संस्करण: जुलाई-2012

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''विपक्ष का यह आरोप क्यों गलत है कि

प्रणब मुखर्जी एक खराब वित्त मंत्री थे।''

           ब प्रणब मुखर्जी सक्रिय राजनीति से अवकाश ले चुके है और भारत के सर्वोच्च गरिमामय राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी है। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी जो अपनी अपनी ओर से कोई प्रत्याशी राष्ट्रपति पद के लिये खड़ा नही कर सकी, उसने अब प्रणब मुखर्जी को इतिहास का अब तक का सबसे खराब वित्त मंत्री बताना शुरू कर दिया है।

  ? अभीक बर्मन


हिन्दुत्व

        राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) अब बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के विरूध्द उनके इस बयान पर पूरी ताकत से खुलकर सामने आ गया है जिसमें उन्होने कहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति ही एन.डी.ए. काप्रधानमंत्री होना चाहिये जो समाज के सभी वर्गों को अपने साथ लेकर चल सके।

? दिग्विजय सिंह

(लेखक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव एवं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री है।)


भारी मतों से प्रणब की जीत निश्चित

कांग्रेस को खलेगी संकट मोचक की कमी   

    समें कोई शक नहीं कि देश के अगले राष्ट्रपति अब प्रणब मुखर्जी ही होंगे। उनके रास्ते में आने वाले सारे व्यवधान हट गए हैं और मिल रहे संकेत शुभ और साफ हैं। उनके विरोधी भी उनके समर्थक बन गए हैं। प्रणब बाबू की राजनैतिक यात्रा पश्चिम बंगाल के एक सुदूर गांव से शुरू हुई और उन्होंने सरकार में दूसरे स्थान पर अपनी जगह बना ली। वे सरकार के मुख्य संकट मोचक की भूमिका भी निभाते रहे।

? हरिहर स्वरूप


झूठ के पांव नहीं होते....

          कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी देश की शायद इकलौती ऐसी महिला नेता होंगीं जिन पर कुलीनों का कुनबा होने का दावा करने वालों ने न केवल उन्हें नीचा दिखाने के लिए साजिश के तहत झूठे राजनीतिक आरोप मढ़े बल्कि उनके चरित्र पर भी उंगली उठाईं। स्वयं को हिंदू संस्कृति के ध्वजवाहक और स्त्रियों के सम्मान का रक्षक बताने वालों ने राजनीतिक विरोध के इतर व्यक्तिगत स्तर पर हीन भावना का परिचय कई बार दिया,लेकिन सोनिया गांधी ने प्रतिकार स्वरूप न तो कभी अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और न ही यह अहसास होने दिया कि वे देश की सबसे ताकतवर महिला हैं। उन्होंने सदैव जनता के सामने शालीनता के परिचय दिया।

? विवेकानंद


मप्र में प्रशासनिक असंतोष

         रक्षित वर्ग के बड़े अधिकारियों में सरकार के प्रति पनप रहा असंतोष अब मुखर होने लगा है। आईएएस रमेश थेटे और श्रीमती शशि कर्णावत की सरकार को खुलेआम ललकार के बाद इस वर्ग के दर्जनों नौकरशाह गुपचुप लामबंद होकर 'आरक्षण बचाओ संघर्ष मोर्चा'को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं। हैरत की बात यह है कि भावी जंग के ये सभी जांबाज सूत्रधार प्रशासनिक मुख्यायल 'वल्लभ भवन' में बैठकर ही अपनी रणनीति को आकार देने में लगे हुए हैं। दिल्ली में पदस्थ मप्र कैडर के एक वरिष्ठ आईएएस द्वारा इन असंतुष्ट नौकरशाहों को भरपूर मार्गदर्शन देकर शिवराज सरकार के खिलाफ उकसाने के प्रयास भी जारी हैं,

 ? महेश बाग़ी


सत्ता की खातिर

कदम-कदम पर दबंगों के आगे झुक रहा है भाजपा नेतृत्व

                  कुछ समय पहले तक भारतीय जनता पार्टी को ''पार्टी विथ ए डिफरेन्स'' कहा जाता था परंतु अब यह पार्टी ऐसा होने का दावा नहीं कर सकती। अब भाजपा एक ऐसी पार्टी हो गई है,जिसे ब्लैकमेलिंग के सामने नतमस्तक होने में जरा भी संकोच नहीं होता है। हाँ एक शर्त अवश्य है कि ब्लैकमेलिंग करने वाला व्यक्ति या समूह ताकतवर, लगभग दंबग अवश्य होना चाहिए। वैसे तो पूर्व में अनेक अवसरों पर भाजपा में अपनी पार्टी के छोटे-मोटे ब्लैकमेलरों को साष्टांग दंडवत किया है परंतु हाल के दो ऐसे उदाहरण हैं जो उसके बदले स्वरूप और चरित्र को पुन: उजागर करते हैं। इनमें से एक उदाहरण गुजरात का है और दूसरा कर्नाटक का।

