संस्करण: 9 जनवरी- 2012

माफी मांगने वाले पा रहे हैं

मीसाबंदी पेंशन

 

? एल.एस.हरदेनिया

               मध्यप्रदेश की भाजपाई सरकार ने मीसाबंदियों को 15 हजार रूपये महीने की पेन्शन देने का फैसला किया। वैसे मीसाबंदियों को पेन्शन देने का फैसला पहले हो चुका था परंतु अभी हाल में पेन्शन की रकम में बढ़ौत्री कर उसे 15 हजार रू. महीने कर दिया है।  मीसाबंदियों की पेन्शन को लेकर शोरगुल न मचे इसलिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पेन्शन में बढ़ौत्री का निर्णय पहले लिया गया। मीसाबंदियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो के बराबर पेन्शन देने के निर्णय की तीव्र आलोचना हो रही है। बहस न सिर्फ पेन्शन की रकम को लेकर छिड़ी है वरन् बहस का मुख्य मुद्दा यह भी है कि क्या मीसाबंदियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तरह हीरो माना जा सकता है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने एक विदेशी सत्ता के विरूध्द संघर्ष किया था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का मुख्य उद्देश्य देश को आज़ाद कराना था। इसके विपरीत मीसाबंदियों ने संविधान के अन्तर्गत स्थापित देश की ही एक सरकार के विरूध्द संघर्ष छेड़ा था।

               मीसाबंदी वे हैं, जिनकी गिरफ्तारी सन् 1975 में लागू किये गये आपातकाल के दौरान हुई थी। आपातकाल के दौरान मीसा लागू किया गया था। मीसा अर्थात मेंटेनेन्स ऑ इंटरनरल सेक्युरिटी एक्ट (आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने वाला कानून) के अन्तर्गत उन लोगों की गिरफ्तारी की गई जिन्हें आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक समझा गया था। गिरफ्तार किये गये लोगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,जनसंघ,समाजवादी पार्टी एवं माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य शामिल थे। ये सब लोग आपातकाल का विरोध कर रहे थे। आपातकाल राजनीतिक दृष्टि से उचित था या नहीं यह बहस का मुद्दा हो सकता है। परंतु आपातकाल संविधान के प्रावधानों के अन्तर्गत लागू किया गया था। संविधान में आपातकाल लागू करने का प्रावधान किया गया है। आपातकाल बाहरी आक्रमण या आंतरिक विद्रोह या अराजकता की स्थिति में लागू किया जाता है। विरोधी दलों का आरोप था कि इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए आपात काल लगाया था। इसके विपरीत इंदिरा गांधी का दावा था कि उन्हें इसलिए आपातकाल लगाना पड़ा क्योंकि जयप्रकाश नारायण ने सेना और पुलिस का आव्हान किया था कि वे सरकार के गलत आदेशों का पालन न करें। इस तरह का आव्हान विद्रोह की श्रेणी में रखा जा सकता है। आपात काल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित कर दिया गया था। प्रतिबंध के बावजूद संघ ने अपनी गतिविधियों को जारी रखा।   

               जहां तक आपातकाल के विरोध का सवाल है संघ और अन्य राजनीतिक दलों को ऐसा करने का अधिकार था। सैकड़ों के तादाद में लोगों को मीसा के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया था। परंतु यह भी एक कटु सत्य है कि गिरफ्तार मीसाबंदियों में से अनेकों ने अपनी रिहाई के लिए माफी मांगी। ऐसे लोगों में जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बड़ी संख्या में शामिल थे। न सिर्फ साधारण स्वयंसेवक वरन् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघ चालक श्री बालासाहेब देवरस ने भी इंदिरा गांधी को अनेक पत्र लिखकर उनसे सहयोग करने का आश्वासन दिया था। सरसंघ चालक ने इस मामले में आचार्य विनोबा भावे से भी हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। सेन्ट जार्ज अस्पताल, मुम्बई के जेल वार्ड 14 से देवरस ने आचार्य विनोबा को पत्र लिखा था। उन्होंने विनोबा भावे को संबाधित करते हुए कहा था ''आदरणीय विनोबा जी के चरणों में नमन''। देवरस ने विनोबा जी से अनुरोध किया कि वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर उनके मन में संघ के बारे में जो भ्रान्तियाँ है उन्हें दूर करें और उन्हें संघ के ऊपर लगे प्रतिबंध को हटाने का परामर्श दें। देवरस ने विनोबा जी को यह आश्वासन दिया था कि संघ के कार्यकर्ता रिहा होने के बाद इंदिरा जी द्वारा घोषित कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में उनकी मदद करेंगे।

               दिनांक 10.11.1975 को येरवदा जेल से लिखे एक पत्र में देवरस ने  इस बात पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए इंदिरा जी को बधाई दी थी कि सर्वोच्च न्यायालय की पाँच सदस्यीय बेंच ने इंदिरा जी के चुनाव को वैध ठहराया है। इसके पूर्व 22.8.1975 को लिखे एक और पत्र में देवरस ने लिखा कि ''मैंने आपके 15 अगस्त के भाषण को काफी ध्यान से सुना। आपका भाषण आजकल के हालातों के उपयुक्त था और संतुलित था।'' पत्र के अंत में वे पुन: इंदिरा जी के भाषण के कुछ वाक्यों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि संघ के कार्यकर्ता पूरे देश में फैले हुए हैं। संघ क कार्यकर्ता निस्वार्थ रूप से काम करते हैं। वह आपके कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में तन-मन से सहयोग करे।

