संस्करण: 9 जनवरी- 2012

जाति समुदायों के संगठनों की हैसियत

? वीरेन्द्र जैन

                 यद्यपि हमने अपने संविधान में रंग धर्म लिंग जाति भाषा क्षेत्र आदि के भेद भाव के बिना सभी नागरिकों को समान अधिकार का वादा किया हुआ है पर इसके साथ सामाजिक आर्थिक रूप से दलित व पिछड़ी जातियों को समान स्तर पर लाने की दृष्टि से कुछ ऐसे उपाय भी किये हैं जिससे वे समान धरातल पर खड़े हो सकें। इसके लिए न केवल शिक्षा आदि में कुछ विशेष प्रोत्साहन ही दिये हैं अपितु कई क्षेत्रों में आरक्षण देकर भी उन्हें समान स्तर देने का प्रयास किया है।

                  जातियों के बीच समानता लाने के इस प्रयास में दिया गया आरक्षण अनेक त्रुटियों से भरा कदम है किंतु जब तक हम इससे अधिक अच्छा कदम नहीं नहीं ला पाते तब तक इसे ही सर्वोंत्ताम मानना हमारी बाध्यता है। आरक्षण में सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि हमने जाति उत्थान के प्रयासों मेंव्यक्तियों को सुविधाएं दी हैं और फिर यह समझने की भूल की है कि इससे समाज का उत्थान हो जायेगा। गत पचास साल का हमारा अनुभव बताता है कि ऐसा नहीं हो पाया। जिन व्यक्तियों को ये सुविधाएं मिलीं उन्होंने अपनी जाति का उत्थान करने की जगह स्वयं की जाति छुपाना प्रारम्भ कर दी व अपनी जाति के लोगों से स्वयं को काटना प्रारम्भ कर दिया। एक बार आरक्षण के लाभ से लाभान्वित लोगों ने अपनी विशेष स्थिति  का लाभ लेते हुये इन सुविधाओं को अपने परिवारियों परिचितों को प्राथमिकता देकर सामाजिक विकास  के लक्ष्य को और दूर कर दिया।

               आरक्षण नीति के अन्तर्गत विभिन्न सदनों नगरनिगमों नगर पालिकाओं पंचायतों आदि के निर्वाचन क्षेत्रों के लिए जो स्थान आरक्षित किये गये उनसे भी भले ही कुछ व्यक्तियों को मौद्रिक लाभ पहुंचा हो पर बिना उचित राजनीतिक कार्यों के वोट समूह जुटाने के प्रयास में दलों ने जातियों के संगठन बनवाने और उसके नेतृत्व को विकसित करने के प्रयास किये जिसमें वे सफल भी रहे। इसने जातियों की बीमारी को समाप्त करने की जगह उसे मजबूत करने, उसकी पहचान को बनाये रखने, और अपने अपने प्रतीक पुरूष खोज कर उनके महिमामंडन द्वारा जाति अस्मिता पैदा करने की कोशिश की। एक ओर जहां उनके जातीय पिछड़ेपन के आधार पर उन्हें प्रोत्साहन की सरकारी नीति थी वहीं दूसरी ओर उनकी यथा स्थिति को गौरवान्वित करने के प्रयास प्रारम्भ हो गये थे जो उन्हें दूसरों के समान ही नहीं उनसे श्रेष्ठ साबित करने में लग गये थे। यह ऐसा ही था जैसे किसी बीमार और कमजोर व्यक्ति को कोई चन्दबरदाई दुनिया का सबसे बड़ा शूरमा सिध्द करने में जुट जाये जिसका परिणाम यह निकले कि वह अपनी बीमारी की खोज और इलाज की जगह तलवार भांजने में अपनी ऊर्जा नष्ट करने लगे। जाति संगठनों के मजबूत होते जाने ने उन्हें अपनी जाति समाज की उन बुराइयों को पहचानने व उन्हें दूर करने की सम्भावनाओं कों बाधा पहुंचायी जो उनके सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेवार रहीं थीं।

               राजनीतिज्ञों की चुनावी सम्भावनाओं से जनित जाति-संगठनों का नेतृत्व भी लोकतांत्रिक ढंग से चुना नेतृत्व नहीं था अपितु क्षेत्र के प्रभावी नेता के चुनावी हितों हेतु रोपा गया नेतृत्व था। इस नेतृत्व ने एक ओर अपने जाति समाज को महान बताने की कोशिश की और दूसरी ओर सरकार से सुविधाएं दिलवाने की फुसलाहटें दीं। समाज के स्वतरू उत्थान या उसमें घर कर गयी कमजोरियों के उन्मूलन के कोई प्रभावी प्रयास इस नेतृत्व ने नहीं किये।

               चुनावी राजनीतिज्ञों के बहकावे में सरकारों से अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने की जो प्रवृत्ति आरक्षण के कारण पैदा हुयी उसमें जातिवादी संगठनों के स्वयं भू नेता सरकारों से बात करने पहुंचे जबकि यह कहीं प्रमाणित नहीं था कि वे सचमुच उस बातचीत के लिए उस समाज से अधिकृत भी हैं या नहीं। मीडिया मेनेजमैंट के द्वारा उन्हें ही समाज का नेता बताने का डंका बजा दिया गया और इस नक्कारखानें में तूतियों की आवाजें दब कर रह गयीं। संविधान ने भले ही कुछ जाति समूहों के व्यक्तियों को आरक्षण की सुविधा दी हो पर उनके जातिवादी संगठनों के गठन या नेतृत्व की कोई व्यवस्था  वहां नहीं है। सम्भवत संविधान निर्माताओं का यह विश्वास रहा होगा कि किसी जाति समूह के लिए कुछ सुविधाएं हासिल करने की मांगें राजनीतिक दलों के माघ्यम से ही रखी जायेंगीं।

               गत वर्षों में राजस्थान में गुर्जरों के आन्दोलन में व्यक्त की गयी मांगों के समर्थन में एक भी राजनीतिक दल खुलकर आगे नहीं आया था,पर किसी ने खुले पैमाने पर उनके हिंसक आन्दोलन व अव्यवहारकि मांगों का विरोध करने की हिम्मत भी नहीं जुटाई थी। यह स्थिति दो बातों की ओर इशारा करती है, पहली तो यह कि समाज में इतने बड़े पैमाने पर हो रही हलचलों के बारे में राजनीतिक दल उदासीन हैं और जनता से उनका सम्बन्ध केवल वोट हथियाने भर का है और दूसरी यह कि गैर राजनीतिक आघार पर संचालित लोकतंत्र भविष्य में भी ऐसी अनेक समस्याओं से जूझ सकता है। यह समय है कि जब राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को अपने गरेबां में झांक कर देखना चाहिये और विश्लेषित करना चाहिये कि क्यों जगह जगह इतने जातीय और क्षेत्रीय दल विकसित होकर लोकतंत्र का क्षरण कर सकने में सफल हो रहे हैं।

? वीरेन्द्र जैन