। भाजपा नेताओं के ईगो के कारण होने वाले नुकसान का कांग्रेस पूरा फायदा उठा रही है।  

 ?   डॉ. महेश परिमल


जयराम रमेश, ग्रामीण विकास मंत्री से साक्षात्कार

आर्थिक नीतियों का निर्माण करना कोई 20-20 या एकदिवसीय क्रिकेट मैच नही है : रमेश

           क्या किसानों को बेहतर मूल्य देना बुरा विचार है? या भूमि अधिग्रहण किये जाने से पूर्व ग्राम सभा को अपनी राय प्रकट करने का अधिकार देना गलत है?  भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में जनजातीय समुदायों की राय लेना कैसे गलत हो सकता है? वह कौनसी दुनिया है जिसमें उद्योग चल रहे है ?  

? इकॉनॉमिक टाईम्स से साभार


भू अधिग्रहण बिल

अधिग्रहण के बदले मिलेगा माकूल मुआवजा

      भू अधिग्रहण के मुद्दे को लेकर देश के कोने कोने के गांवों और शहरों में पनप रहे आंदोलनों की श्रृंखलाओं का एक दौर शुरू हो गया था। गांवों में यह समस्या उग्र रूप धारण करती जा रही थी, जहां किसानों के बाप दादा की जमीनों को उद्योगों और विकास योजनाओं के नाम पर सरकारें और उद्योगपति ओने पोने दाम में खरीद रहे थे। अनेक प्रकरण तो ऐसे भी सामने आये जिनमें किसी गरीब और असहाय किसान की पृष्ठभूमि पर जबरिया कब्जा कर उसपर बाहुबलियों पर अधिकार जमा लिया जाता रहा है। बेचारे किसान वाजिब मुआवजे की मांग करते तो उनकी आवाजें दबा दी जाती रहे। 

?  राजेन्द्र जोशी


महिलाओं की सेवा शर्तों में

बदलाव जरुरी

      रेलू जिम्मेदारियों के कारण महिलाओं द्वारा नौकरी या रोजगार छोड़ देना एक आम बात है लेकिन हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है कि इसे बहुत गम्भीरता से नहीं लिया जाता, मानो ऐसा होना स्वाभाविक ही हो। सामान्य के अलावा योग्य और प्रतिभावान महिलाओं को भी ऐसा करना पड़ता है और इस प्रकार संस्थान योग्य कार्यकर्ताओं से वंचित हो जाते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ कई करोड़ परिवार अपनी महिला सदस्य की कमाई से ही चलते हैं, ऐसा होने पर भुखमरी के कगार पर आ जाते हैं और वहाँ बिखराव शुरु हो जाता है। सुखद है कि संसद की एक स्थाई समिति ने गत दिनों एक बहुप्रतीक्षित रपट पेश कर इन परिस्थितियों को सुधारने हेतु कानून बनाने और संशोधित किये जाने की मॉग की है।

 

? सुनील अमर


भोजन का अधिकार: गरीबी हटाने का औजार

        विकास का केन्द्रीय लक्ष्य होता है गरीबी दूर करना। और समता मूलक वृद्वि के रास्ते में गरीबी को अनेक विधि से दूर किया जा सकता है। एक का लोककल्याणकारी राज्य का भी लक्ष्य होता है कि राज्य में समता मूलक वृद्वि हो जिसका एक मायना यह भी होता है कि गरीबी दूर करे। लोककल्याणकारी राज्य होने की इस महत्तवपूर्ण शर्त को केन्द्र की यूपीए सरकार ने देश के नागरिकों को भोजन का अधिकार देकर पूरा किया है। वास्तव में देश की आजादी के बाद यह ऐतिहासिक क्षण है जब देश की दो तिहाई आबादी को भूख से मुक्ति का अस्त्र मिला है। जिससे गरीबी का अभिशाप सदा सदा के लिए मिटना तय है।  

? डॉ. सुनील शर्मा


मुद्दा कामकाजी बनने का

       सार्वजनिक दायरे में नौकरीपेशा/रोजगारशुदा होना अब किसी न किसी रूप में समाज में महत्वपूर्ण मुद्दा बनने लगा है, चाहे वह महिलाओं की भागीदारी का मुद्दा हो, कार्यस्थलों पर उनकी सुरक्षा का मसला हो या काम तथा वेतन में भेदभाव का मसला हो या उनके लिए परम्परागत रूप से अघोषित तौर पर प्रतिबन्धित क्षेत्र में प्रवेश द्वार खोलने का मसला हो। कानून सरकार समाज और परिवार में धारणाएं बदल रही हैं और आनेवाले वर्षों में और बदलाव के संकेत हैं।     

 

? अंजलि सिन्हा


अधिग्रहण की भूमि

        भूमि अधिग्रहण पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन विधेयक को पारित कराकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने ऐतिहासिक काम किया है। 1894 में अंग्रेजी हुकूमत ने औपनिवेशिक विस्तार और किसानों को लाचार बना देने की दृष्टि से इस कानून को बनाया था। एक आजाद देश के लिए यह शर्मनाक स्थिति थी कि गुलामी के इस कानून को वह 66 साल तक ढोती रही। इस कानून को धरातल पर लाने के लिए जहां सोनिया गांधी बधाई की पात्र हैं,वहीं ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की भी पीठ थपथपाने की जरूरत है,क्योंकि उन्हीं के बूते एक ऐसा कानून चलन में आ रहा है,जिसमें परस्पर विरोधी हितों के बीच उचित तालमेल बिठाने की कोश्शि की गई है।  

? प्रमोद भार्गव


14 सितम्बर : हिन्दी दिवस पर विशेष

निज भाषा उन्नति अहै,

सब उन्नति कौ मूल....

       ज़ादी के 66 वर्ष बाद भी यदि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है तो इसका कारण भारतीयों की गुलाम मानसिकता और उदासीनता ही है। हमने हिन्दी के माध्यम से ही लड़कर देश की आज़ादी हासिल की, गोरे, अंग्रेजों को यहां से खदेड़ दिया। मगर हमारे देश में अब काले अंग्रेजों का शासन है, जो हिन्दी का अस्तित्व ही मिटा देने को आतुर है। आजादी की लड़ाई के दिनों में जो हिन्दी भारत की अस्मिता और राष्ट्रीयता का प्रतीक बन गई थी, आज वह इतनी उपेक्षित है कि उसे पिछड़ी हुई और असमर्थ भाषा मानकर उसपर जबरन अंग्रेजी का मुलम्मा चढ़ाकर ग्लोबल बनाने का अनुचित प्रयास किया जा रहा है।    

 

? डॉ. गीता गुप्त


  9 सितम्बर-2013

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