संस्करण: 08 अगस्त- 2011

15 अगस्त स्वाधीनता पर विशेष राष्ट्रीय पर्व और हमारी आशाएं

? डॉ. गीता गुप्त

               स्वाधीनता दिवस की इस वर्षगांठ पर स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेश का गाया गीत-'ऐ मेरे वतन के लोगों....' अनायास ही स्मरण हो आया है, जिसने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तक की आंखें नम कर दी थी। सचमुच,कैसी विडंबना है। अपनी आजादी का जश्न मनाते समय ऐसे मर्मस्पर्शी गीत सुनकर आज हमारा हृदय द्रवित नहीं होता। हम अपने इतिहास को स्मरण कर 'स्वाधीनता' का विश्लेषण नहीं करते। 'स्वतंत्रता' के सही अर्थ-बोध का तो दावा ही नहीं कर सकते क्योंकि 'स्वतंत्रता' के नाम पर जिस आचरण को हमने अपना लिया वह लज्जास्पद है। तनिक सोचिए, क्या 'स्वाधीनता' के 64 वर्षों की लम्बी यात्रा के बावजूद 'स्वराज्य' में प्रगति की गाड़ी विकास के वांछनीय सोपानों को तय कर सकी ?हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने लहू से जिस आज़ादी की गौरव-गाथा लिखी? उसके आगे हम क्या कोई स्वर्णिम अध्याय रच पाने में सफल हुए ? देशभक्ति से परिपूर्ण गीतों में जो स्वाभिमान, ओज और भारत का स्वरूप संजोया गया है, आज वह कहां दिखाई देता है ?

               राष्ट्रीय पर्व वस्तुत: देश की प्रगति का लेखा-जोखा या मूल्यांकन करने का अवसर होना चाहिए। लेकिन आज यह ध्वजारोहण की औपचारिकता और मौज-मस्ती के रूप में छुट्टी मनाने का निमित्त मात्र रह गया है। इसे जनता का दुर्भाग्य कहें या देश का ? स्वाधीनता की लड़ाई के केन्द्र में की जाने वाली राजनीति देश के लिए थी, मगर आज वह सिर्फ़ सत्ता के लिए है, देश हाशिए पर डाल दिया गया। नेताओं के आचरण से यह भली-भांति साबित हो चुका है। साम-दाम-दंड-भेद से या येन-केन-प्रकारेण सत्ता-सुख भोगते रहना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य रह गया है। वर्तमान राष्ट्र के नेताओं का चरित्र हृदय को छलनी करता है। ऐसे में देश का भविष्य क्या होगा ? गांधी, नेहरू,सरदार पटेल, तिलक, चन्द्रशेखर आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. राधाकृष्णन जैसे अनेक नेता इस धरती पर हुए, जो देश के लिए ही जिये और देश के लिये ही मरे। लेकिन अब ऐसे राजनेता कहां हैं जिनकी कथनी और करनी में अंतर न हो ?तब जनता किससे अपेक्षा करें ? किसे अपना और देश का हित-चिंतक माने ? निश्चय ही हमें इन ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर तलाशने होंगे।

               चारों तरफ व्याप्त भ्रष्टाचार, हिंसा, अपराध, अराजकता और सामाजिक सांस्कृतिक प्रदूषण के कारण यह तो तय है कि अभी एक और क्रांति की आवश्यकता है, जो भारतीयों के हृदय में पुन: राष्ट्रीय चेतना और सच्ची देशभक्ति जगा सके। आज, भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे विषयों पर संकीर्ण राजनीति की कतई दरकार नहीं है लेकिन राजनेता उन्नति के नाम पर देश को कई खंडों ने बांटकर अपना स्वार्थ साधने में व्यस्त हैं। यह नाटक कब तक चलता रहेगा ? एक न एक दिन पटाक्षेप होगा ही। जन आंदोलन से ही परिवर्तन की वह लहर आएगी जिसकी इस देश को प्रतीक्षा है।

               हमारे स्वतंत्रता-सेनानियों ने एक संवेदनशील राष्ट्र का सपना देखा था। जहां सुख-समृध्दि की गंगा हर घर-द्वार से प्रवाहित हो और सचमुच रामराज्य की स्थापना हो सके। जिसके नागरिक सच्चे इंसान हो,जिनमें स्वाभिमान, मानवता और संवेदना हो, जो अपने सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों को महत्व दें एवं तदनुकूल आचरण करें। किंतु ऐसा हो नहीं पाया। राष्ट्र स्वतंत्र हुआ लेकिन स्वतंत्र भारत के राजनेता अपना 'राष्ट्र-धर्म' भूल गए। चलिए, राजनेताओं को छोड़ दे, पर क्या समाजशास्त्रियों, चिंतकों, शिक्षकों, धार्म के ठेकेदारों, बुध्दिजीवियों और हम-आप नागरिकों ने अपने अपने धर्म(कर्तव्य) का पालन किया ? यदि किया होता तो निस्संदेह, आज हम विश्व का अग्रणी राष्ट्र बन चुके होते। पर सच यही है कि हम आज तक विकासशील राष्ट्र हैं, विकसित नहीं।

               यह शोचनीय है कि आखिर समाज में इतनी विसंगतियां क्यों पनपती चली गईं कि उनके निराकरण हेतु अपार धन-जन और ऊर्जा खपाने के बावजूद सफलता नहीं मिल पा रही है और सामाजिक ताना-बाना ही विश्रृंखल होने का खतरा मंडरा रहा है ?क्यों धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता हावी होती जा रही है ?क्यों जीवन में नैतिकता अप्रासंगिक होती जा रही है ?क्यों हम सभी प्रश्नों के उत्तर की प्रत्याशा कानून से करने लगे हैं ?जबकि कानून की पेचीदगियां अक्सर ज्वलंत प्रश्नों को भी अनुत्तरित छोड़देती हैं,वे हमारी राह आसान नहीं करती,न सामाजिक विसंगतियों का स्थायी समाधान सुझा सकती हैं। दरअसल जब हमारे हृदयों में सच्चे देशराग की लहर जगेगी तभी हम अपने 'राष्ट्र धर्म' के निर्वाह हेतु कटिबध्द होंगे। विलंब से ही सही, समाज में चेतना की एक नयी लहर जगी तो है जो देश में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है।

               अब भी समय है। हम सोचें कि हमारा जीवन देश के लिए हो। हमारी शिक्षा, हमारी प्रगति, हमारी समृध्दि-सब कुछ देश की उन्नति के लिए हो, क्योंकि देश हमारी पहचान है। हमारी भाषा, संस्कृति, स्वदेशाभिमान विश्व के लिए आदर्श बन सके, हमें नये सिरे से ऐसा प्रयास करना होगा। हमारे चारों ओर पाखण्ड का जो जाल फैलता जा रहा है, उसे विवेक से काटना होगा। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति,व्यक्तिगत सोच,धार्मिक संकीर्णता और पूर्णत:मूल्यहीन व्यावसायिक शिक्षा के मोहजाल से निकलकर राष्ट्र के हित-चिंतन की परपंरा पुनर्जीवित और विकसित करनी होगी। तभी हम अपने देश के भीतर और बाहर के शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकेंगे। हमारी 'स्वाधीनता' और 'स्वतंत्रता' की परिभाषा भी तभी सार्थक रूप से प्रतिफलित होगी। इस राष्ट्रीय पर्व पर यही हमारी शुभकामना है और प्रत्याशा भी।


? डॉ. गीता गुप्त