संस्करण: 9 जनवरी- 2012

'हरेकृष्ण आन्दोलन' के नए मुरीद ! 

गीता विवाद को लेकर चन्द बातें

? सुभाष गाताड़े

                सुदूर साइबेरिया के नगर टोम्स्क की अदालत में जारी एक कार्रवाई ने पिछले दिनों गजब का करिश्मा दिखाया। संसद जो निर्वतमान वर्ष में विभिन्न कारणों से बाधित होती रही है,वहां पक्ष विपक्ष के सांसद उपरोक्त कार्रवाई को लेकर अचानक एक दूसरे के सुर में सुर मिलाते दिखे। सदस्यों की उत्तेजना को देखते हुए विदेशमंत्री एस एम कृष्णा ने सदन को आश्वासन दिया कि सरकार वहां की घटनाओं पर नज़र रखे हुए है,यहां तक कि मामले की सफाई देने के लिए  दिल्ली में तैनात रूस के राजदूत ही नहीं बल्कि राजधानी मास्को में रूसी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता को उतरना पड़ा। (इण्टरफेक्स, 23 दिसम्बर 2011) जब मामला थोड़ा ठंडा हुआ तब यह उजागर हुआ कि विवाद के केन्द्र में गीता नहीं है - जिसको लेकर सारी उत्तेजना थी - बल्कि एक किताब है जो गीता के श्लोकों के एक अनुवाद एवं उस पर लिखी गयी टिप्पणियों पर आधारित है,जिसके रचयिता इण्टरनेशनल सोसायटी फार कृष्णा कान्शसनेस अर्थात इस्कॉन के संस्थापक प्रभुपाद भक्तिवेदान्त रहे हैं। प्रस्तुंत किताब के जरिए प्रभुपाद ने एक तरह से हरेकृष्ण आन्दोलन का अपना 'मैनिफेस्टो' रखा है।

                  निश्चित ही संसद की उत्तोजना की प्रतिक्रिया सड़कों पर उतरना भी स्वाभाविक था और संसद में इस मामले को उठाने में लालू प्रसाद,शरद यादव से पिछड़ी भाजपा के आनुषंगिक संगठनों ने जगह जगह प्रदर्शन कर इसकी खानापूर्ति करने की कोशिश की। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुश्री सुषमा स्वराज्य ने यह मांग तक कर डाली कि गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाए। लाजिम था इस आपाधापी में मध्यप्रदेश सरकार के एक अन्य विवादास्पद फैसले को लेकर चल रही बहस अचानक मध्दिम हो गयी। याद रहे कि शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने गीता के अध्ययन को स्कूलों के लिए अनिवार्य कर दिया है।

                 अब संसद एवं सड़क पर चूंकि लोकपाल का मसला बहसतलब है लिहाजा यह मसला पृष्ठभूमि में चला गया है और चूंकि भारत के लोगों की इस मसले पर अत्यधिक सम्वेदनशीलता भी उजागर हुई है उसमें हो सकता है कि प्रभुपाद की उपरोक्त किताब जिसकी टिप्पणियों को रूसी संघीय कानून की धारा 13 के तहत ''अतिवादी गतिविधियों के निवारण के'' सन्दर्भ में वर्गीकृत किया गया है, वह मामला ही ठण्डे बस्ते में चला जाए।

               मगर प्रस्तुत विवाद को लेकर भारत के प्रबुध्द समुदाय एवं उनके नुमाइन्दों ने मामले की असलियत को जाने बगैर जिस कदर शोरगुल मचाया,  वह प्रसंग दुनिया में उनकी शोहरत में किसी भी मामले में इजाफा नहीं करेगा।

