संस्करण: 08 दिसम्बर- 2014

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किसके अच्छे दिन आये?

       ऐसा नहीं कहा जा सकता कि देश में सरकार बदलने के बाद अच्छे दिन नहीं आये। बस फर्क इतना है कि सबके नहीं आये और जिनसे वादा किया गया था उनके नहीं आये। आइए देखें कि अच्छे दिन किन किन के आये। 

? वीरेन्द्र जैन


अपनी हर बात को किसी किस्से में बदलकर जनता को मुख्य मुद्दे से दूर ले जाते हैं महान कहानीकार मोदी

        कोनॉमिक टाइम्स में एक हिसाब छपा है कि वह पांच महीनों में 31 दिन विदेश यात्राओं पर रहे, आठ देशों की यात्राएं की। विपक्षी दल आलोचना कर रहे थे कि यह एनआरआई प्रधानमंत्री हैं। सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक में मोदी के विदेश दौरों की आलोचना और चुटकियां ली जा रही थीं! ऐसे कि विदेशों में भी पीएमओ का एक्सटेंशन काउंटर खुल जाएगा।

? प्रेम प्रकाश


भाषा में झलकती सोच

     केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा के कुछ नेता और मंत्रियों ने इस साल कुछ ऐसे बयान दिए हैं जिन्हें किसी भी लिहाज से मर्यादित नहीं कहा जा सकता है। हद तो यह हो गई कि हाल ही में केंद्रीय सरकार में मंत्री बनाए गए दो मंत्रियों ने भी मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघी हैं। सरकार में राज्य मंत्री गिरिराज सिंह की जुबान भी इस बार कुछ ज्यादा ही फिसली। इससे पहले भी लोकसभा चुनावों के दौरान वो काफी कुछ बोल चुके हैं। इस बार गिरिराज ने आप नेता अरविंद केजरीवाल को मायावी राक्षस तक बता डाला।

 ? विवेकानंद


बर्द्धवान धमाके का सच क्या है श्रीमान?

      क्टूबर 2014 में पश्चिम बंगाल के बर्द्धवान जिले में हुए कथित आतंकी धमाके, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी, के बारे में जिस तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर धमाके करवाने का आरोप लगाया है वह गंभीर है। ममता बनर्जी का यह कहना कि पश्चिम बंगाल में दंगे करवाने के लिए केंद्र ने ही बर्द्धवान धमाका करवाया, से साफ हो चुका है कि देश में आतंकवाद की पूरी समस्या वोटों की राजनैतिक गोलबंदी का एक हथियार मात्र है और इसे राजनैतिक वजहों से ही जिंदा रखा जा रहा है।

? हरे राम मिश्र


महानता का इलहाम हममें से जडबुद्धि कौन नहीं है

           र्ष 2008 में हिस्टरी न्यूज नेटवर्क के प्रमुख सम्पादक रिक शेंकमन की एक किताब सूर्खियों में आयी थी जिसका शीर्षक था हाउ स्टुपिड वी आर अर्थात हम कितने जडबुद्धि हैं। किताब में अमेरिकी मतदाताओं की इस आधार पर पड़ताल की गयी थी कि वह किस तरह अन्तरराष्टीय घटनाओं से अनभिज्ञ रहते हैं, इस बात को भी नहीं जानते कि किस तरह उनकी सरकार चलती है, इसके बावजूद किस तरह सरकारी पोजिशन्स एवं नीतियों को चुपचाप स्वीकारते है, और किस तरह वह घिसीपीटी धारणाओं, सरलीकत समाधानों, अतार्किक डरों का शिकार होते हैं।

  ?  सुभाष गाताड़े


अलीगढ़ विश्वविद्यालय, राजा महेन्द्र प्रताप और धु्रवीकरण के प्रयास

         सांप्रदायिक राजनीति के झंडाबरदारों को न केवल धार्मिक आधार धु्रवीकरण करवाने की कला में महारत हासिल है वरन् वे इसके नए-नए तरीके भी ईजाद करते रहते हैं। मुजफरनगर में इसके लिए लव जिहाद का इस्तेमाल किया गया तो अलीगढ़ में अतुलनीय गुणों के धनी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नाम का उपयोग इसी उद्देश्य से किया जा रहा है।

? राम पुनियानी


संघ का इरादा 2025 तक भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है

      मारा (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) मुख्य उद्देष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है। इस अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हम विभिन्न रणनीतियां बना रहे हैं। हमारा एक और उद्देष्य कुछ चुनिंदा लोगों का तुष्टीकरण बंद करवाना भी है।

