संस्करण: 9 जनवरी- 2012

म.प्र. गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम-

जिसमें नया कुछ नहीं 

? डॉ. सुनील शर्मा

                म.प्र. गौवंश वध प्रतिषेध(संशोधन) अधिनियम 2010 पर महामहिम की मुहर को प्रदेश की बीजेपी सरकार अपनी गौरक्षा नीति की जीत के रूप में प्रचारित कर रही है। लेकिन केवल इस अधिनियम के लागू होने से प्रदेश में लगातार बढ़ रहे अवैध गौवंश परिवहन के थमने की संभावना नजर नहीं आती है। क्योंकि इस अधिनियम में गौवंश के वधा और अवैध परिवहन मेंसिवाए सजा बढ़ाने के अतिरिक्त नया कुछ भी नहीं है। लगभग सारे प्रावधानों में यदि,परन्तु की गुजांइश बॉकीं है। जिससे आरोपियों को राहत के रास्ते खुलेंगें। जैसे कि धारा-2,(ङ,ख)में उल्लेखित परिवाहक अर्थात परिवहन में शामिल वाहन स्वामी या उसका सहायक इस यदि का फायदा उठाने से नहीं चूॅकेगें कि वो इस बात से अंजान थे। धारा-5में कृषि या डेयरी प्रयोजन हेतु परिवहन के लिए अनुज्ञापत्र की बात कही गई है तो इस संबंध में प्रदेश में वर्ष 1995से 2004तक कार्यरत रहे गौसेवा आयोग के समय भी पशुपालन विभाग द्वारा अनुविभागीय अधिकारी की अनुमति को अनिवार्य किया था तथा पशु व्यवसाईयों के लिए पहचान पत्र की अनिवार्यता की थी। इस अधिनियम की धारा-11में सक्षम प्राधिकारी को स्पष्ट नहीं किया गया है एवं हेड कांस्टेबल से अनिम्न श्रेणी के पुलिस अधिकारी को जॉच या वाहन रोकने का अधिकार दिया है, जबकि  वर्ष 1995 में गठित म.प्र. गौसेवा आयोग द्वारा यह अधिकार मानद पशुकल्याण अधिकारी के तौर पर नियुक्त गौरक्षा कार्य में लगे सामान्य नागरिकों भी दिया था। जिसका सुपरिणाम उस समयगौवंश के अवैध परिवहन गिरावट के रूप में परिलक्षित हुआ था। लेकिन अपनी लकीर लम्बी की होड़ में 2003 में बनी बीजेपी सरकार ने उक्त व्यवस्था को खत्म कर गौवंश का अवैध परिवहन रोकने में आम आदमी की भूमिका लगभग समाप्त कर दिया था। इसके बाद से प्रदेश से होकर एवं प्रदेश से महाराष्ट्र, पं बंगाल और बॉग्लादेश तक गौवंश का परिवहन अबाध रूप से जारी है। गौवंश का पैदल परिवहन ग्रामीण व जंगली रास्तों से लगातार हो रहा है।सड़क मार्ग से अवैध गौवंश के परिवहन के लिए ट्रकों के साथ साथ अब हल्के चार पहिया वाहनों का भी धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है। इन वाहनों में गौवंश को बड़ी क्रूरता से अनाज के बोंरो के जैसी छल्ली लगाकर भर दिया जाता है। नागपुर की ओर जाने वाले चार पहिया वाहनों में दर्जन भर गायों को ढोकर ले जाना आम बात है।

               अभी म.प्र. गौवंश वध प्रतिषेध (संशोधन) अधिनियम 2010 खबरों में है लेकिन इसी बीच इच्छापुर-इंदौर राजमार्ग पर गौवंश से भरे ट्रक के पकड़े जाने की खबर भी मिली है जिसमें 40 पशुओं को ठूॅस-ठूॅस कर भरा गया था। जॉच मे 12 पशु मृत मिलें है जबकि दर्जन भर बुरी तरह बीमार थे। जहॉ पशु परिवहन के नियमों की बात है तो केन्द्र सरकार द्वारा पशु क्रूरता अधिनियम 1960 में संशोधन कर बनाए गए नियमों में काफी अच्छे प्रावधान है जिनका पालन अवैध पशु परिवहन रोकने में सहायक होता लेकिन इन्हे लागू कराने में राज्य सरकार रूचि प्रदर्शित नहीं करती है।वैसे ही पशु कुरूता अधिनियम के तहत बनाए गए पशु वधशाला नियमों का क्रियांवयनभी अवैध पशु परिवहन तथा गौवंश का वध रोकने में काफी सहायक साबित  हो सकता है। लेकिन इनका न तो प्रचार प्रसार किया गया है और न ही पुलिस के कर्मचारी जानते हैं, अधिकांश अधिाकारी भी इनसे अनभिज्ञ है।

               अभी म.प्र. गौवंश वध प्रतिषेध(संशोधन) अधिनियम 2010 की वाहवाही के बीच प्रदेश सरकार को प्रदेश में चल रही गौशालाओं की बदहाली पर भी गौर करना चाहिए। प्रदेश में चल रही गौशालाएॅ अर्थाभाव से जूझ रहीं है। सरकारी अनुदान में राजनैतिक दखलदांजी चरम पर है,जिला गौपालन समितियों में गौसेवी व्यक्तियों की जगह सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता बैठें हैं। गौशाला संचालकों को समय पर अनुदान नहीं दिया जाता है। प्रदेश में अवैध परिवहन से छुड़ाए गए गौवंश को गौशालाओं को सौंपा जाता है मगर इसके लिए तत्काल कोई राहत राशि नहीं दी जाती है, ऐसी स्थिति में गौशाला संचालक इनका भरण पोषण कैसे करें यह प्रश्न चिन्ह है।

               वास्तव में प्रदेश और देश से गौवध रूकना चाहिए ऐसी मंशा देश के लगभग हर नागरिक की है क्योंकि गौवंश का धार्मिक से अधिक आर्थिक महत्तव है। गौवंश जहॉ दूध से पोषकता और रोजगार देता वहीं देश का उर्जा घर भी है। अभी खबर मिली है कि देश की राजधानी नई दिल्ली में सीएनजी से चलने वाली बसों को बायोगैस से चलाया जाने पर विचार चल रहा है। जो कि गौवंश की उपयोगिता को और बढ़ाएगा।ऐसी अनेक उपयोगी संभावनाओं के बीच सरकार गौवंश रक्षा की राजनीति के स्थान पर इसकी उपयोगिता की महत्तवता को प्रतिपादित करने के कार्य करे। गाय के नाम पर सम्मेलनों के राजनैतिक जलसों की जगह आम नागरिकों और पुलिस के छोटे कर्मचारियों कों इनसे संबंधित कानूनों के क्रियान्वयन हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन एक अच्छा कार्य हो सकता है।


? डॉ. सुनील शर्मा