               प्रस्तुत किताब के विवादास्पद उल्लेखों को लेकर टोम्स्क न्यायालय की प्रतिकूल टिप्पणी पर गौर करने के पहले क्या यह जरूरी नहीं था कि हम मामले की तह में जाते। यह सही है कि इस्कॉन आज एक विश्वव्यापी महासंघ है, 400 से अधिक केन्द्रों का, संचालन करता है, हाल के वर्षों में सदस्यता की संख्या के तौर पर उसका अधिक विस्तार पूर्वी यूरोप के मुल्कों में और भारत में हुआ है, मगर टोम्स्क नगर में इसकी गतिविधियों ने किस तरह जनाक्रोश को जन्म दिया उसकी तहकीकात कौन करता। 'तहलका' की रिपोर्ट के मुताबिक इस्कॉन के अनुयायियों ने अपने मकानों को उन इलाकों में बनाना चाहा जो संरक्षित इलाका था। यह मामला अदालत में गया। जो लोग इस निर्माण का विरोध कर रहे थे उन्हें प्रभुपाद के शब्दों में कई सारी ऐसी बातें नज़र आयी जिन्हें वहां की संघीय कानून में आक्षेपार्ह माना गया था, इसलिए उन्होंने मांग की कि इस किताब पर पाबन्दी लगा दी जाए।

               दरअसल यह कोई पहला मौका नहीं था कि अपनी सम्पत्ति एवं कार्यप्रणाली को लेकर इस्कॉन मास्को तथा अन्य नगरों में विवादों में न फंसा हो। कई बार इस मामले में भारतीय दूतावास ने दखल देकर उन विवादों को हल करवाया है। रूस में विगत दो दशकों के दौरान जिस तरह रशियन आर्थोडोक्स चर्च का प्रभाव बढ़ा है, उसने भी हरेकृष्ण आन्दोलन को 'सर्वसत्तावादी' घोषित करते हुए उसकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश की है। कुछ साल पहले मास्को के नगर प्रशासन ने मास्को के केन्द्रीय हिस्से में इस्कान के विशाल प्रार्थना एवं सांस्कृतिक केन्द्र बनाने की इजाजत नहीं दी थी। 'प्रावदा की 23सितम्बर 2010की रिपोर्ट बताती है कि किस तरह 'हरे कृष्ण सम्प्रदाय की गतिविधियां लोगों को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रही हैं।' यहां टोम्स्क के ही हरेकृष्ण समूह का उल्लेख है कि किस तरह उसका संचालक कोई बाबाजी अली लोगों की सम्पत्ति हडपने या नशीली दवाओं के फैलाव में मुब्तिला था।

               टोम्स्क के इलाके में इस्कॉन की गतिविधियों से पैदा असन्तोष बरबस हमें इस संगठन के इतिहास के एक अन्य स्याह दौर की याद दिलाता है जब इस्कॉन के स्कूलों में अध्ययनरत रहे बच्चों ने बड़े होने पर आश्रमों के अन्दर जारी बाल यौन अत्याचार के तमाम मामलों को उजागर किया था। अस्सी के दशक के मध्य में यह रहस्योद्धाटन हुआ था, जब वहां अधययनरत रहे व्यक्तियों ने अपनी आपबीती उजागर करते हुए इस्कॉन के खिलाफ मुकदमा कायम किया था। डल्लास की जिस कानून की फर्म ने इस मसले को उठाया था, उसके मुताबिक लगभग आधे से अधिक लोग यौन अत्याचार का शिकार हुए होंगे। 'मंकी आन ए स्टिक' शीर्षक से जान हुबनेर और लिण्डसे ग्रुसन की लिखी एक किताब भी प्रकाशित हुई है, जिसमें कई मामलों का दस्तावेजीकरण किया गया है। वर्ष 1988 में इस्कॉन ने अपने आधिकारिक बयान में इस बात को कबूल भी किया कि उसके द्वारा संचालित स्कूलों में बच्चो को किस किस्म की शारीरिक, भावनात्मक और यौन दुर्व्यवहार को झेलना पड़ा था।

               यह कहना गलत नहीं होगा कि अपनी स्थापना के समय से ही इस्कॉन विवादों में रहा है। वर्ष 1976 में ही राबिन जार्ज नामक एक अल्पवयस्क की ब्रेनवॉशिंग करने का मामला उसके माता पिता ने दायर किया था, जिसका फैसला 1983 में हुआ। वर्ष 1983 में कॅलिफोर्निया की जूरी ने इस परिवार को लाखों डॉलर का मुआवजा दिलवाया। ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि सीआईए ने भी अपने कम्युनिज्म विरोधी एजेण्डा के तहत इसका इस्तेमाल किया।

