संस्करण: 08 अगस्त- 2011

सीवर में होती मौतें और संवेदनहीन समाज

? जाहिद खान

               हमारे मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों से सीवर के अंदर दम घुटने से सफाईकर्मियों की मौत की खबरें, आए दिन की बात हो गई हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता होगा, जब कहीं कोई दर्दनाक हादसा न घटे। वरना, सीवर में मौत सफाईकर्मियों की किस्मत बनकर रह गई है। सफाईकर्मी जाम सीवर लाईन की सफाई-मरम्मत के लिए मैन होल में उतरते हैं और मौत उन्हें वहां अपने आगोश में ले लेती है। हर साल ऐसे अनेक लोग सीवर में जहरीली गैसों की चपेट में आकर घुट-घुटकर दम तोड़ देते हैं। एक तरफ सीवर में होती यह मौतें हैं, दूसरी तरफ हमारा कथित सभ्य समाज है, जो इन सब मामलों पर जानकर भी चुप्पी साधे रहता है। गोया कि सीवर में होनी वाली यह दर्दनाक मौतें, उसे जरा सा भी विचलित नहीं करती। वहीं हमारा 'संवेदनशील' प्रशासन भी औपचारिक तौर से जांच का हुक्म जारी कर अपनी जिम्मेदारियों से बरी हो जाता है। कहीं ज्यादा हंगामा हुआ तो, मृतक के वारिस को मुआवजे के नाम पर लाख-दो लाख थमा दिए जाते हैं। या फिर उसे नौकरी में रख लिया जाता है। लेकिन यह हादसे कैसे रुकें, इसकी तरफ आंखे मूंद ली जाती है।

               हाल ही में एक ऐसा ही दर्दनाक हादसा मेरठ में हुआ। शहर के शताब्दीनगर सेक्टर-4 सी स्थित एमडीए के ट्रीटमेंट प्लांट में मैन होल की लाईन जोड़ने के लिए उतरे तीन मजदूर,सीवर में मौजूद विषैली गैस की चपेट में आ गए और ऑक्सीजन न मिलने की वजह से उनकी मौत हो गई। मरने वाले इन तीन मजदूरों में दो मजदूर ऐसे थे, जो गटर में उतरे पहले मजदूर को बचाने के लिए बाद में उतरे थे। खैर ! वे उस मजदूर को बचा पाते, उल्टे खुद भी मौत के शिकार हो गए। बाद में इन तीनों मजदूरों की लाश दमकलकर्मियों ने मेन होल से बाहर निकाली। खुद को दलितों की रहनुमा बतलाने वाली मुख्यमंत्री मायावती के सूबे में यह कोई पहली घटना नहीं है,जब सफाईकर्मी बुनियादी सुरक्षा उपकरणों के अभाव में सीवर में दम घुटने से मारे गए। मेरठ की इस घटना के के कुछ दिन पहले ही राजधानी लखनऊ के वीआईपी इलाके में स्थित सीवर लाईन की सफाई के लिए उतरे दो सफाईकर्मी, कमोबेश इसी तरह से मौत के मुंह में चले गए थे। इन मजदूरों की भी जहरीली गैस से दम घुटने के चलते मौत हुई। यह हादसा सूबे के लोकनिर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के सरकारी आवास के ठीक सामने हुआ। जबकि,इसी स्थान के थोड़े से फासले पर मुख्यमंत्री मायावती का भी सरकारी आवास है।

