संस्करण: 8 अक्टूबर-2012

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झूठ के सहारे

झंडा फहराने का सपना

           सूरजकुंड में हुई भाजपा की कार्यकारिणी बैठक में दो बातें स्पष्ट रूप से दिखीं। पहली सत्ता पाने की छटपटाहट, दूसरी अपनी खामियों के प्रति भय। सत्ता की छटपटाहट में भाजपा ने कोल ब्लॉक आवंटन और रिटेल में एफडीआई का विरोध किया बावजूद इसके कि कोल आवंटन में उसके नेताओं के नाम भी सामने आ चुके हैं और एफडीआई पर एनडीए सरकार 100 प्रतिशत पर राजी थी। तो खामियों से भयभीत, पार्टी के विरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने नेताओं को भ्रष्टाचार न करने और सेक्युलर होने की नसीहत दी।

? विवेकानंद


केजरीवाल के लिए

चुनाव क्षेत्र और उम्मीदवार तय करते अन्ना हजारे

        ब यह लगभग पुष्ट हो चुका है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन आन्दोलन के पीछे मुख्य सूत्रधार अरविन्द केजरीवाल थे जिन्होंने एक साफ सुथरे चेहरे या कहें कि मुखौटे के रूप में अन्ना हजारे को आगे किया था। परिस्तिथियां ऐसी थीं कि उन्हें पूरे देश में कोई भी चर्चित आदर्श राष्ट्रीय चेहरा नजर नहीं आया इसलिए उन्हें एक क्षेत्रीय चेहरे को राष्ट्रीय चेहरा बनाना पड़ा। इस आन्दोलन का चेहरा बनने से पहले महाराष्ट्र में अपने अनशनों से ध्यान आकर्षित करने के बाद भी अन्ना हजारे की अखिल भरतीय छवि निर्मित नहीं हुयी थी और न ही उनकी सोच इतनी व्यापक थी कि राष्ट्रीय नेतृत्व करने की पात्रता पाने के लिए वे समस्याओं और उनके निराकरण के बारे में समग्रता से सोच कर कोई हल देने का प्रयास करते।   

? वीरेन्द्र जैन


भ्रष्टाचार को सामने लाने वाले

दो साधारण चेहरे

   यूं तो आम आदमी हमेशा अपनी ही समस्याओं से जूझता रहता है। वह चाहकर भी अपनी समस्याओं से निजात नहीं पा सकता। लेकिन यही आम आदमी यदि कुछ ईगों करने की सोच ले, तो वह क्या नहीं कर सकता। यही आम आदमी चाहे तो राजनेताओं को भी धूल चटा सकता है। महाराष्ट्र का सिचांई घोटाला सामने आया है, उसमें दो आम आदमी की महत्वपूर्ण भूमिका है। सत्य की ताकत अंजलि दमनिया और विजय पंढारे की हिम्मत के कारण महाराष्ट्र के भ्रष्ट नेताओं के चेहरे बेनकाब हुए हैं। इससे यह साबित होता है कि एक छोटा सा दीया किस तरह से अंधोरे को चीरकर उस स्थान को प्रकाशवान बना सकता है।

? डॉ. महेश परिमल


क्या एफ.डी.आई. का विरोध जायज है? 

            खुदरा या रिटेल क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) को लेकर केन्द्र में घमासान मचा हुआ है। केन्द्र सरकार की गिरती विश्वसनीयता एवं वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1991 की तरह एक बार फिर कमर कस ली है। उनके समक्ष यक्ष प्रश्न यह है कि आर्थिक मुद्दों को अर्थशास्त्री की तरह ही डील किया जाये या एक राजनीतिज्ञ की तरह। राजनीतिज्ञ वह होता है जो वर्तमान परिस्थितियों में मौजूद संभावनाओं के आधार पर खेल खेलता है और इसके विपरीत अर्थशास्त्री भविष्य की संभावनाओं के आधार पर वर्तमान में निर्णय लेता है।  

