संस्करण: 9 जनवरी- 2012

संदर्भ : अल्पसंख्यकों को केन्द्रीय नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण

सही दिशा में, देर से उठाया गया कदम  

? जाहिद खान

               हमारा मुल्क जब आजाद हुआ और संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी, उस वक्त हमारे रहनुमाओं ने एक ऐसे समाज का ख्वाब देखा, जो सामाजिक भेद-भाव और गैर बराबरी से आजाद हो, जहां ऊंच-नीच का कोई फर्क न हो, किसी के साथ नाइंसाफी न हो। इन मसाएल से निपटने के लिए संविधान में बकायदा उपबंध किए गए। जाहिर है,हमारे संविधान में मौजूद उद्देश्यिका,मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व इन्हीं विचारों से अनुप्राण्श्नित हैं। लेकिन अफसोसनाक है कि आजादी के 63 साल गुजर जाने के बावजूद हम सामाजिक अन्याय, भेद-भाव और असमानता जैसी बुराईयां खत्म नहीं कर पाए। इसके पीछे कोई एक वजह ढूढ़ें, तो वह बुनियादी वजह है हमारी जेहनियत नहीं बदली। जब तक हमारी जेहनियत में तब्दीली नहीं आएगी, तब तक हम न तो संवैधानिक उपचारों को सही ढंग से अमल में ला पाएंगे और न ही सामाजिक रुप से वंचित समूहों को वाजिब इंसाफ मिल सकेगा। यही महती वजह है कि, वंचित और शोषित जातियों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था महसूस की गई। जाहिर है,आरक्षण की व्यवस्था हिंदुस्तानी समाज में व्याप्त असमानता,अस्पृश्यता और भेद-भाव को दूर करने और मुख्तलिफ हल्कों में दलित व पिछड़े वर्ग के लोगों की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करने के मकसद से की गई। ताकि,सामाजिक अन्याय को जड़ से खत्म कर भेद-भाव रहित और बराबरी के जज्बे पर आधारित एक आदर्श समाज का निर्माण और विकास हो सके।

                मुल्क में पिछड़े अल्पसंख्यकों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए केन्द्र की यूपीए सरकार ने हाल ही में अल्पसंख्यकों को केन्द्र की नौकरियों और केन्द्रीय शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े वर्ग के आरक्षण में साढ़े चार फीसद स्थान निर्धारित करने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद निश्चित रूप से पिछड़े वर्ग के अल्पसंख्यकों की सामाजिक, शैक्षणिक स्थिति सुधारेगी, तो केन्द्र की नौकरियों में भी उनका स्थान पक्का होगा। यूपीए सरकार के इस फैसले का जहां अल्पसंख्यक समुदाय ने स्वागत किया है,तो बीजेपी और समूचा संघ परिवार एक बार फिर इस आरक्षण की मुखालफत में आ गया है। जगह-जगह अल्पसंख्यक आरक्षण की मुखालफत में विरोधा-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। अल्पसंख्यकों को सामाजिक-आर्थिक इंसाफ दिलाने के वास्ते किया गया सरकार का यह फैसला,बीजेपी को खतरनाक राजनीतिक खेल नजर आता है। यहां तक कि बीजेपी के कुछ बयान वीर नेताओं ने अल्पसंख्यक आरक्षण को मुल्क को बांटने वाला तक बतला दिया। 

                यों यूपीए सरकार के इस फैसले के दायरे में सारे अल्पसंख्यक आएंगे, लेकिन बीजेपी पूरे मुल्क में फैसले को इस तरह से प्रचारित कर रही है कि जैसे यह आरक्षण सिर्फ मुसलमानों के लिए ही हो, या इसका फायदा सिर्फ उसे ही मिलेगा। सच बात तो यह है कि मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही पिछड़ा वर्ग श्रेणी के अंतर्गत आता है। और दीगर समुदायों की तरह उसे भी पिछड़े वर्ग के आरक्षण का फायदा मिलता है। लेकिन तल्ख हकीकत यह है कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुए दो दशक से ज्यादा गुजर गए,लेकिन मुसलमान वहीं का वहीं है। जबकि, पिछड़े वर्ग में उसके साथ शामिल कई जातियां तरक्की की दौड़ में उससे कहीं आगे निकल गईं। यानी, मुल्क में कहीं न कहीं उसके साथ आज भी पक्षपात और साम्प्रदायिक भेदभाव है,जो उसकी बदहाल स्थिति के लिए जिम्मेदार है। यही वजह है कि मुसलमानों की दशा सुधारने के लिए बने तमाम आयोगों ने उन्हें इंसाफ दिलाने के वास्ते पिछड़े वर्ग के कोटे में से सब कोटा देने की वकालत की। फिर केन्द्र सरकार के इस फैसले, ओबीसी कोटे के भीतर अल्पसंख्यकों के सब कोटे की व्यवस्था मुल्क के कई सूबों मसलन केरल, आंधा्र प्रदेश, तमिलनाडु, कनार्टक और पश्चिम बंगाल में पहले से ही सफलतापूर्वक चल रही है।