? एल.एस.हरदेनिया


नाम न बदलिए,

नया संस्थान बनाइये

      त्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी की सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी की सरकार द्वारा स्थापित मान्यवर कांशीराम जी उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय लखनऊ का नाम बदलकर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के नाम पर करने का फैसला किया है। इस प्रकार यह उच्च शैक्षणिक संस्थान, अपनी स्थापना के बाद से अभी तक लगभग हर साल नाम बदलने के लिए जाना जाएगा। देश में इस तरह की दर्जनों घटनाऐं हैं जब पहले से स्थापित संस्थाओं व जनपदों का नाम बदला गया है। खासकर उत्तर प्रदेश तो इस मामले में कुख्यात ही रहा है जहॉ संस्थाओं या जनपदों का नाम राजनीतिक दलों की लिप्सा के चलते कई-कई बार बदला गया है और कई मामलों में तो अदालतों को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है।

? सुनील अमर


कलाम सा. कि किताब 'टर्निंग पाइंट'

एन.डी.ए. की बढ़ी तिलमिलाहट

      भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साहब ने अपनी आटोबॉयग्राफी 'टर्निंग पाइंट' क्या लिख दी, एन.डी.ए. के घटक दलों के कुछ मुखिया तो आपे के बाहर हो गये। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि आठ साल गुजरने के बाद राख के ढेर में दबे अंगारे इस रूप में भड़क उठेंगे जिससे देश के सामने फैलाये गये भ्रम का पर्दाफाश हो जायगा और प्रधानमंत्री की पदस्थापना से जुड़ी अटकलों के अभी तक चल रहे चर्चों को नया मोड़ मिल जायगा। एन.डी.ए. के घटक दलों की सियासत इस झूठ पर परवान चढ़ती रही कि तत्कालीन राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम ने ही यू.पी.ए. की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोका था।

? राजेन्द्र जोशी


नर्मदा : सूखती और प्रदूषित नदी की धारा

        ज सभी विकासशील देशों में पेयजल का संकट गहरा रहा है। जहां तक भारत का प्रश्न है नदियों, झीलों, तालाबों और कुओं से हमें जो जल मिलता है, उसका 70 प्रतिशत प्रदूषित होता है। कभी जीवनदायिनी रहीं हमारी पवित्र नदियां आज कूड़ा घर बन जाने से दम तोड़ रहीं हैं। गंगा,यमुना,नर्मदा आदि नदियों के सामने खुद का अस्तित्व बरकरार रखने की चिंता उत्पन्न हो गई है। बालू के नाम पर नदियों के तट पर कब्ज़ा करके बैठे माफियाओं एवं उद्योगों ने नदियों की सुरम्यता को अशांत कर दिया है।

? राखी रघुवंशी


म.प्र.में उच्च शिक्षा के

निजीकरण की साजिश?

       म.प्र. के महाविद्यालयीन छात्र अपने कालेज में प्रवेश के साथ ही अंक गणित और क,ख,ग सीखेगें? और यह कार्यक्रम सिर्फ छह दिनों में निपट जाएगा इसके लिए उच्च शिक्षा विभाग ने चार जुलाई से दस जुलाई तक का समय निर्धारित किया है और एक दिन पहले प्राचार्यों को चिट्ठी लिखकर इसकी व्यवस्था करने का निर्देश दिया है। चिट्ठी में लिखा है कि अगर कालेज में शिक्षक नहीं है तो स्कूली शिक्षकों को बुला लो,इंजीनियर और डाक्टरों को बुला कर पढ़ाई करवा दो?शायद ये सभी फुर्सत में बैठे हैं इसलिए प्राचार्य महोदय की चिट्ठी पर दौड़े चले आएॅगे?और छात्रों को व्यवहारिक ज्ञान में दक्ष बना देगें? च

    

? डॉ. सुनील शर्मा


युवाओं का जीवन से असमय पलायन क्यों ?

     जीवन को संघर्ष मानकर साहसी योध्दा की तरह जीने की अपेक्षा कायरों की भांति मौत को गले लगाने वाले युवाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है। यह हमारे समाज और सरकार के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। अब अख़बार की सुर्खियां बनी आत्महत्या की ख़बरें हमें नहीं चौकातीं। 'युवा चिकित्सक ने फांसी लगायी,''सागर पुलिस अकादमी से प्रशिक्षु डी. एस. पी. ने की आत्महत्या या युवा इंजीनियर ने रेल से कूदकर जान दे दी- जैसी ख़बरें यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि आख़िर पढ़े लिखे युवा जीवन से असंतुष्ट क्यों हैं ? और असंतोष का जो भी कारण है, क्या उसे दूर नहीं किया जा सकता ?

? डॉ. गीता गुप्त


संदर्भ : महिला जन प्रतिनिधियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम

महिला सशक्तिकरण की दिशा में सरकार का एक कदम

    मारे देश में संविधान के 73वें संशोधन के बाद ग्राम पंचायतों में जब महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण मिला तो लगा कि अब तक हाशिए पर रहीं महिलाएं, जल्द ही पुरुषों के बराबर खड़ी होंगी। सत्ता में भागीदारी से उनका सशक्तिकरण बढ़ेगा। शुरूआत में ऐसा हुआ भी। देश भर की पंचायतों में लगभग 1लाख 63हजार महिलाओं का विभिन्न पदों पर और 10हजार महिलाओं का सरपंच के पद पर चुना जाना,सचमुच एक ऐतिहासिक घटना थी। समाज की मानो जैसे पूरी फिजा ही बदल गई। एक पुरुष प्रधान समाज में इतना बड़ा बदलाव किसी क्रांति से कम नहीं था।

? जाहिद खान


  09जुलाई2012

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