? अजय सिंह गंगवार


क्या कारण है कि आडवाणी जी धर्म निरपेक्षता की बात कर रहे हैं

         सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। यह कहावत सौ फीसदी लालकृष्ण आडवानी पर लागू होती है। विशेषकर उस समय जब वे भारतीय जनता पार्टी को सलाह देते है कि वह अपनी सेक्यूलर इमेज स्थापित करने का प्रयास करे। क्या देश इस बात को भूल सकता है कि वे आडवानी ही थे जिन्होंने राम मंदिर को लेकर  रथ यात्रा निकाली जिससे देश की सेक्यूलर नींव  हिल गई। उस समय आडवानी का नारा था 'मंदिर वहीं बनेगा'। इस नारे का स्पष्ट संदेश था कि यदि मंदिर वहीं बनाना है तो बाबरी मस्जिद को तोड़ो।

 ?   एल.एस.हरदेनिया


स्वार्थ से ढीली होती

गठबंधन की गांठे

                  'स्वार्थ लागि करही' सब प्रीति'-रामचरित मानस में वर्णित संत कवि तुलसीदास की यह युक्ति मनुष्य के स्वभाव की बहुत बड़ी पहचान बन गई है। इस बात की पुष्टि कदम-कदम पर देखने और सुनने को मिलती रहती है; तमाम रिश्ते-नाते, दोस्ती और दुश्मनी की जड़ में स्वार्थ ही स्वार्थ है; यह तो वक्त-वक्त की बात होती है और इसी के आधार पर जीवनलीला के दृश्य बनते-बिगड़ते देखे जा सकते हैं। मक्खियां भी वहीं भिनभिनाती देखी जाती हैं जहां गुड़ के ढेर हैं और चीटियां भी वहीं रेंगती रहती है जिनके आसपास शक्कर के दाने पड़े होते हैं।

? राजेन्द्र जोशी


भाजपा सरकार में भागीदारी से दूर कमजोर वर्ग के लोग

      ध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार पिछड़े अल्पसंख्यक, कमजोर वर्ग का हितेशी होने का दावा तो करती है लेकिन इस वर्ग को अबतक सत्ता में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। अनुसूचित जाति, जनजाति की बहुलता वाले मध्यप्रदेश में इस वर्ग के लोग भी मंत्री मण्डल में पर्याप्त संख्या में जगह पाने का इंतजार पिछले आठ वर्षों से कर रहे है। मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग के लोगों की कुल जनसंख्या लगभग 58 प्रतिशत से अधिक हैं। जबकि इस अनुपात में मंत्रिमण्डल में इस वर्ग के लोगों को स्थान नहीं मिल पाया है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार मध्यप्रदेश में  लोधी, साहू, राठौर सहित अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों का प्रतिशत सामान्य वर्ग से अधिक है।

? अमिताभ पाण्डेय


संदर्भ : म.प्र. सरकार की मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना

मुफ्त तीर्थयात्रा से निर्धन बुजुर्गों की जीवन नैया पार नहीं लगेगी

      जकल मधयप्रदेश सरकार स्वयं अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है। प्रदेश के निर्धान बुजुर्ग रामेश्वरम, अजमेर शरीफ, वैष्णोदेवी आदि की तीर्थयात्रा कर निहाल हों न हो, प्रदेश सरकार उनका वोट बैंक सुनिश्चित कर गद्गद् हो रही है। प्रति वर्ष एक लाख और अभी जनवरी 2013 तक साठ हजार वृध्दों के मुफ्त तीर्थदर्शन की योजना सितम्बर 2012 में कार्यान्वित हो चुकी है। सर्वाधित चिंताजनक यह है कि अब सरकारों का जनता के दु:ख दर्द से कोई सरोकार नहीं है। वे सिर्फ सत्ता की राजनीति कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने गरीब परिवारों को मुफ्त मोबाइल देने की घोषणा कर दी।

