संस्करण: 08 अगस्त- 2011

 

 

वाकई सबसे अलग दल है भाजपा

 

 

 

 

 

? महेश बाग़ी

               भारतीय जनता पार्टी खुद को अन्य राजनीतिक दलों से अलग मानती है और यह सच भी है। कर्नाटक में हुए घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भाजपा सभी राजनीतिक दलों से अलग है। इस दल में अनुशासन की दुहाई तो दी जाती है,मगर उसका पालन नहीं किया जाता। कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटाए गए येदियुरप्पा इसके जीवंत प्रमाण हैं। एक समय था,जब आरोप लगते ही मंत्री-मुख्यमंत्री त्यागपत्र दे देते थे,मगर अब आरोप साबित होने के बाद भी वे कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं। लोकायुक्त जांच में जब यह सिध्द हो गया कि येदियुरप्पा खनन घोटाले में दोषी हैं,तब पार्टी ने उन पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया। भारी मशक्कत के बाद वे इस्तीफ़ा देने को राज़ी भी हुए तो यह शर्त थोपने लगे कि अगला मुख्यमंत्री उनकी पसंद का होगा। पार्टी इसके लिए तैयार नहीं हुई,तो उन्होंने आपा खो दिया। येदि ने भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष का लेपटॉप तो तोड़ा ही, एक मंत्री को तमाचा भी जड़ दिया।

               इस घटनाक्रम से यह साफ़ हो जाता है कि भाजपा में सत्ता के प्रति मोह किस कदर बढ़ गया है। कोई मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाए तो भी वह चाहता है कि उसका उत्तराधिकारी उसी का मोहरा हो। इसके लिए अनुशासन को ताक में रख देने से भी उन्हें परहेज़ नहीं है। सच पूछा जाए तो इस सबके लिए भाजपा आलाकमान दोषी है। जब येदियुरप्पा पर खनन घोटाले का आरोप लगा था, तभी से उन्हें चलता कर दिया जाना चाहिए था। किंतु ऐसा करने की बजाय पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी उनकी पैरवी करते रहे। इससे आम जनता में यह संदेश गया कि येदि के भ्रष्टाचार की कमाई का कुछ अंश राष्ट्रीय अध्यक्ष तक गया। अब जबकि लोकायुक्त ने इस भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर दिया है तो गडकरी को अपने सुर  बदलने को मजबूर होना पड़ा। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी पार्टी पदों पर भ्रष्टाचारियों को प्रतिष्ठित होते देखते रहे और अब गडकरी भी उन्हीं का अनुसरण कर रहे हैं। संघ की चाल और भाजपा का चरित्र लोकतंत्र के चेहरे का पर्दा बन गया है।

               ऐसे में यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि भाजपा अब एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि अपरधियों का गिरोह है। इसका प्रमाण है पिछले सालों में भाजपा की केन्द्रीय समिति संसदीय कार्यसमिति या अन्य राष्ट्रीय बैठके, जिनमे ंपार्टी के नेताओं के भ्रष्टाचार के मुद्दे ही छाए रहे। पूरा सत्र बीत जाने के बाद भी ये मुद्दे यथावत बने रहते हैं। आम जनता की तकलीफों से उसका कोई सरोकार नहीं रह गया है। संघ ने शीर्ष का अहंकार भोगा और भाजपा शीर्ष व्यापारी पार्टी बन गई। स्थिति यह है कि भाजपा के लोग ही अब पार्टी नेतृत्व को भ्रष्टाचारी और कुशासक बता रहे हैं। कर्नाटक प्रसंग का हास्यास्पद पहलू यह है कि लोकायुक्त रिपोर्ट आते ही पार्टी आलाकमान ने येदियुरप्पा पर दबाव बनाकर इस्तीफा ले लिया। पार्टी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि येदियुरप्पा ने लोकायुक्त को दिए बयान में क्या कहा था। वास्तविकता यह है कि लोकायुक्त ने प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से येदियुरप्पा का बयान लेने की ज़रूरत ही महसूस नहीं की,क्योंकि भ्रष्टाचार आईने की तरफ साफ़-साफ़ दिख रहा था। एक तथ्य यह भी है कि लोकायुक्त की नियुक्ति भाजपा ने नहीं की थी वरना येदियुरप्पा का कुछ नहीं बिगड़ता। यदि ऐसा होता तो मध्यप्रदेश के पूर्व लोकायुक्त नावलेकर की तरह वे भी ग़लत रिपोर्ट बना कर राजभवन भेज देते। येदियुरप्पा को हटा कर भाजपा ने यह मान लिया है कि जिसका भ्रष्टाचार, उजागर हो जाए, वह भ्रष्ट है। बाकी सभी साहूकार हैं।

               सवाल यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय तक जो भाजपा संतुलित थी, उसमें अब भ्रष्ट चेहरों पर पड़े नकाब क्यों उघड़ते जा रहे हैं ? बदनामी झेलने के बाद भी पार्टी नेता पदों पर क्यों काबिज हैं ? क्या भाजपा के संगठन सूत्र कुछ हाथों में सिमट कर रह गए हैं ? आज जिस नेता को आलाकमान का आश्रय प्राप्त है, वह न सिर्फ़ निरंकुश, बल्कि भ्रष्ट और हत्यारे तक हैं। सत्ता की मधान्ता में ऐसे नेता सुरा-सुंदरियों के मोह में डूबे हैं। शीर्ष नेतृत्व द्वारा पोषित ऐसे नेता भिंडरावाला,बाल ठाकरे और दाऊद इब्राहीम की तरह दिखाई दे रहे हैं। यही हाल इनमें मुंह लगे  नौकरशाहों का है, जो अपनी मुख़ालफत होने पर किसी अखबार मालिक के मॉल को डायनामाइट से उड़ाने में भी नहीं हिचकते हैं। भाजपा में अब मुख्यमंत्री बदलते ही उसकी भाषा शैली भी बदल जाती है। भाजपायी फरार रहते हुए चुनाव लड़ते हैं और जीत भी जाती हैं। लोकतंत्र में रह कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को धता बताने वाले ऐसे नेताओं के प्रति शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी आश्चर्यजनक है। मुख्यमंत्री भी ऐसे तत्वों की अनदेखी करते हैं। यह पार्टी में जारी 'भितरघात का जीता-जागता प्रमाण है।'

               भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा कर सत्ता हासिल की। फिर सत्ता में आने के बाद एक भी कांग्रेसी नेता पर कोई मुक़दमा दर्ज क्यों नहीं किया गया ?इसका जवाब यही है कि भाजपायी ख़ुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। भाजपा नेताओं-मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के ढेरों मामले सामने आने के बावजूद एक के भी खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई। दूसरे शब्दों में भ्रष्टों का संरक्षण किया गया। कर्नाटक-प्रसंग से यह सिध्द हो गया है कि भाजपा का चाल,चरित्र और चेहरे का नारा वास्तव में क्या है। पार्टी विद डिफरेंट का राग अलापने वाली भाजपा वास्तव में अन्य दलों ने अलग है, जहां पकड़े गए को चोर और शेष को साहूकार माना जाता है।

 
? महेश बाग़ी