               इन पत्रों से यह स्पष्ट होता है कि देवरस ने इंदिरा जी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। आपात काल के दौरान अनेक संघ कार्यकर्ताओं ने माफी मांगी और सरकार के साथ सहयोग करने का आश्वासन भी दिया। बताया जाता है कि इनमें से कुछ ने संघ से अपना संबंध विच्छेद करने तक का आश्वासन दिया। देवरस द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और विनोबा को लिखे पत्रों को ब्रम्हदत्त ने अपनी किताब ''फाइव हेडेड मान्सटर''में शामिल किया है। इसके साथ ही डी.आर.गोयल ने भी अपनी किताब ''राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ'' में इन पत्रों को शामिल किया है।

               अभी हाल में प्रकाशित सुभाष गताडे की किताब ''सेफरन कनडीशन्स'' में मीसाबंदियों के बारे में पूरा चैप्टर है। इस चैप्टर में वे कहते हैं कि इन तथाकथित मीसाकाल के नायकों में से अनेकों ने श्रीमती इंदिरा गांधी का साष्टांग दंड़वत करते हुए माफी मांगी है और बार-बार यह आश्वासन दिया है कि वे अब कोई भी ऐसा काम नहीं करेंगे जो राष्ट्रहितो के विरूध्द हो। तपन बसु,प्रदीप दत्त और सुमिता सरकार द्वारा तैयार किए गये मोनोग्राफ में लिखा गया है ''जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया और संघ के सुप्रीमो देवरस को जेल में डाल दिया गया तब उसके तुरंत बाद देवरस ने इंदिरा गांधी से संपर्क करना प्रारंभ कर दिया। देवरस ने इंदिरा जी को पत्र लिखे और साथ ही विनोबा जी से हस्तक्षेप का अनुरोधभी किया। विनोबा के अतिरिक्त देवरस ने संजय गांधी से भी संपर्क साधा। उनका मुख्य उद्देश्य संघ पर से प्रतिबंध हटवाना और संघ के गिरफ्तार सदस्यों की रिहाई करवाना था।

               वैसे यह अनुसंधान का विषय है कि इंदिरा गांधी एवं देवरस में कुछ समझौता हुआ था या नहीं परंतु यह सर्वविदित है कि संघ की ओर से एक माफीनामे का एक प्रारूप प्रसारित किया गया था और गिरफ्तार स्वयंसेवको से यह कहा गया था कि वे इस प्रारूप पर हस्ताक्षर कर शासन को सौंपे।

               प्रारूप की भाषा निम्न थी- ''मैं ---- मीसाबंदी वर्ग ---जेल में हूं। मैं संलग्न अफीडेविट (शपथनामा) से सहमत होते हुए यह आश्वासन देता हँ कि जेल से छूटने पर मैं कोई भी ऐसा काम नहीं करूंगा जिससे देश की सुरक्षा को क्षति पहॅुचने की संभावना हो। मैं लागू आपातकाल के विरूध्द भी कोई काम नहीं करूंगा।''एक समाजवादी कार्यकर्ता बाबा आधव के अनुसार देवरस ने स्वयं एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए बताया था कि उन्होंने इंदिरा गांधी जी को दो पत्र लिखे थे। जाने माने समाजवादी नेता मधुलिमये जो आपातकाल के दौरान 19 महीने तक जेल में रहे थे, ने अनेक बार उल्लेख किया था कि संघ के स्वयंसेवको ने माफी मांग कर जेल से मुक्ति पाई थी।

               इन सब उदाहरणो से यह स्पष्ट होता है कि संघ ने अंत तक संघर्ष करने के बजाय इंदिरा जी के समक्ष आत्मसमर्पण करना ज्यादा उचित समझा था। अर्थात राष्ट्र के हितों के स्थान पर उन्होंने स्वयं की और संघ की सुरक्षा के लिए अपने को समर्पित करना बेहतर समझा था। दु:ख की बात है कि अब वे ही संघ के स्वयंसेवक मीसाबंदी होने के नाते मोटी रकम स्वीकार कर रहे हैं। संघ के मीसाबंदियों द्वारा माफी मांगकर अब पेन्शन स्वीकार करना उन एक लाख से ज्यादा मीसाबंदियों का अपमान है जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया और महीनों जेल में रहकर विरोध की कीमत चुकाई। मीसाबंदियों के माफी मांगने का मामला उस समय संसद में उठा था जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। लालू प्रसाद यादव की पार्टी के एक सदस्य ने वाजपेयी द्वारा इंदिरा जी को लिखा पत्र लोकसभा में पेश किया था। राजद सदस्य रघुवंश प्रसाद ने यह दावा किया था कि स्वयं वाजपेयी ने इंदिरा को पत्र लिखकर माफी मांगी थी। भाजपा सदस्यों ने इसे सरासर झूठ निरूपित किया था परंतु लोकसभा के तत्कालीन स्पीकर ने रघुवंश प्रसाद को पत्र पढ़ने की इजाजत दी थी। वाजपेयी ने माफी मांगी थी या नहीं यह विवाद का विषय हो सकता है परंतु अनेकों संघी मीसाबंदियों ने माफी मांगी यह सर्वविदित है परंतु यही माफी मांगने वाले आज हीरो बनकर मोटी पेन्शन लेने से बाज नहीं आ रहे हैं।

 
? एल.एस.हरदेनिया