संस्करण: 08 अगस्त- 2011

 

मालेगांव से ओस्लो घृणा का मुख्यधाराकरण : समुदाय का आतंकवादीकरण

? सुभाष गाताड़े

               '' बमबारी करके कोई हमें खामोश नहीं कर सकता, गोलियां चला कर कोई हमें मौन नहीं कर सकता। कल हम दुनिया को दिखा देंगे कि जब जब जरूरत होती है नार्वे का जनतंत्र मजबूत होकर उभरता है। अपने मूल्यों की हिफाजत में हमें कभी आनाकानी नहीं करनी चाहिए। हमें यह दिखाना चाहिए कि नार्वे का समाज ऐसे कठिन समयों का सही ढंग से मुकाबला करता है।''

               नार्वे के प्रधानमंत्री का वक्तव्य आतंकी हमले की रात

               नार्वे की राजधानी ओस्लो के दक्षिण में स्थित नेसोडेन में 18 साल की बानो रशीद को जब जनाजा उठा तो वहां एकत्रित लोगों की आंखें नम हो उठीं। जनाजे के आगे आगे ल्यूथेरन चर्च के पादरी एवं इमाम चल रहे थे और पीछे पीछे सैकड़ों की तादाद में लोग मौन चल रहे थे। बानो रशीद का परिवार 1996 में उत्तरी इराक के कूर्दिस्तान से वहां पहुंचा था। दरअसल बानो उतरोया द्वीप पर आयोजित लेबर पार्टी के यूथ कैम्प में शामिल थी।

               विगत कुछ दिनों में नार्वे ने जिस तरह आतंकी हमले के जड़ में व्याप्त आपसी घृणा के पार जाने की सम्मिलित कोशिश की है, वह काबिलेतारीफ है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आतंकी घटना के बाद शासकों/जनता को किस तरह सन्तुलित आचरण करना चाहिए इसकी एक मिसाल नार्वे ने कायम की है। नार्वे के सन्तुलित आचरण के बरअक्स अमेरिकी सरगर्मी रही है जिसने 9/11 के बहाने पूरी दुनिया में 'आतंकवाद के खिलाफ युध्द' छेड़ने का ऐलान किया था, जिसने पहले अफगाणिस्तान और बाद में इराक में कहर बरपा किया, और दुनिया भर में हजारों निरपराधों को महज सन्देह के आधार पर सलाखों के पीछे ढकेला एवं यातनाएं दीं।

               बहुत कम लोग इस हकीकत से वाकीफ हैं कि कई अन्तरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में नार्वे ने अपने स्तर पर हमेशा पहल ली है। पड़ोसी मुल्क श्रीलंका जिन दिनों लिट्टे के साथ हथियारबन्द संघर्ष में मुब्तिला था, उन दिनों दोनों पक्षों के बीच शान्तिवार्ता सम्पन्न कराने में नार्वे की अहम भूमिका रही है। इतना ही नहीं विगत कुछ समय से इस्त्राएल की जालिमाना नीतियों के खिलाफ उसके अन्तरराष्ट्रीय बहिष्कार की जो मुहिम धीरे धीरे जोर पकड़ रही है, उसमें भी नार्वे की सहभागिता है।

               नार्वे की जनता के ताजा मूड को बयां करता हुआ एक खुला खत पिछले दिनों यूरोप के कई अख़बारों में प्रकाशित हुआ है। ब्रेविक के आतंकी हमले में अपने पांच दोस्तों को खो चुका वह सोलह साल का किशोर/युवक लिखता है कि 'तुम लाख कहो, मगर सच्चाई यह है कि तुम हार रहे हो। अपनी कातिलाना हरकत से तुमने नये नायकों को पैदा किया है।'

               उम्मीद की जानी चाहिए कि नार्वे एवं उसकी अवाम अपने हालिया गुजरे अतीत को भूलते हुए, उसे एक दु:स्वप्न मानते हुए, नया पन्ना पलटें और वह इस मामले में भी नज़ीर बने कि अलग अलग सम्प्रदायों, अलग अलग राष्ट्रीयताओं के लोगों को साथ लेकर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है। निश्चित ही यह कहना भले ही आसान हो, मगर उसका अमल उतना ही कठिन। इसकी वजह समुदायविशेष के खिलाफ चतुर्दिक व्याप्त घृणा का माहौल है, जो एक सहजबोध बना हुआ है।