               हिन्दुवादी लोग, जिन्हें 'इस्कॉन' अपना लगता है उनके लिए यह जानना समीचीन होगा कि जब जब मौका आया भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने अपने हरेकृष्ण आन्दोलन को हिन्दु धर्म से अलग ही रखा। अपनी किताब 'साइन्स आफ सेल्फ रियलायजेशन' (1977) में वह लिखते हैं कि ' इस बात को लेकर गलतफहमी है कि कृष्णा कान्शसनेस आन्दोलन हिन्दु धर्म का प्रतिनिधित्व करता है। कभी कभी भारत के अन्दर एवं बाहर रहनेवाले लोग समझते हैं कि हम लोग हिन्दु धर्म सीखा रहे हैं, मगर यह सही नहीं है।'' प्रस्तुत किताब के तीसरे अध्याय में यह दावा कई बार किया गया है कि ''कृष्णा कान्शसनेस मूवमेण्ट का हिन्दु धर्म या किसी अन्य धर्म के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है।..हमें यह स्पष्ट समझना होगा कि यह आन्दोलन कथित हिन्दू धर्म का प्रचार नहीं कर रहा है।''1974में बम्बई के अपने व्याख्यान में प्रभुपाद ने यही बात दोहरायीं। ( अक्तूबर 1998 / हिन्दूइजम टुडे)

                वैसे प्रभुपाल भक्तिवेदान्त द्वारा लिखी किताब को लेकर रूस की अदालत में चला मामला जिस तरह उजागर हुआ वह हमारे सियासतदानों एवं समाज के बारे में कई चिन्ताजनक सवाल खड़े करता है और वह धर्मनिरपेक्षता की हमारी समझदारी को भी प्रश्नांकित करता है। कल्पना करें कि कल अगर भारत के निवासी अन्य धार्मिक समुदायों की किताबों को लेकर पश्चिमी देश की कोई अदालत प्रतिकूल टिप्पणी करें, उनके धार्मिक ग्रंथों पर लांछन लगाए, तो क्या हमारे सियासतदां एवं नागरिक समाज के लोग उसी तरह उत्तेजित होंगे। निश्चित ही नहीं ! फिर यह दोहरा मापदण्ड क्यों ? धर्मनिरपेक्षता के लिए हमारे मायने क्या बहुसंख्यकों के आस्था के सरोकारों से ही संचालित होंगे या हम ऐसे धर्मनिरपेक्षता के पैरोकार होंगे जो राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में धर्म के हस्तक्षेप को अस्वीकार करेगी और धर्म को निजी दायरे तक सीमित रखने की हिमायत करेगी।

               ऐसा प्रतीत होता है कि भारत का प्रबुध्द समुदाय के बहुतांश ने अन्तर्मन में कहीं न कहीं हिन्दुत्व के विचारकों द्वारा प्रचारित प्रसारित धर्मों के विभाजन को स्वीकार किया है, जिसमें वह हिन्दू धर्म, जैन, बौध्द एवं सिख धर्म को इण्डिक धर्म सम्बोधित करते हैं और इस्लाम एवं ईसाईयत को नानइण्डिक धर्म अर्थात 'बाहरी' धर्म कहते हैं।

                9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने जिस तरह आतंकवाद के खिलाफ युध्द की दिशा को विशिष्ट समुदायों एवं उनकी आस्था के खिलाफ केन्द्रित किया इससे हम सभी वाकीफ रहे हैं। हम जानते हैं कि विशिष्ट समुदायों का आपराधीकरण एवं आतंकवादीकरण का सिलसिला इस कदर आगे बढ़ा कि कई दक्षिणपंथी विचारकों ने उनके 'पवित्र ग्रंथों' को ही 'आतंक' का मैनिफेस्टो घोषित किया।

               कोई भी जानना चाहेगा कि 'गीता' को लेकर कल्पित अपमान को लेकर उत्तोजित प्रबुध्द समुदाय उस वक्त क्यों खामोश रहा ? टोम्स्क की अदालत का प्रसंग निपट जाएगा मगर क्या यह समझा जाना जरूरी नहीं है कि अपने मुल्क को वास्तविक धर्मनिरपेक्ष बनाने की दिशा में हमें कई मंजिलें पार करनी हैं।


? सुभाष गाताड़े