                लखनऊ हादसे में स्थानीय पुलिस और प्रशासन दोनों का ही असंवेदनशील व अमानवीय चेहरा सामने निकलकर आया। पुलिस ने जहां इस घटना की एफआईआर तक दर्ज नहीं की,वहीं लखनऊ नगरपालिका ने भी यह कहकर इस पूरी घटना से पल्ला झाड़ लिया कि दोनों मृतक सफाईकर्मी उसकी सेवा में काम नहीं कर रहे थे। बल्कि उस ठेकेदार के मातहत काम कर रहे थे, जिसे सीवर की सफाई का ठेका दिया गया था। यानी, प्रशासन ने अपनी किसी भी तरह की जबावदेही से साफ-साफ इंकार कर दिया। इस अकेली घटना से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब एक दलित मुख्यमंत्री के सूबे में दलित कामगारों को अपने काम को अंजाम देने के लिए न्यूनतम बुनियादी सहुलियतें मयस्सर नहीं,तो दीगर सूबों में इन कामगारों के क्या हालात होंगे ? मैन होल की सफाई के लिए सफाईकर्मियों के पास कायदे से गैस डिटेक्टर, ऑक्सीजन मास्क, फुलबॉडी सूट, गमबूट, दास्तानें, हेल्मेट और सैटी बैल्ट जैसी जरूरी चीजें होनी चाहिए। लेकिन कहीं भी उन्हें यह बुनियादी सहुलियतें नहीं मिलती। आज भी वे बांस की खपच्ची, रस्सी में बंधी एक बाल्टी, फावड़ा, लोहे का कांटा व रॉड से अपना काम चला रहे हैं। और तो और मुल्क की राजधानी दिल्ली में भी यह सफाईकर्मी बुनियादी सहुलियतों से महरूम हैं। अमानवीय और जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में यह कामगार अपना काम करते हैं। दिल्ली जल बोर्ड और नगरनिगम इन सफाईकर्मियों के जानिब जरा सा भी संवेदनशील नहीं हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने कुछ अरसे पहले एक याचिका की सुनवाई करते हुए,इन सफाईकर्मियों को जरूरी उपकरण देने, उनकी हिफाजत के वाजिब बंदोबस्त करने और मृतक कर्मचारियों के परिवारों को मुआवजा देने का दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिया था। दिल्ली जल बोर्ड इन निर्देशों पर कोई कार्यवाही करता, इसके उलट वह इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चला गया। लेकिन वहां भी उसे मुंह की खाना पड़ी। अदालत ने दिल्ली जल बोर्ड की अपील खारिज करते हुए कहा,''सीवर में उतरने वाले लोग कोई रोबोट नहीं हैं, बल्कि वह भी हमारी तरह ही इंसान हैं। उन्हें जरूरी उपकरण देना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य और उसकी संबध्द एजंसियों का काम है।''अदालत ने दिल्ली जल बोर्ड को जोरदार फटकार लगाते हुए कहा था कि ''दिल्ली जल बोर्ड की यह अपील दर्शाती है कि किस तरह सरकारी तंत्र उन लोगों के प्रति संवेदनहीन है, जो कि गरीब होने की मजबूरी के चलते विकट परिथितियों में ऐसे कठिन काम करते हैं।''

               बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों पर अमल के लिए दिल्ली जल बोर्ड और मुख्तलिफ सरकारों को दो महीने का समय दिया था। लेकिन अफसोस, आज भी उसके निर्देशों पर कहीं भी ईमानदारी से अमलदारी नहीं हो रही है। पहले लखनऊ और उसके कुछ दिन बाद ही मेरठ में घटी यह घटनाएं हमें बतलाती हैं कि मायावती सरकार ने पूर्व की घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया है। क्योंकि, यदि उसने कोई सबक सीखा होता तो, सूबे में यह दर्दनाक हादसे बार-बार अंजाम नहीं होते। सीवर में मौतें,और कुछ नहीं शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता और घोर लापरवाही का नतीजा हैं। यह मौतें आसानी से रोकी जा सकती हैं,बस जरूरत समाज का नजरिया बदलने की है। सीवर में काम करने वाले भी हमारी तरह हाड़-मांस के इंसान हैं और वे हमारे मल-मूत्र को साफ करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं। फिर भी उनके प्रति लगातार उपेक्षापूर्ण और असंवेदनशील रवैया कहीं न कहीं हमारे समाज को भी कठघरे में खड़ा करता है।


? जाहिद खान