संस्करण: 08 अगस्त- 2011

 पानी पंजाब का, रोगी राजस्थान के

? डॉ. महेश परिमल

               नदियाँ दिलों को जोड़ती हैं, नदियाँ दो संस्कृतियों का मेल कराती हैं, नदियाँ परस्पर भाईचारा बढ़ाती हैं, नदियाँ देश की जीवन रेखा होती हैं,इन तमाम जुमलों से हटकर यदि यह कहा जाए कि नदियाँ दूसरे राज्यों के लोगों को बीमारी बनाती हैं, उन्हें कैंसर की बीमारी देती हैं, लोगों को मौत के मुहाने तक पहुँचाती हैं, तो अतिशयोक्ति न होगी । आपका सोचना सही है कि नदियों के बारे में ऐसा कहना उचित नहीं है। पर सच यही है कि पंजाब की दो नदियाँ सतलुज और व्यास के पानी से पंजाब के लोगों को जो नुकसान हो रहा है,वह तो हो ही रहा है,पर उससे सुदूर राजस्थान के कई गाँवों के लोग कैंसरग्रस्त हो रहे हैं, बीमार पड़ रहे हैं, कई लोग मौत के मुहाने तक पहँच गए हैं। ये नदियाँ भले ही पंजाब में पूजनीय हों, पर गंगा की तरह ये भी देश की प्रदूषित नदियों में शामिल हो गई हैं। भविष्य में ये नदियाँ पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होंगी। यह तय है,पर देश के नेताओं में इतनी दूरदर्शिता कहाँ, जो इस खतरे को भाँप सके।

               राजस्थान के हनुमानगढ़, गंगानगर, सूरतगढ़ आदि जिलों में पिछले कुछ वर्षों से चर्मरोग, हेपेटाइटिस बी और कैंसर के मामलों में तेजी आई। अचानक इन रोगों के बढने का कारण वहाँ के डॉक्टर भी समझ नहीं पाए। मामला लगातार पेचीदा होते जा रहा था। अचानक हनुमानगढ़ के एक जाग्रत वकील ने स्थानीय वैज्ञानिकों की मदद से जाँच की, तो पता चला कि यह रोग केवल उन्हें ही है, जो पेयजल के लिए नदी का पानी इस्तेमाल करते हैं। वकील ने पहले तो स्थानीय लोक अदालत में अर्जी की। उसके बाद यह पता लगाया कि आखिर इन नदियों का पानी कहाँ से और किस नदी से आ रहा है। तब पता चला कि ये पंजाब की सतलुज और व्यास नदियों का पानी है। ये दोनों नदियाँ पंजाब की सबसे अधिक प्रदूषित नदियाँ हैं। जब पंजाब में इन नदियों के प्रदूषण के बारे में पता लगाया गया, तो यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ तो पहले से ही बाबा सीचवाल यानी बलवीर सिंह सीचवाल ने आंदोलन चलाया हुआ है। उनकी दलील है कि सतलुज और व्यास ये दो ऐसी नदियाँ हैं,जिसका पानी इतना अधिक प्रदूषित हो चुका है कि इसके सेवन से कैंसर जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं। ये नदियाँ दक्षिण पंजाब के सैकड़ों ग्रामीणों को रोगग्रस्त कर इंदिरा केनाल से मिलकर दो हजार किलोमीटर दूर राजस्थान पहँच जाती हैं और वहाँ के लोगों को कई बीमारियों से ग्रस्त कर रही हैं। बाबा सीचवाल ने इस खतरे को पहले ही भाँप लिया और उन्होंने इन नदियों के प्रदूषित पानी के खिलाफ एक मुहिम ही छेड़ दी। पहले तो पंजाब सरकार ने इसे हल्के से लिया, पर जब बाबा के समर्थकों की संख्या लगातार बढने लगी, लोग उनकी एक आवाज पर सड़कों पर उतरने लगे, तब सरकार ने बाबा की माँगों पर विचार करना शुरू किया।