? डॉ. गीता गुप्त


मुलायम के दबाव में

उ.प्र सरकार

        देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री के रुप में अखिलेश यादव ने लगभग छह माह पूर्व उत्तर प्रदेश जैसे महाप्रदेश की बागडोर संभाली थी। इससे पूर्व अखिलेश ने कभी भी शासन में किसी दायित्व को नहीं संभाला था। इसलिए हर लिहाज से इस नये और युवा मुख्यमंत्री के कार्यकाल को ऑकने के लिए यह समय अत्यन्त कम है फिर भी चुनाव में किये गये अपने वादों पर उन्होंने अमल भी शुरु कर दिया है। बेरोजगारों को भत्ता तथा राजकीय नहरों से फसलों की मुत सिंचाई तथा कन्या विद्या धन जैसी योजनाऐं शुरु की जा चुकी है तथा किसानों के कर्जमाफी जैसी कई अन्य घोषणाओं के क्रियान्वयन पर मंथन चल रहा है। लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरुप छात्रसंघों के चुनाव कराने की घोषणा कर दी गई है।

? सुनील अमर


धर्म के आधार पर ना हो,

कानून का दुरुपयोग

       किसी भी सरकार के कामकाज को यदि लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष कसौटी पर परखना है, तो हमें सबसे पहले यह देखना होगा कि उस राज्य में अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है ? वहां अल्पसंख्यकों के मानव अधिकारों का कितना ख्याल रखा जाता है ? इन दोनों बातों को यदि मद्देनजर रखें तो गुजरात की मोदी सरकार लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष कसौटी पर बिल्कुल खरी नहीं उतरती। गुजरात में बीते एक दषक के अंदर अल्पसंख्यकों के मानव अधिकार उल्लंघन की सबसे ज्यादा घटनाएं हुई हैं। कभी साम्प्रदायिक दंगों, कभी फर्जी मुठभेड़, तो कभी आतंकवाद के नाम पर यहां अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न, दमन होता रहा है।

    

? जाहिद खान


संदर्भ :- प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने औद्यौगिक अनुसंधान परिशद के 70वें स्थापना दिवस के अवसर पर जताई चिंता

विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ता देश

        प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक बार फिर यह चिंता जताई है कि भारत विज्ञान एवं वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में लगातार पिछड़ रहा है। बीते दो दशक में यह स्थिति बदतर हाल में सामने आई है। यह बात प्रधानमंत्री ने औद्योगिक अनुसंधान परिशद के 70 वें स्थापना दिवस के मौके पर कही। यही वह समय है जब मनमोहन सिंह द्वारा देश में उदारवादी नीतियां अपनाई गईं और शिक्षा का बड़े पैमाने पर निजीकरण हुआ। जाहिर है यही वे नीतियां हैं जिनके कारण देश विज्ञान के क्षेत्र में तो पिछड़ ही रहा है, आर्थिक विषमता भी बड़ रही है। ये हालात कालांतर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति छात्रों की उत्सुकता और गुणवत्ता में गिरावट लाएंगे। ऐसे हालात में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत 20 साल पहले की स्थिति बहाल कर ले।

? प्रमोद भार्गव


गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में विश्वविद्यालय असफल?

       अभी हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री जी ने अफसोस जताया है कि देश से विश्वस्तरीय वैज्ञानिक नहीं निकल रहें है।वास्तव में इस मुद्दे पर चिंतन की जरूरत है। लेकिनइसके पहले देश में वैज्ञानिक तैयार करने वाले शिक्षण संस्थानों यानि उच्चशिक्षण संस्थानों अर्थात विश्वविद्यालयों के हालात पर भी चिंतन की जरूरत है। इस संदर्भ में हम विदेशी रेंटिंग संस्थाओं की बात करें तो दुनिया के स्तरीय दो सौ विश्वविद्यालयों में किसी भी भारतीय विवि का नाम शामिल नहीं हैं। अगर हम हमारे देश के ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा की बात मानें जो अक्सर कहते हैं कि कम से कम 90 फीसदी भारतीय विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षा मुहैया नहीं करा पा रहा हैं, तो इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि उच्चशिक्षा के मामले हम किस पायदान पर है?

? डॉ. सुनील शर्मा


  8 अक्टूबर-2012

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