               इधर बीच कितने लोगों ने यूरोपियन पुलिस संगठन (यूरोपोल) की हाल के वर्षों की रिपोर्टों के अंश पढ़े हैं, जो यूरोप के सन्दर्भ में इस्लामिक आतंकवाद की वस्तुस्थिति को बयां करती है। जाननेयोग्य है कि आम धारणा के विपरीत आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में वह बेहद मामूली खिलाड़ी हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2007 से 2010 के बीच के अन्तराल में महज ऐसी छह घटनाएं देखी जा सकती हैं, जिनके लिए इस्लामिक अतिवादियों को जिम्मेदार माना जा सकता है। गौरतलब है कि यह ऐसा कालखण्ड है जिस दौरान यूरोप की सरजमीं पर आतंकी घटनाएं कम होती गयी हैं। उदाहरण के लिए अगर 2007 में 581 आतंकी घटनाएं हुई थीं तो 2010 तक आते आते ऐसी महज 249 घटनाएं ही देखी गयीं। आतंकी घटनाओं का अधिकतर हिस्सा अलगाववादियों के जिम्मे आता है, जो मुख्यत: फ्रान्स एवं स्पेन में सक्रिय हैं। अगर हम इन अलगाववादियों को देखें तो इनमें एक श्रेणी ऐसे लोगों/संगठनों की है जो यूरोप में रह कर आजादी चाहते हैं उदाहरण के लिए स्पेन का ईटीए ; वहीं दूसरी श्रेणी ऐसे अलगाववादियों की है जिनके संघर्ष दुनिया के दूसरे कोने में - कोलम्बिया, कूर्दिस्तान - चल रहे हैं, मगर वह यहां यूरोप में भी हंगामा करके मसले की तरफ लोगों का धयान आकर्षित करना चाहते हैं।

               यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि ऐसी स्थितियों के बावजूद, जहां यूरोप के अन्दर इस्लामिक आतंकवाद कोई बड़ा खतरा नहीं है , आखिर इस्लाम को आतंकवाद के साथ जोड़ने या उसके समकक्ष रखने की योजनाएं आखिर क्यों फलती फूलती रही हैं।

              तथ्य बताते हैं कि विगत दशक में मुस्लिम विरोधी हिंसा पश्चिमी समाजों का हिस्सा बन गयी है, इसमें राज्य की संरचनाआें एवं समाज में इन तबकों के खिलाफ कायम मौन पूर्वाग्रह एवं भेदभाव की संरचनात्मक हिंसा का मसला भी शामिल है। हम इस बात को यूं भी देख सकते हैं कि जब तक यह पता नहीं चला कि आतंकी हमले को ब्रेविक ने अंजाम दिया है, तब तक आतंकवाद के ''विशेषज्ञों'' एवं पत्राकारों ने आसानी से यह मान लिया था कि यह जिहादी आतंकवादियों की कार्रवाई है, जो नार्वे की सेना की अफगाणिस्तान में उपस्थिति का विरोध करने के लिए है। स्टार न्यूज ने किसी फर्जी जिहादी संगठन के नाम का भी उल्लेख किया, जिसने कथित तौर पर इस आतंकी हमले की जिम्मेदारी ली थी।

               यूरोप में आकार ले रहे इस ईसाई उग्रपंथ का बहुसंस्कृतिवाद पर हमला या उन नीतियों की मुखालिफत जो सहिष्णुता की बात करती हैं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की हिमायत करती हैं, एक तरह से हमें मुख्यधारा के राजनेताओं एवं मुख्य विपक्षी पार्टियों के बयानों की भी याद दिलाता है। 'इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली' का इस मसले पर सम्पादकीय में स्पष्ट लिखा गया है (लेसन फ्रॉम उटोया)

               : बुश जुनियर से लेकर -जब वह व्हाईट हाउस में थे - फ्रान्स के सरकोजी तक , ब्रिटेन के कैमरून और जर्मनी के मर्केल, इसी किस्म के विचारों का बार बार प्रसारित किया जाता रहा है और उन्हें मुख्यधारा का विमर्श बना दिया गया है। इन बातों का निचोड़ यही है कि मुसलमान पश्चिम पर हावी हो रहे हैं, यहां लोकसंख्या के आधार पर जबरदस्त परिवर्तन होनेवाला है, मुसलमान हिंसक और मधययुगीन होते हैं, पश्चिमी मूल्यों को  बहुसंस्कृतिवाद से खतरा है, आदि। ब्रेविक के बहाने हम इस कड़वी सच्चाई से उजागर होते हैं कि ऐसे विचार और राजनीतिक पोजिशन्स, जो कुछ दशक पहले अतिवादी एवं पूर्वाग्रहों से लैस मानी जाती थी, अब ''मुख्यधारा'' के केन्द्र में धडल्ले से पहुंच रहे हैं।

               घृणा के विचारों का यूरोपीय राजनीति के मुख्यधारा में पहुंचना हमें बरबस भारत की परिस्थिति की याद दिलाता है, जहां हम इसी तर्ज पर 'बहुसंख्यकवादी' रूझानों के राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा बनते देखते हैं, जिन्हें हम बहुंसख्यकवादी दृष्टिकोण की बढ़ती लोकप्रियता, धार्मिकता की अत्यधिक अभिव्यक्ति, समूह की सीमाओं को बनाए रखने पर जोर, घोर साम्प्रदायिक घटनाओं पर जागरूकता की कमी, अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति असहमति, के रूप में परिलक्षित होते देखते हैं।

               इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि जिस तरह ब्रेविक के आतंकी कारनामे को 'जिहादी आतंकियों'' की कार्रवाई के तौर पर पेश किया जाता रहा, उसी तर्ज पर मालेगांव के बम धमाकों को लेकर भी आतंकवाद के भारतीय ''विशेषज्ञों' ने उनका जिम्मा जिहादी आतंकवाद के सर पर मढ़ा, यह अलग बात है कि हेमन्त करकरे जैसे जांबाज अधिकारी के चलते सच्चाई जल्द ही सामने आयी।

? सुभाष गाताड़े