               इन दो नदियों का पानी प्रदूषित कैसे हुआ, यह जानने के लिए इन नदियों के तटीय इलाकों पर नजर डाली जाए, तो पता चलता है कि पंजाब के कई इलाकों में चमड़ा पकाने के कारखाने इन नदियों के किनारे ही स्थित हैं, यही नहीं,चिकित्सकीय क्षेत्र में काम आने वाले कई सर्जिकल चीजें भी यहीं बनती हैं,इन कारखानों का गंदा पानी इन नदियों में ही मिलता है। यही नहीं काला सिंघानिया नामक डे्रनेज लाइन द्वारा भी जहरीला पानी इन नदियों में मिलता है। स्थानीय लोगों ने कई बार विभिन्न माध्यमों से शिकायत की,पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तब बाबा सीचवाल सामने आए, उन्होंने इस मुद्दे को लेकर लोक आंदोलन शुरू किया। उनकी एक आवाज पर जब 20 से 25 हजार लोग उमड़ पड़े, तब सरकार का ध्यान उनकी ओर गया।  स्थानीय प्रशासन चौंक उठा। प्रदूषण से लोग इतने अधिक हलाकान हो सकते हैं,यह तो किसी ने नहीं सोचा था। प्रशासन कुछ करता,इसके पहले ही बाबा के समर्थक सैंकड़ों बोरी रेत काला सिंघानिया नाले पर डालकर उसे चोक कर चुके थे। प्रशासन ने जब देखा कि न केवल जालंधर बल्कि सुदूर राजस्थान के लोग इस आंदोलन से जुडने लगे हैं, तब सरकार की ऑंखें खुल गई।

               बाबा ने अपने समर्थकों समेत सतलुज-व्यास के पानी का नमूना संग्रहित किया। गटर के पानी से प्रदूषित इस नमूने से इतनी अधिक दुर्गंध आ रही थी कि माथा ही फट जाए। पानी का रंग लाल और नीला था। इस पानी के सेवन से कई गंभीर बीमारियाँ हो सकती है, यह निष्कर्ष एनजीओ के माध्यम से जल विशेषज्ञों ने डॉक्टरों की मदद से निकाला। पंजाब और राजस्थान के करीब 100ग्रामों से कैंसर के अनेक मामले सामने आए। जब यह जानकारी लोकअदालत के सामने आई, तो अदालत नाराज हो गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि जब बाबा सीचवाल ने देखा कि सच का सामने लाने वाले अण्णा हजारे और बाबा रामदेव का क्या हश्र हुआ। तो उन्होंने अपने आंदोलन को राजनीतिज्ञों से दूर रखा। दोनों प्रमुख दल तैयार बैठे हैं कि बाबा उन्हें अपने आंदोलन में शामिल कर ले। अगले साल पंजाब विधानसभा के चुनाव हैं, इसलिए ये पार्टियों अभी से अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने में लगी हैं। अभी तो पाला बाबा के हाथ में है, पर उनका आंदोलन यदि राजनीति की भेंट चढ़ गया, तो संभव है, उनका भी हश्र बाबा रामदेव और अण्णा हजारे की तरह ही हो।

जाते-जाते यह भी बता दें कि बाबा सीचवाल 2008 में अमेरिकी पत्रिका टाइम के हीरोज ऑफ द एनवायरमेंट की सूची में स्थान प्राप्त किया है। वे पिछले दस वर्षों से पंजाब की नदियों में तमाम उद्योगों द्वारा मिलाए जाने वाले रासायनिक और जहरीले रसायनों के खिलाफ अकेले ही संघर्ष जारी रखे हुए हैं। जब उन्होंने ड्रेनेज पाइप लाइन को चोक करने का काम किया, तो उद्योगपतियों ने उनके खिलाफ ही आंदोलन चला दिया है। विधानसभा चुनावों में अभी एक साल की देर है, पर राजनैतिक गर्माहट अभी से शुरू हो गई है। राजनीति चाहे कुछ भी हो, पर सच तो यह है कि यदि दो नदियों का पानी प्रदूषित होकर सुदूर राजस्थान के सैंकड़ों लोगों को बीमार कर रहा है, तो मामला दो राज्यों का हो जाता है। दोनों ही राज्य यदि इस दिशा में मिलकर काम करें, तो निश्चित रूप से कोई न कोई ऐसा समाधान तो सामने आएगा, जिससे दोनों राज्यों को लाभ मिले। इसके लिए आवश्यकता है ईमानदारान कोशिश की, बस........।


? डॉ. महेश परिमल