? एल.एस.हरदेनिया


यह डील लोकतंत्र के खिलाफ है

     से देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अशुभ ही कहा जाएगा कि महज 31 प्रतिशत मतदाताओं का वोट पाकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार, पूरे भारतीय लोकतंत्र को विदेशी कारपोरेट कंपनियों के हवाले करने में तेजी से जुटी हुई है। मोदी सरकार में सत्ता संतुलन पूरी तरह से श्रमिक और जन विरोधी शक्तियों यानी बाजार और वैष्विक आवारा पूंजी के पक्ष में जा चुका है। देश के कानूनी ढांचे मे जो भी बातें पूंजी, कारपोरेट घरानों और बाजार की निरंकुशता की राह में रुकावट बनती थीं, अब उन्हें एक-एक करके हटवाया जा रहा है।

 

? रीना मिश्रा


राजनैतिक सत्ता और खुफिया एजेंसियों की सांप्रदायिकता

        न दिनों देश में आंतरिक सुरक्षा सम्बंधी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इनका मुकाबला करने के लिए विषेश पुलिस बलों और जांच एजेंसियों का गठन भले किया गया है, उन्हें बेहतर प्रशिक्षण दिया गया है, आधुनिक हथियारों से लैस किया गया है और पहले से कई गुना अधिक धन भी आवंटित किया गया है। लेकिन अफसोस कि ऐसा वातावरण निर्मित नही हो सका जिससे आम आदमी अपने को पहले से ज़्यादा सुरक्षित महसूस करता।

? शरद जायसवाल


उच्च शिक्षण संस्थानों के निम्नस्तरीय हथकन्डे

      देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में व्याप्त स्तरहीनता और कौशलविहीन पढ़ाई-लिखाई पर उच्च न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई बार सख्त टिप्पणिया कर चुका है लेकिन यह सिलसिला थम नहीं रहा है। लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को उचित शिक्षा नहीं मिल रही है और हाल ही में
प्रधानमन्त्री ने भी स्वीकार किया है कि देश में आवश्यकता के अनुरुप योग्य छात्रों की कमी है।

? सुनील अमर


धान उत्पादक किसानों के बुरे दिन ?

        राजु पचौरी ने लगातार तीन साल से मानसुन की बेरूखी से बर्बाद होती सोयाबीन की फसल को छोड़ इस साल धान की खेती शुरू की थी, उन्हें मालूम था कि धान सोयाबीन के मुकाबले प्राकृतिक प्रकोप को आसानी से सह लेता है और अच्छे दाम पर खरीददार भी मिल जाते है। सो तीन सत्रों से नुकसान खाए राजु पचैरी ने इस साल पूसा बासमती धान की खेती करने का फैसला किया लेकिन फैसला उल्टा पड़ गया, राजू ने मानसूनी बेरूखी से तो पार पा लिया लेकिन अब तैयार फसल मण्डी में पड़ी हुई है जिसका कोई खरीददार नहीं है।

? डा. सुनील शर्मा


भारतीय युवाओं पर आईएसआईएस की नजर

      कुछ महीने पहले ही एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने इस बात का खुलासा किया था कि मुंबई के चार लड़के ईराक के आतंकवादी संगठन आईएसआईएस में शामिल हो गए हैं और ये युवा वहां चल रही लड़ाई में आईएसआईएस का साथ देकर हिंसक गतिविधियों में लिप्त हैं। ये चारों युवा धार्मिक यात्रा के लिए इराक गए थे और आईएसआईएस से प्रभावित होकर संगठन में शामिल हो गए हैं।

? सुनील तिवारी


10 दिसम्बर: विश्व मानवाधिकार दिवस पर विशेष
मुद्दा: मानव अधिकारों के हनन का

        ज मानव अधिकार सम्पूर्ण विश्व की एक आधारभूत आवश्यकता है। मानव अधिकारों के अभाव में समूची मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को जिन मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की गई, उन्हें समस्त विश्व के नागरिकों के अधिकारों एवं स्वतंत्रता की दिशा में प्रभावी माना गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने घोषणा पत्र में जो मानव अधिकार घोषित किए, वे ही भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के रूप में नागरिकों को प्रदान किए गए हैं।

? डा. गीता गुप्त


  08 दिसम्बर- 2014

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