संस्करण: 9 जनवरी- 2012

अन्ना के निशाने पर कौन

कांग्रेस या भ्रष्टाचार

? अनवर सिद्दीकी

                अन्ना हजारे ने लोकपाल बिल की मांग को लेकर न सिर्फ देश के लोगों को उद्वेलित किया बल्कि विदेशी मीडिया में भी छाए रहे। होना भी चाहिए था क्योंकि आज भ्रष्टाचार से भारत का प्रत्येक व्यक्ति न सिर्फ त्रस्त है वरन तंग भी आ चुका है। अन्ना ने आंदोलन किया, इस आंदोलन की आंच राजनैतिक दलों से होती हुई संसद तक पहुची। सरकार ने अपना बिल पेश किया, सदन के अंदर विरोध और समर्थन की जद्दोजहद हुई जो जो शहर, गांवों की गलियों में चर्चा के रूप में अभी भी चल रही है। बहरहाल इस सब के बावजूद अब यह तो लगभग तय हो गया है कि लोकपाल बिल पास होगा और हो सकता है कि वह सर्वमान्य रूप धारण कर ले। मगर इससे सबसे इतर कुछ सवाल भी हैं जो कि अन्ना व उनकी टीम की कथनी और आचरण से उपजे हैं।

               अहम सवाल ये है कि अन्ना कांग्रेस के विरोध में हैं या भ्रष्टाचार के ? भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है, इसके खिलाफ हर लड़ाई जायज है मगर क्या इसके बहाने किसी एक राजनैतिक दल मात्र को निशाना बनाना भी जायज है। भ्रष्टाचार के नाम पर आंदोलन खड़ा करके जन समर्थन हासिल कर अन्ना ने सीधो चुनाव प्रचार का रास्ता पकड़ा और कांग्रेस को हराने के अभियान में जुट गए, क्या यह भी उनकी मजबूत लोकपाल की मांग का हिस्सा था? कहीं ऐसा तो नहीं कि अन्ना किसी राजनैतिक विचारधारा या दल से प्रभावित हैं और उसी के अतिरेक में सिर्फ कांग्रेस को निशाना बना रहे हैं, जैसा कि दिग्विजय सिंह ने उन पर खुला आरोप भी लगाया है और अब तो भाजपा पांच राज्यों खासकर यूपी में हो रहे विधान सभा चुनाव में अन्ना की लोकपाल की मांग को हथियार की तरह इस्तेमाल करने जा रही है। यानि अन्ना से मुद्दा उछलवाया, जन समर्थन की आड़ में मुद्दे का महत्व समझा और चुनाव में आजमाने में जुट गई।

                पहली बार अन्ना ने लोकपाल की बात उठाई तो उनके समर्थन में जन सैलाब उमड़ पड़ा, दिग्विजय सिंह की इस बात में दम नजर आता है कि अन्ना और आरएसएस में गठजोड़ है तभी तो भाजपा अन्ना के समर्थन में खुलकर सामने आई। अन्ना के आंदोलन में उमड़े जन सैलाब को लेकर भी कई सवाल हैं जिनकी तह तक जाना जरूरी है। अन्ना के समर्थन में मैं अन्ना हूं की टोपी लगाकर जो लोग सड़कों पर उतरे या अनशन स्थल पर एकत्रित वे एक भीड़ की शक्ल में थे या समूह के रूप में? यहां यह बात उल्लेखनीय है कि भीड़ आकर्षित होती है और समूह प्रभावित, यह अन्ना का आकर्षण था या प्रभाव, भीड़ का कोई चरित्र नहीं होता वह तो कई बार नारे उछालने या तमाशा करने पर भी इकट्ठी हो जाती है जबकि समूह का एक चरित्र होता है और विचारधारा भी, भीड़ आकर्षित होती है जबकि समूह प्रभावित,  क्या अन्ना की भी कोई विचारधारा है, या फिर मात्र कांग्रेस का विरोध और उसे सत्ता से दूर करना ही उनका लक्ष्य है।  लोकपाल बिल तो कई वर्षों से लंबित था। इस बीच भाजपा नीत सरकार भी केंद्र की सत्ता में काबिज रही तब उन्हें इसकी सुध नहीं आई क्योंकि तब इसे पास करने यानि बिल्ली के गले में घंटी बांधने की बारी उनकी थी, उस समय लोकपाल की चर्चा तक नहीं हुई और अब वही भाजपा लोकपाल के बहाने कांग्रेस को चुनौती दे रही है कहीं अन्ना उसके संवाहक तो नहीं।

              क्या भाजपा भ्रष्टाचार से अछूती है। जिन राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें हैं क्या वहां भ्रष्टाचार नहीं है। मप्र में तो मंत्री से संत्री तक लोकायुक्त के शिकंजे में हैं मगर क्या कोई कार्रवाई हो रही है? उत्तर प्रदेश के क्या हालात हैं क्या देश के लोग नहीं जानते, तो फिर अन्ना के निशाने पर ये क्यों नहीं हैं। अगर अन्ना ने हर भ्रष्टाचारी के विरुध्द युध्द का शंखनाद किया होता तो शायद वह सचमुच एक महानायक बन जाते और एक विचारधारा के संवाहक भी परंतु ऐसा नहीं हुआ और यदि दिग्विजय सिंह के आरोपों को सही मानें तो वे संघ की कठपुतली बनकर रह गए। अन्ना को मीडिया ने प्रखर गांधाीवादी निरूपित करने के अथक प्रयास किए परंतु क्या मात्र अनशन करने भर से कोई गांधीवादी कहा जा सकता है जबकि वह एक आंदोलन का नेतृत्व कर रहा हो। अन्ना और उनकी टीम के प्रमुख लोगों वाणी में परिलक्षित होते शब्द और शैली क्या सचमुच महात्मागांधी जैसी है?

? अनवर सिद्दीकी