संस्करण: 08 अगस्त- 2011

उच्चशिक्षा में प्रस्तावित सुधारों की कार्यरूप मे परिणिति आवश्यक

? डॉ. सुनील शर्मा

                 देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में आज लगभग 1.6करोड़ विद्यार्थी पढ़ रहें हैं। तथा वर्तमान के उच्च शिक्षा में 10 फीसदी नामांकन को वर्ष 2012 तक 15 फीसदी तक तथा वर्ष 2020 तक 30 फीसदी होने पर यह संख्या4.5   करोड़ होने की संभावना है। इस समय देश में उच्च शिक्षा पर करीब 46200 करोड़ रूपये खर्च होतें है,जिसके 2020 तक 2,32,500 करोड़ रूपये होने की संभावना है। इस राशि का दो तिहाई भाग निजी क्षेत्र से तथा एक तिहाई भाग सरकार से आता है। हमारे देश में उच्चशिक्षा व्यवस्था का संचालन केन्द्र सरकार,राज्य सरकारें और नौ नियामक संस्थाएॅ मिलकर करती हैं। जिन्हें देश के 527 विश्वविद्यालयों और 26000 कालेजों को नियमित करना होता है। वर्ष 2020 तक उच्च शिक्षा में नामांकन अनुपात 30 फीसदी होने पर लगभग 1000 नये विवि तथा 25000अतिरिक्त महाविद्यालयों की आवश्यकता पड़ने वाली है। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों और शिक्षा संस्थानों का नियमन और संचालन बहुत ही कठिन सिद्व होने वाला है,क्योंकि आज की स्थितियों में ही हमारी उच्चशिक्षा का ढॉचा पूरी तरह से चरमराया हुआ है। संसाधन हीन विश्वविद्यालय सिर्फ कागज पर डिग्री बॉटने का काम कर रहें हैं। फर्जी शिक्षा संस्थानों की भारी भीड़ है और वो धड़ल्ले से शिक्षा का व्यापार कर रहें हैं। समुचित आर्थिक संसाधन न जुटा पाने के कारण राज्य सरकारें निजी क्षेत्र को लगातार उच्च,तकनीकि और व्यावसायिक शिक्षा में विस्तार की अनुमति दे रहीं हैं। लेकिन यह निजी क्षेत्र लोक कल्याण और नोप्राफिट के सिद्वांत पर काम करता हो ऐसा नहीं हैं। बल्कि इनमें एक बड़ा वर्ग विशुद्व व्यावसायिक उद्देश्य से काम कर रहा है। देश भर में बड़े कार्पोरेट घराने इस क्षेत्र में उतर चुके है।तथा निजी विवि और महाविद्यालय प्रारम्भ करने की राह में निजी कार्पोरेट घरानो की कतार लम्बी होती जा रही है। क्योंकि इन कार्पोरेट घराने का लक्ष्य उच्चशिक्षा के से क्षेत्र को भी व्यापार की भॉति लाभ कमाना है। ये सिर्फ इस गणित पर काम करने उत्सुक हैं कि अब हर युवा उच्चशिक्षा की चाहत रखता है और सरकारी शिक्षा संस्थानों से परेशान होकर उनके दरवाजे पर आएगा ही जिसे अपने इस नवीन शिक्षा के उपक्रम में कच्चा माल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

               हमारे सरकारी उच्चशिक्षा संस्थानों की संसाधन हीनता तथा बढ़ती अराजक स्थिति जैसे शिक्षक,कर्मचारी और छात्रों की लगातार बढ़ती हड़तालें,राजनैतिक दखलंदाजी और शिक्षा सत्रों की लेटलतीफी ने निजी क्षेत्र को  इस क्षेत्र में घुसपैठ का सुनहरा अवसर दिया हैं। लेकिन इससे उच्चशिक्षा अत्याधिक मंहगी होती जा रही है। जिससे आम छात्र वर्ष 2020 में उच्चशिक्षा संस्थानों की दहलीज पर पैर भी नहीं रख पाएगा तथा सकल नामांकन अनुपात को 30 फीसदी पहुॅचनें का लक्ष्य सिर्फ स्वप्न बनकर रह जाएगा,इसके साथ ही हम ज्ञान आधारित व्यवस्था के दौर में ज्ञान से समृद्वि की राह में पीछे ही रहेंगें। वास्तव में उच्चशिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए सरकार को काफी काम करना होगा जिसमें नए संस्थानों की स्थापना से लेकर संसाधनों का जुना तथा निजी क्षेत्र की लूट को नियंत्रित करना प्रमुख हैं।

              इस संदर्भ में वर्ष 2009 में यूपीए सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभालने के बाद कपिल सिब्बल ने एक के बाद एक घोषणाएॅ करके यह उम्मीद जगाई थी कि उच्चशिक्षा में व्यापक परिवर्तन होने वाले हैं। इसके लिए अब तक कपिल सिब्बल नौ नए विधेयक लाने की घोषणा कर चुकें हैं। इनमें से ज्यादातर को केन्द्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति भी मिल चुकी है,किंतु इन बिलों को संसद में पारित कराने में मुश्किलें आ रहीं हैं। 3मई,2010को संसद में जिन चार विधेयकों को पेश किया था वें हैं विदेशी शैक्षिणिक संस्थान बिल-2010,तकनीकि-मेडिकल संस्थानों व विवि में अनुचित तरीकों के निषेध से संबंधित बिल,शैक्षिणिक ट्रिब्यूनल बिल और नेशनल एक्रिडिटेशन रेगुलेटरी अथारिटी बिल ।इनमें से पहले तीन विधेयकों को मानव संसाधन मंत्रालय की स्थाई समिति को विचारार्थ भेजा गया था। समिति अभी इन पर शिक्षाविदो से चर्चा कर रही है। चौथे बिल शैक्षिणिक ट्रिब्यूनल को 2010 में लोकसभा में पारित कर दिया था लेकिन राज्यसभा से वापिस लेना पड़ा। मानव संसाधन विकास द्वारा प्रस्तावित ये नौ बिल और प्रस्तावित कार्य योजनाएॅ उच्चशिक्षा के बुनियादी परिवर्तन में मददगार सिद्व होने वाली है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित बिलों के प्रावधनों के गहराई से अध्ययन करने पर इनमें उच्चशिक्षा के लिए जरूरी स्वायत्तता,जवाबदेही और प्रयोगधर्मिता की झलक उजागर होती है।कुछ विशेषज्ञ एनसीएचईआर की स्थापना के जरिए केन्द्रीकरण बढ़ने की आशंका व्यक्त कर रहें है।लेकिन एमसीआई,एनसीटीई सहित राष्ट्रीय स्तर की एक दर्जन नियामक संस्थाओं जिस तरह भारी भ्रष्टाचार और दिशाहीनता व्याप्त है,इससे ये अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। तथा इनके स्थान पर एनसीएचईआर का विचार कहीं से भी अप्रासांगिक नहीं है। केन्द्र सरकार का सारे देश के बच्चों के लिए एक साथ कामन मेडिकल और कामन इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा आयोजित कराने का विचार भी सुखद है।  वास्तव में उच्चशिक्षा की चुनौतियों और लक्ष्यों की प्राप्ति तथा देश के हर छात्र को उच्चशिक्षा की राह आसान बनें इस लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित विधेयक और योजनाओं की कार्यरूप मे परिणिति आवश्यक है।


? डॉ. सुनील शर्मा