                दरअसल, हमारे मुल्क में पिछड़े वर्ग के मुसलमानों को, आरक्षण के दायरे में लाने की जब-जब भी बात हुई है, तो इसकी सबसे ज्यादा मुखालफत बीजेपी और आरएसएस के आनुशंगिक संगठनों ने की है। गोया कि, यूपीए सरकार के आरक्षण के फैसले का सबसे मुखर विरोध बीजेपी ही कर रही है। और यह बात सब अच्छी तरह से जानते हैं कि, उसका यह विरोध तार्किक न होकर सियासी ज्यादा है। वरना, केन्द्र में अल्पसंख्यकों को आरक्षण से बहुत पहले कर्नाटक सरकार ने पिछड़े मुसलमानों को 4 फीसद आरक्षण दिया हुआ है। यही नहीं, मध्यप्रदेश में भी अति वंचित पिछड़े तबके के मुसलमान आरक्षण के दायरे में हैं। जाहिर है, यह बात शायद ही किसी को बताना पड़े कि, इन सूबों में हाल-फिलहाल किसकी सरकार है। जो लोग केन्द्र में अल्पसंख्यक आरक्षण को असंवैधानिक बतला रहे हैं, उन्हें ये बतलाना लाजमी होगा कि, इन्द्र साहनी मुकदमे के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी, यह तथ्य उजागर किया था कि, किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया जा सकता है। कमोबेश, ऐंसा ही मिलता-जुलता ख्याल वेंकटचेलैया कमीशन का भी था कि, ''यदि मुसलमान पिछड़ा वर्ग है, तो उसके आरक्षण के लिए संविधान में किसी संशोधन की जरुरत नहीं।'' लिहाजा, यह कहना कि, एक धार्मिक वर्ग को पिछड़ा वर्ग नहीं करार दिया जा सकता, एक दम जाहिलाना है।

               मुल्क में धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों के साथ भेद-भाव दूर करने के रास्तों की तलाश के लिए गठित, रंगनाथ मिश्र आयोग साफ-साफ कहता है कि, ''अन्य पिछड़े वर्गों की पहचान में बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के बीच धार्मिक आधार पर कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। इस बारे में जो भी मापदंड अपनाएं जाएं,वह पूरी तरह से शैक्षणिक और आर्थिक आधार पर होना चाहिए।'' फिर, हमारे संविधान में भी स्पष्ट रुप से यह कहा गया है कि, आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक होना चाहिए। सच्चर आयोग की तरह मिश्र आयोग ने भी सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में मुसलमानों की कम नुमाइंदगी को तस्लीम किया था। लिहाजा,आयोग ने सिफारिश की थी कि, अल्पसंख्यकों को पिछड़ा समझा जाए और केन्द्र तथा सूबाई सरकारों की नौकरियों में उनके लिए 15फीसद स्थान चिन्हित किए जाएं। इन 15 फीसद स्थानों में से 10 फीसद स्थान मुसलमानों के लिए और बाकी 5 फीसद स्थान दीगर अल्पसंख्यकों के लिए हों। लेकिन बावजूद इसके सिफारिश को लागू करने में होने वाली व्यावहारिक कठिनाई को देखते हुए आयोग ने विकल्प के तौर पर दीगर पिछड़े वर्गों के कोटे में से 8.4फीसद सब कोटा अल्पसंख्यकों के लिए चिन्हित करने की सिफारिश की थी। खैर, 15 फीसद आरक्षण तो नहीं, यूपीए सरकार ने पिछड़े वर्ग के 27 फीसद कोटे में से हाल-फिलहाल अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसद सब कोटा देकर इस दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर दिया है। यानी, सही दिशा में देर से उठाया गया कदम।

               कुल मिलाकर, जो अल्पसंख्यक बरसों से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के शिकार रहे हैं, उन्हें आरक्षण की छतरी के तले लाना मौजूदा दौर में इंसाफ की मांग है। अवसरों से वंचित अधिकारविहीन लोगों को सामाजिक विभाजन का डर दिखाकर कब तलक तरक्की के मौकों से रोका जाता रहेगा। वास्तव में यह इंसाफ की लड़ाई है, इसे केवल आरक्षण के लिए संघर्ष के रुप में नहीं देख सकते। दरअसल, आरक्षण लोकतांत्रिक संघर्ष का छोटा सा हिस्सा भर है। गुजिष्ता 64 बरसों के दौरान मुख्तलिफ इलाकों चाहे वह प्रशासन हो, पुलिस महकमा, अदालतें या दीगर संस्थान हों,इन सब में अल्पसंख्यकों की कमी दर्ज की गई है। इस तथ्य को मद्देनजर रख सरकार को, अल्पसंख्यकों की तरक्की के लिए खास कोशिशें करनी होंगी, तभी कुछ बदलाव मुमकिन हैं। जाहिर है, केन्द्र सरकार द्वारा केन्द्रीय नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अल्पसंख्यकों के लिए किए गए आरक्षण को इसी नजर से देखे जाने की जरुरत है।

  ? जाहिद खान